पति ने छोड़ा, मगर हिम्मत ने नहीं छोड़ा
सुबह का समय था। गांव की कच्ची गलियों में हल्की धूप उतर रही थी। दूर मंदिर से घंटियों की आवाज़ आ रही थी और घरों के सामने औरतें झाड़ू लगा रही थीं। लेकिन रामदीन के छोटे से घर के अंदर उदासी पसरी हुई थी।
चारपाई पर बैठी उसकी बेटी निशा चुपचाप आसमान को देख रही थी। उसकी उम्र मुश्किल से बीस साल रही होगी। चेहरे पर मासूमियत थी, लेकिन आंखों में कई अधूरे सपने छिपे थे।
निशा पढ़ने में बहुत तेज थी। गांव के सरकारी स्कूल से उसने बारहवीं में पूरे जिले में दूसरा स्थान हासिल किया था। उसका सपना था कि वह नर्स बने और बड़े अस्पताल में नौकरी करे ताकि अपने गरीब मां-बाप की जिंदगी बदल सके।
लेकिन गरीबी इंसान के सपनों से बड़ी हो जाती है।
रामदीन गांव में मजदूरी करता था। कभी काम मिलता, कभी नहीं। घर में दो छोटे बेटे भी थे। मां सुशीला दूसरों के घरों में बर्तन मांजती थी। जैसे-तैसे घर का खर्च चलता था।
एक दिन शाम को रामदीन घर आया तो उसके चेहरे पर हल्की खुशी थी।
“सुनो सुशीला... निशा के लिए रिश्ता आया है।”
सुशीला तुरंत रसोई से बाहर आई।
“कैसा लड़का है?”
“शहर में काम करता है। मोबाइल की दुकान पर नौकरी करता है। घर वाले कह रहे थे कि ज्यादा दहेज भी नहीं चाहिए।”
गरीब मां-बाप को इससे ज्यादा और क्या चाहिए था।
कुछ दिनों बाद लड़के वाले निशा को देखने आए। लड़के का नाम दीपक था। देखने में ठीक-ठाक था और बात भी मीठी करता था। उसने निशा से कहा—
“अगर तुम चाहो तो शादी के बाद पढ़ाई भी कर सकती हो।”
बस यही बात निशा के दिल में उतर गई।
उसे लगा उसका सपना अब पूरा हो जाएगा।
कुछ महीनों बाद दोनों की शादी हो गई।
शादी के बाद निशा ससुराल आ गई। शुरू-शुरू में सब ठीक था। दीपक उससे प्यार से बात करता था। सास भी मीठा बोलती थी। निशा को लगने लगा था कि उसका जीवन सच में बदल गया।
लेकिन धीरे-धीरे असली चेहरा सामने आने लगा।
दीपक शहर में नौकरी करता था और महीने में सिर्फ एक बार घर आता था। उसने निशा को शहर ले जाने का वादा किया था, लेकिन हर बार कोई ना कोई बहाना बना देता।
“अभी कमरा छोटा है।”
“अभी पैसे नहीं हैं।”
“थोड़ा इंतजार कर लो।”
निशा हर बार मान जाती।
इधर उसकी सास ने उसे घर की नौकरानी बना दिया था। सुबह चार बजे उठना, चूल्हा जलाना, पानी भरना, जानवरों को चारा देना, खेत में काम करना—सब निशा ही करती।
अगर कभी थककर बैठ जाती तो सास ताने मारती—
“हमने भी बहू बनकर बहुत काम किया है। आजकल की लड़कियां तो बस आराम चाहती हैं।”
धीरे-धीरे निशा कमजोर होती जा रही थी।
एक दिन उसने दीपक से फोन पर कहा—
“मुझे भी शहर ले चलो ना... मैं पढ़ाई करना चाहती हूं।”
दीपक बोला—
“बस कुछ महीने और रुक जाओ।”
निशा फिर चुप हो गई।
समय बीतता गया।
शादी को दो साल हो चुके थे। इसी बीच निशा एक बेटी की मां बन गई। उसने अपनी बेटी का नाम परी रखा।
निशा अपनी बेटी से बहुत प्यार करती थी। वह सोचती थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह अपनी बेटी को खूब पढ़ाएगी।
लेकिन उसकी सास को पोती बिल्कुल पसंद नहीं थी।
वह हर समय ताने देती—
“पहली बार में ही लड़की पैदा कर दी।”
दीपक भी अब बदलने लगा था। वह पहले जैसा प्यार नहीं करता था। फोन भी कम करता।
एक दिन गांव की एक औरत ने निशा को बताया—
“तुम्हारा पति शहर में किसी दूसरी औरत के साथ घूमता है।”
यह सुनकर निशा के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसने जब दीपक से पूछा तो वह गुस्सा हो गया।
“लोगों की बातों पर भरोसा करती हो?”
निशा चुप हो गई, लेकिन उसके मन में डर बैठ गया था।
कुछ महीनों बाद दीपक घर आया। इस बार वह बहुत चिड़चिड़ा था। छोटी-छोटी बात पर गुस्सा करता।
रात को उसने निशा से कहा—
“मुझे शहर में बहुत खर्चा होता है। अब तुम भी कुछ कमाओ।”
निशा बोली—
“मैं क्या काम करूंगी?”
दीपक बोला—
“शहर में एक फैक्ट्री है। वहां लड़कियां काम करती हैं। तुम्हें भी वहीं लगवा दूंगा।”
निशा खुश हो गई। उसे लगा अब उसका सपना पूरा होगा।
कुछ दिनों बाद दीपक उसे और छोटी परी को शहर ले आया।
लेकिन शहर आकर निशा के सारे सपने टूट गए।
दीपक उसे जिस फैक्ट्री में लेकर गया था, वहां औरतों से दिन-रात मजदूरी करवाई जाती थी। छोटी-सी जगह में कई लड़कियां काम करती थीं। ठीक से खाना तक नहीं मिलता था।
निशा सुबह से रात तक कपड़े सिलती रहती।
उसे जो पैसे मिलते, दीपक सब अपने पास रख लेता।
धीरे-धीरे निशा बीमार रहने लगी। लगातार काम और कमजोरी की वजह से उसे चक्कर आने लगे थे।
एक दिन फैक्ट्री में काम करते-करते वह बेहोश होकर गिर गई।
उसी फैक्ट्री में काम करने वाली एक बुजुर्ग औरत शांति ने उसे पानी पिलाया।
शांति बोली—
“बेटी... तुम इतना अत्याचार क्यों सह रही हो?”
निशा रो पड़ी।
उसने अपनी पूरी कहानी शांति को बता दी।
शांति एक समझदार औरत थी। उसने निशा को समझाया—
“अगर तुम खुद मजबूत नहीं बनोगी तो तुम्हारी बेटी की जिंदगी भी ऐसे ही गुजर जाएगी।”
उस दिन पहली बार निशा ने अपने बारे में सोचा।
धीरे-धीरे उसने हिम्मत जुटानी शुरू की।
फैक्ट्री के पास ही एक सरकारी सेंटर था जहां लड़कियों को मुफ्त में सिलाई और नर्सिंग की ट्रेनिंग दी जाती थी।
शांति ने चुपके से वहां निशा का नाम लिखवा दिया।
अब निशा दिन में फैक्ट्री में काम करती और शाम को ट्रेनिंग लेने जाती।
उसे पढ़ाई करते देख उसकी बेटी परी भी खुश होती।
कुछ महीनों बाद निशा ने नर्सिंग का छोटा कोर्स पूरा कर लिया।
उसी दौरान दीपक की सच्चाई भी सामने आ गई। वह सच में दूसरी औरत के साथ रह रहा था और निशा की कमाई पर ऐश कर रहा था।
इस बार निशा नहीं टूटी।
उसने फैसला कर लिया था कि अब वह अपनी बेटी के लिए जिएगी।
एक दिन वह परी को लेकर दीपक का घर छोड़कर चली गई।
शुरू-शुरू में उसे बहुत मुश्किलें हुईं। किराया देना, बच्ची को संभालना, नौकरी ढूंढना—सब आसान नहीं था।
लेकिन मेहनत रंग लाई।
कुछ महीनों बाद उसे एक छोटे अस्पताल में नौकरी मिल गई।
पहली तनख्वाह हाथ में लेते ही निशा की आंखों में आंसू आ गए। उसे अपने मां-बाप याद आ गए।
धीरे-धीरे उसकी जिंदगी बदलने लगी।
वह दिन में अस्पताल में काम करती और रात में आगे की पढ़ाई करती।
सालों की मेहनत के बाद निशा एक अच्छी नर्स बन गई।
अब उसके पास छोटा-सा घर था। बेटी अच्छे स्कूल में पढ़ती थी।
एक दिन उसी गांव में स्वास्थ्य शिविर लगा जहां कभी निशा ने गरीबी में जिंदगी बिताई थी।
निशा वहां मरीजों का इलाज करने पहुंची।
गांव वाले उसे देखकर हैरान रह गए।
उसकी सास भी वहीं खड़ी थी। उम्र के साथ अब वह कमजोर हो चुकी थी।
उसने कांपती आवाज़ में कहा—
“बहू... मुझे माफ कर दे।”
निशा ने कुछ नहीं कहा। उसने चुपचाप अपनी सास को दवाई दी और आगे बढ़ गई।
क्योंकि समय इंसान को सब सिखा देता है।
उधर दीपक अब अकेला हो चुका था। जिस औरत के लिए उसने अपना परिवार छोड़ा था, वह भी उसे छोड़कर जा चुकी थी।
एक रात वह अस्पताल के बाहर बैठा रो रहा था।
उसने निशा से कहा—
“मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया।”
निशा शांत आवाज़ में बोली—
“गलती की सजा जिंदगी खुद दे देती है।”
इसके बाद वह वहां से चली गई।
आज निशा गरीब लड़कियों की मदद करती थी। जो लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती थीं, निशा उन्हें मुफ्त में पढ़ाती और आगे बढ़ने की हिम्मत देती।
वह हमेशा एक बात कहती—
“गरीबी इंसान की मजबूरी हो सकती है, लेकिन हार मान लेना उसकी सबसे बड़ी कमजोरी होती है।”
दोस्तों, इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि जिंदगी में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, अगर इंसान खुद पर भरोसा रखे और मेहनत करता रहे तो एक दिन जरूर सफल होता है। कोई भी परिस्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती। मेहनत और हिम्मत इंसान की किस्मत बदल सकती है।

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