जिस बहू को ठुकराया, उसी ने ससुर की जान बचाई
“कई बार हम किसी इंसान की कीमत उसके परिवार, उसकी जाति, उसके पैसे या उसके बाहरी रूप से लगाने लगते हैं। लेकिन समय जब असली परीक्षा लेता है, तब पता चलता है कि इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसका दिल, उसके संस्कार और उसके कर्म होते हैं। और तब हमारी वर्षों पुरानी सोच एक ही पल में बदल जाती है...”
घर के आंगन में रखी कुर्सी पर बैठी कमला देवी का चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था।
सामने उनका बेटा रोहित खड़ा था।
“मां, मैं आखिरी बार कह रहा हूं, मैं नेहा से ही शादी करूंगा। अगर शादी करूंगा तो उसी से, नहीं तो कभी नहीं करूंगा।”
कमला देवी ने नाराज होकर कहा, “तुम्हें समझ क्यों नहीं आता? ना वो हमारे समाज की है, ना उसके घर की हैसियत हमारे जैसी है। उसके पिता एक साधारण क्लर्क हैं। आखिर हमें क्या मिलेगा इस रिश्ते से?”
रोहित ने गहरी सांस ली।
“मां, शादी कोई सौदा नहीं होती। मुझे जीवनसाथी चाहिए, कोई दहेज नहीं।”
“वाह! अब हम लालची हो गए?” कमला देवी भड़क गईं।
“मैं ऐसा नहीं कह रहा, लेकिन सिर्फ पैसे देखकर रिश्ता तय करना गलत है।”
तभी रोहित के पिता सुरेश जी वहां आ गए।
उन्होंने शांत स्वर में कहा, “कमला, बच्चे की खुशी भी देखो।”
लेकिन कमला देवी अपनी जिद पर अड़ी रहीं। उन्होंने रोहित की एक भी बात मानने से साफ इनकार कर दिया।
कई महीनों तक घर में इसी बात को लेकर तनाव बना रहा।
आखिरकार जब रोहित किसी और लड़की से शादी के लिए तैयार नहीं हुआ, तो मजबूरी में कमला देवी को मानना पड़ा।
कुछ समय बाद रोहित और नेहा का विवाह हो गया।
नेहा एक साधारण परिवार की लड़की थी।
उसके माता-पिता ने अपनी क्षमता के अनुसार कुछ कपड़े और जरूरी सामान दिया।
इसे देखकर कमला देवी का मन और खट्टा हो गया।
उन्हें लगता था कि उनके बेटे को इससे कहीं ज्यादा संपन्न परिवार मिल सकता था।
लेकिन नेहा ने कभी उनकी नाराजगी का जवाब नहीं दिया।
वह मुस्कुराकर हर बात सुन लेती।
धीरे-धीरे उसने पूरे घर की जिम्मेदारी संभाल ली।
सुरेश जी की दवाइयों का समय, घर का राशन, बिजली के बिल, सब कुछ वह व्यवस्थित रखने लगी।
कमला देवी को अब घर के काम की चिंता नहीं करनी पड़ती थी।
नेहा बहुत अच्छा खाना बनाती थी।
उसे तरह-तरह के व्यंजन बनाने का शौक था।
जब रोहित की बहनें अपने परिवार के साथ आतीं, तो वह सबकी पसंद का खाना बनाती।
बच्चे भी अपनी मामी के हाथ का खाना खाने के लिए उत्साहित रहते।
सभी लोग नेहा की तारीफ करते।
लेकिन कमला देवी का मन अब भी नहीं बदला था।
उन्हें लगता था कि बहू चाहे जितना अच्छा कर ले, उनकी पसंद की नहीं बन सकती।
एक दिन सुरेश जी के पुराने मित्र का फोन आया।
उन्होंने बताया कि उनके बेटे की शादी तय हो गई है और पूरे परिवार को निमंत्रण दिया।
शादी दूसरे शहर में थी।
कमला देवी बहुत खुश थीं।
उन्हें घूमने का भी मौका मिल जाता।
लेकिन शादी से कुछ दिन पहले ही सुरेश जी को वायरल बुखार हो गया।
हालांकि डॉक्टर ने कहा कि चिंता की बात नहीं है, लेकिन लंबी यात्रा करना ठीक नहीं होगा।
अब समस्या खड़ी हो गई।
काफी सोच-विचार के बाद यह तय हुआ कि रोहित और कमला देवी शादी में चले जाएंगे और नेहा घर पर रहकर सुरेश जी की देखभाल करेगी।
कमला देवी को यही ठीक लगा।
उनके मन में कहीं न कहीं यह भी था कि बहू साथ नहीं जाएगी तो उन्हें ज्यादा अच्छा लगेगा।
अगले दिन रोहित और कमला देवी शादी में चले गए।
घर पर सिर्फ नेहा और सुरेश जी थे।
पूरा दिन सामान्य रहा।
सुरेश जी ने खाना खाया, दवा ली और आराम करने चले गए।
रात को नेहा रसोई समेट रही थी।
तभी उसे कमरे से किसी चीज के गिरने की आवाज सुनाई दी।
वह भागकर अंदर पहुंची।
जो दृश्य उसने देखा, उसे देखकर उसके होश उड़ गए।
सुरेश जी जमीन पर गिरे हुए थे।
उनका चेहरा पीला पड़ चुका था।
सांस लेने में परेशानी हो रही थी।
नेहा घबरा गई लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी।
कुछ दिन पहले उसने एक सामाजिक संस्था द्वारा आयोजित प्राथमिक चिकित्सा का प्रशिक्षण लिया था।
उसे कुछ जरूरी बातें याद थीं।
उसने तुरंत पड़ोसियों को आवाज दी।
साथ ही एंबुलेंस को फोन किया।
पड़ोसी भी दौड़े चले आए।
नेहा लगातार सुरेश जी को संभालती रही।
कुछ ही देर में एंबुलेंस पहुंच गई।
अस्पताल में डॉक्टरों ने तुरंत इलाज शुरू कर दिया।
जांच के बाद पता चला कि उन्हें गंभीर हृदयाघात आया था।
डॉक्टर ने कहा,
“अगर मरीज को समय पर अस्पताल नहीं लाया जाता, तो स्थिति बहुत खराब हो सकती थी।”
यह सुनकर नेहा की आंखों में आंसू आ गए।
उसने तुरंत रोहित को फोन किया।
रोहित और कमला देवी शादी छोड़कर उसी समय लौट पड़े।
जब वे अस्पताल पहुंचे, तब तक सुरेश जी की हालत काफी बेहतर हो चुकी थी।
अगले दिन डॉक्टर ने सबको बुलाया।
उन्होंने कहा,
“आप लोगों को अपनी बहू पर गर्व होना चाहिए। उसने बिल्कुल सही समय पर निर्णय लिया। थोड़ी सी देर भी हो जाती तो मरीज को बचाना मुश्किल हो सकता था।”
कमला देवी चुप खड़ी थीं।
उनकी आंखें भर आई थीं।
उन्हें याद आने लगा कि उन्होंने कितनी बार नेहा का दिल दुखाया था।
कितनी बार उसके परिवार का अपमान किया था।
लेकिन आज उसी लड़की ने बिना किसी शिकायत के उनके पति की जान बचाने के लिए सब कुछ कर दिया।
अस्पताल से बाहर निकलते ही कमला देवी ने नेहा का हाथ पकड़ लिया।
“बेटी, मुझे माफ कर दो।”
नेहा चौंक गई।
“मां जी, आप ऐसा क्यों कह रही हैं?”
कमला देवी रो पड़ीं।
“मैंने हमेशा तुम्हें पराया समझा। तुम्हारे परिवार को छोटा समझा। लेकिन आज तुमने साबित कर दिया कि इंसान की पहचान उसके संस्कारों से होती है, पैसों से नहीं।”
नेहा की आंखें भी नम हो गईं।
उसने झुककर उनके पैर छू लिए।
लेकिन इस बार कमला देवी ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया।
“अब बहू नहीं, मेरी बेटी हो तुम।”
पास खड़े रोहित और सुरेश जी यह दृश्य देखकर मुस्कुरा रहे थे।
उस दिन के बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल गया।
कमला देवी हर जगह गर्व से कहतीं,
“भगवान हर घर को ऐसी बहू दे। जिसने हमें रिश्तों की असली कीमत समझाई।”
और सच भी यही है...
दौलत, जाति, ऊंचा-नीचा परिवार या दिखावा कभी किसी इंसान की असली पहचान नहीं बताते। इंसान की असली पहचान उसके व्यवहार, उसके संस्कार और मुश्किल समय में निभाए गए रिश्तों से होती है। क्योंकि अच्छे लोग घर में बहू बनकर नहीं आते, वे धीरे-धीरे उस घर की बेटी बन जाते हैं।

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