चमकते गहनों वाली बहू और मिट्टी की खुशबू
"जिस बहू के विदेशी गहनों पर पूरा परिवार फिदा था, वही मुश्किल समय में घर छोड़कर चली गई… और जिसे हमेशा अनपढ़ कहकर अपमानित किया गया, उसी ने अपने खून-पसीने से उस घर को टूटने से बचाया।"
बरसात की हल्की फुहारें आंगन में गिर रही थीं। पुराने घर की दीवारों से मिट्टी की सोंधी खुशबू उठ रही थी। लेकिन शर्मा परिवार के घर के अंदर माहौल किसी त्योहार जैसा था।
“अरे पूजा! वो सोफे के कुशन ठीक से लगाना। और सुन, ऊपर वाले कमरे में नया बेडशीट डाल देना। मेरी बड़ी बहू ‘रिया’ आ रही है दुबई से!”
कमला देवी पूरे घर में इधर-उधर घूम रही थीं। चेहरे पर खुशी साफ दिखाई दे रही थी। हाथों में दर्द रहने वाली कमला देवी आज बिना रुके काम कर रही थीं।
मैं, यानी उनकी बेटी नेहा, चुपचाप यह सब देख रही थी।
घर में दो बहुएं थीं।
बड़ी बहू रिया — जो अपने पति करण के साथ दुबई में रहती थी। महंगे कपड़े, बड़ी-बड़ी बातें और सोशल मीडिया पर चमकती जिंदगी।
और दूसरी थी छोटी बहू कविता — मेरे छोटे भाई मोहन की पत्नी। साधारण सी लड़की। ना ज्यादा पढ़ी-लिखी, ना फैशन का शौक। लेकिन पूरे घर की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी।
उस समय कविता रसोई में खड़ी सबके लिए पकौड़े तल रही थी। तेज बुखार की वजह से उसका चेहरा लाल पड़ा हुआ था। फिर भी उसके हाथ रुके नहीं थे।
मैंने जाकर उसका माथा छुआ।
“अरे भाभी! आपको तो बहुत तेज बुखार है।”
कविता हल्का सा मुस्कुराई।
“कुछ नहीं दीदी… मौसम की वजह से है।”
तभी पीछे से कमला देवी की तेज आवाज आई—
“नेहा! वहां खड़ी बातें मत कर। कविता को बोल जल्दी काम खत्म करे। रिया को मसाले की तेज स्मेल पसंद नहीं है।”
मैंने गुस्से में कहा—
“माँ, कविता भाभी बीमार हैं। थोड़ा आराम कर लेने दीजिए।”
कमला देवी तुरंत भड़क गईं।
“बीमार है तो क्या हुआ? घर की बहू है। जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी। रिया मेहमान है, वो आराम करेगी।”
कविता ने तुरंत मुझे आंखों से चुप रहने का इशारा किया।
“दीदी रहने दीजिए… मैं कर लूंगी।”
शाम होते-होते बाहर एक बड़ी चमचमाती कार आकर रुकी।
कमला देवी लगभग दौड़ती हुई बाहर गईं।
“आ गए मेरे बेटे-बहू!”
रिया कार से उतरी। हाथ में महंगा पर्स, आंखों पर काला चश्मा और गले में चमकता हीरों का हार।
करण ने मां के पैर छुए, लेकिन रिया ने बस हल्का सा झुककर “हाय मॉम” कह दिया।
कमला देवी फिर भी खुशी से पागल हुई जा रही थीं।
“अरे मेरी रानी बहू! कितनी सुंदर लग रही है!”
रिया अंदर आई और चारों तरफ नजर घुमाई।
“Mom… आपने अभी तक ये पुराने पर्दे नहीं बदले? घर बहुत आउटडेटेड लग रहा है।”
कमला देवी हंसने लगीं।
“अब तू आ गई है ना, सब बदल जाएगा।”
तभी कविता पानी लेकर आई।
रिया ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।
“ओह… तुम अभी भी ऐसी सिंपल साड़ी पहनती हो? थोड़ा खुद पर ध्यान दिया करो कविता। आजकल गांव वाली लुक कौन रखता है?”
कमला देवी भी हंस पड़ीं।
“अरे इसे सजना-संवरना कहां आता है!”
कविता बस चुप रही।
उस रात से घर में रिया की फरमाइशें शुरू हो गईं।
कभी उसे इटालियन खाना चाहिए होता, कभी स्पेशल कॉफी।
कविता दिनभर रसोई में लगी रहती।
रिया सुबह देर से उठती और मोबाइल लेकर सोफे पर बैठ जाती।
सोशल मीडिया पर फोटो डालना, वीडियो बनाना, मेकअप करना — यही उसका काम था।
और कमला देवी?
वे हर जगह अपनी बड़ी बहू की तारीफ करती फिरतीं।
“मेरी रिया तो लाखों में एक है। दुबई में रहती है, बड़े लोगों में उठना-बैठना है उसका।”
पड़ोस की एक औरत ने पूछा—
“और छोटी बहू कविता कैसी है?”
कमला देवी ने मुंह बना लिया।
“अरे छोड़ो उसे। बस घर के काम के लिए ठीक है।”
ये सुनकर मुझे बहुत बुरा लगता था।
लेकिन कविता कभी जवाब नहीं देती।
एक दिन घर में बड़ी पूजा रखी गई। लगभग पचास मेहमान आने वाले थे।
पूरा खाना कविता अकेले बना रही थी।
सुबह से शाम हो गई। उसका बुखार और बढ़ गया था।
फिर भी वह चूल्हे के सामने खड़ी रही।
रिया उस समय अपने कमरे में पार्लर वाली से मेकअप करवा रही थी।
“फोटो अच्छे आने चाहिए,” वह बार-बार कह रही थी।
रात को पूजा खत्म हुई।
सब मेहमान चले गए।
कविता रसोई में बर्तन साफ कर रही थी कि अचानक ड्रॉइंग रूम से जोर की आवाज आई।
धड़ाम!
हम सब भागकर बाहर आए।
कमला देवी जमीन पर गिरी हुई थीं।
उनका मुंह टेढ़ा हो चुका था और हाथ कांप रहे थे।
“माँ!” करण जोर से चिल्लाया।
रिया घबरा गई।
“ओह माय गॉड!”
मैं रोने लगी।
लेकिन उस वक्त सबसे पहले कविता संभली।
उसने तुरंत कमला देवी के सिर के नीचे तकिया रखा।
“मोहन, जल्दी गाड़ी निकालो!”
“और करण भैया, आप तुरंत डॉक्टर को फोन कीजिए!”
उसकी आवाज में घबराहट नहीं, हिम्मत थी।
हम लोग तुरंत अस्पताल पहुंचे।
डॉक्टर ने जांच के बाद कहा—
“इनको ब्रेन स्ट्रोक आया है। अगले 24 घंटे बहुत महत्वपूर्ण हैं।”
कमला देवी आईसीयू में भर्ती हो गईं।
अगले दिन से असली चेहरे सामने आने लगे।
रिया अस्पताल में ज्यादा देर रुक ही नहीं पाती थी।
“मुझे हॉस्पिटल की स्मेल से उल्टी आती है,” वह कहती।
वह बाहर जाकर कॉफी पीती, मोबाइल चलाती और फिर घर चली जाती।
तीसरे दिन उसने करण से कहा—
“हमारी दुबई वापसी की टिकट है। बिजनेस मीटिंग मिस नहीं कर सकते।”
मैं हैरान रह गई।
“भाभी! माँ अभी आईसीयू में हैं।”
रिया ने ठंडे स्वर में कहा—
“तो क्या करें? जिंदगी किसी के लिए नहीं रुकती।”
करण भी चुप रहा।
उधर कविता?
वो दिन-रात अस्पताल में लगी रही।
कमला देवी को दवा देना, डॉक्टर से बात करना, कपड़े बदलना, सब वही करती।
एक रात तो ऐसा हुआ कि कमला देवी को उल्टी हो गई।
नर्स देर से आई।
रिया वहां होती तो शायद मुंह फेर लेती।
लेकिन कविता ने अपने हाथों से सब साफ किया।
उसने मां के बाल ठीक किए और उनके माथे पर हाथ फेरते हुए बोली—
“माँ जी… जल्दी ठीक हो जाइए।”
मैंने पहली बार देखा कि सेवा कैसी होती है।
चार दिन बाद कमला देवी को होश आया।
उन्होंने धीरे-धीरे आंखें खोलीं।
सबसे पहले उनकी नजर कविता पर पड़ी।
कविता कुर्सी पर बैठे-बैठे ही सो गई थी। उसके हाथ अब भी कमला देवी के पलंग पर थे।
कमला देवी की आंखें भर आईं।
उन्होंने धीमे से पूछा—
“रिया…?”
मैं चुप रही।
मोहन ने धीरे से कहा—
“भैया-भाभी दुबई चले गए माँ।”
कमला देवी की आंखों से आंसू बह निकले।
शायद पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि चमक और अपनापन अलग चीजें होती हैं।
एक हफ्ते बाद जब कमला देवी घर लौटीं, तो बहुत कमजोर हो चुकी थीं।
कविता ने उनका पूरा कमरा साफ किया। समय पर दवा दी। उनके लिए खिचड़ी बनाई।
एक रात कमला देवी ने कविता को अपने पास बुलाया।
“कविता… बैठ।”
कविता घबराकर बैठ गई।
कमला देवी की आंखों से आंसू बहने लगे। उनका गला भर आया था। उन्होंने कांपते हाथों से कविता का हाथ पकड़ लिया।
“कविता… मैंने तेरे साथ बहुत अन्याय किया है बेटा…”
कविता घबरा गई। “माँ जी, ऐसी बातें मत कहिए…”
कमला देवी दर्द भरी आवाज़ में बोलीं—
“नहीं बहू, आज मुझे सच कह लेने दे। मैंने हमेशा रिया की चमक-दमक को ही सब कुछ समझ लिया। उसके महंगे कपड़े, बड़ी-बड़ी बातें और विदेशी ठाठ देखकर मैं अंधी हो गई थी। और तुझे… तुझे मैंने इस घर की बहू नहीं, बस काम करने वाली समझा। हर वक्त तुझे ताने दिए, तेरी बीमारी तक नहीं देखी…”
उनकी आवाज़ कांपने लगी।
“लेकिन जिस बहू को मैंने सिर पर बैठाया, वही मुश्किल वक्त में मुझे अकेला छोड़कर चली गई… और जिसे मैंने हर पल ठुकराया, वही रात-दिन मेरे सिरहाने खड़ी रही। तूने बिना शिकायत मेरे गंदे कपड़े बदले, मुझे दवा दी, मेरी सेवा की… बेटा, तू बहू नहीं, मेरी अपनी बेटी निकली।”
कविता की आंखें भी भर आईं। उसने तुरंत कमला देवी के आंसू पोंछे।
“माँ जी, अपने लोग कभी पराए नहीं होते। आप बस जल्दी से ठीक हो जाइए।”
कमला देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“आज से इस घर की असली बहू तू है।”
उसी समय दरवाजे पर रिया का वीडियो कॉल आया।
वह दुबई के किसी बड़े होटल में खड़ी थी।
“हाय मॉम! अब कैसी हैं आप?”
कमला देवी ने फोन की तरफ देखा… फिर बिना कुछ बोले कॉल काट दिया।
उन्होंने अपनी नजर कविता पर टिकाई और कहा—
“बेटी, जरा वो ऊन वाली शॉल देना… वही जो तूने अपने हाथों से बनाई थी। उसमें अपनापन है।”
कविता मुस्कुराई।
उस दिन पहली बार उस घर को समझ आया कि विदेशी गहनों की चमक कुछ पल की होती है, लेकिन अपने हाथों से बुने प्यार और अपनापन की गर्माहट पूरी ज़िंदगी साथ रहती है।
संदेश:
आज के समय में लोग अक्सर रिश्तों की कीमत पैसे, महंगे कपड़ों और दिखावे से आंकने लगे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि रिश्तों की असली पहचान मुश्किल वक्त में होती है। जो इंसान आपके दुख, तकलीफ और बुरे समय में बिना स्वार्थ आपके साथ खड़ा रहे, वही सच में अपना कहलाने के लायक होता है। बाहरी चमक-धमक कुछ समय के लिए आकर्षित जरूर कर सकती है, लेकिन सच्चा प्यार, अपनापन और सेवा ही रिश्तों को मजबूत बनाते हैं।

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