जब बहू ने निभाया असली फर्ज

 

Indian daughter-in-law stitching clothes while caring for elderly in emotional family scene


बरामदे में रखी पुरानी सिलाई मशीन की चर्र-चर्र आवाज पूरे घर में गूंज रही थी। मशीन के पास बैठी सुनीता तेजी से कपड़े सिल रही थी। उसके माथे पर पसीना था, लेकिन हाथ बिना रुके चल रहे थे।


उधर कमरे में बैठे उसके पति अजय मोबाइल पर ऑनलाइन शॉपिंग देख रहे थे। अचानक खुश होकर बोले—


“वाह! आखिर मिल ही गई। यही बाइक लेनी थी मुझे।”


सुनीता ने मशीन रोककर पूछा, “कौन सी बाइक?”


अजय उत्साह में बोला, “नई स्पोर्ट्स बाइक। ऑफिस में सबके पास अच्छी बाइक है। अब मैं भी यही लूँगा।”


सुनीता ने धीरे से कहा, “पर आपकी पुरानी बाइक तो अभी ठीक चल रही है ना?”


अजय बोला, “ठीक चल रही है, पर पुरानी हो गई है। आदमी को अपना स्टेटस भी देखना पड़ता है।”


सुनीता कुछ पल चुप रही, फिर बोली—


“अगर आप बुरा ना मानें तो एक बात कहूँ?”


“हाँ बोलो।”


“बाबूजी की दवा पिछले महीने से उधार में आ रही है। और माँ जी के घुटनों का दर्द भी बढ़ता जा रहा है। डॉक्टर ने कहा था कि उन्हें आराम वाली कुर्सी चाहिए…”


अजय का चेहरा तुरंत बदल गया।


“मतलब अब मैं अपने लिए कुछ भी ना खरीदूँ?”


“मैंने ऐसा कब कहा?”


“तो फिर हर बार मम्मी-पापा की जरूरतें सामने ले आती हो। तुम लोगों को लगता है मैं पैसे उड़ाता हूँ।”


सुनीता शांत आवाज में बोली, “मैं सिर्फ जरूरत बता रही हूँ।”


अजय झुंझलाकर बोला, “जरूरतें कभी खत्म नहीं होंगी। अभी मुझे अपनी जिंदगी भी देखनी है।”


इतना कहकर वो बाहर चला गया।


दरवाजे के पास बैठे उसके पिता रामप्रसाद जी सारी बातें सुन चुके थे। उन्होंने गहरी सांस ली और चुपचाप अपना पुराना चश्मा ठीक करने लगे, जिसकी एक डंडी धागे से बंधी हुई थी।


कुछ दिन बाद अजय नई बाइक लेकर घर आया। पूरे मोहल्ले में बाइक की चर्चा होने लगी।


अजय बड़े गर्व से सबको दिखा रहा था।


लेकिन उसी वक्त उसकी माँ शारदा देवी रसोई में खांसते-खांसते बैठ गईं।


सुनीता तुरंत पानी लेकर दौड़ी।


“माँ जी, आराम कर लीजिए।”


शारदा देवी मुस्कुराईं—


“बहु, तेरे भरोसे ही तो ये घर चल रहा है।”


उधर अजय दोस्तों के साथ बाइक की फोटो खिंचवाने में लगा था।


सर्दियां बढ़ने लगी थीं।


रामप्रसाद जी रात को पुराने स्वेटर में ठंड से कांपते रहते, लेकिन कभी बेटे से कुछ नहीं कहते।


एक रात सुनीता उठी तो देखा कि उसके ससुर कुर्सी पर बैठे हैं और उनके हाथ ठंड से कांप रहे हैं।


वो बोली, “बाबूजी, आप सोए नहीं?”


रामप्रसाद जी मुस्कुराकर बोले, “बस नींद नहीं आ रही थी।”


लेकिन सुनीता समझ गई थी कि उन्हें ठंड लग रही है।


अगले दिन वो चुपचाप बाजार गई।


अपने लिए कुछ ना लेकर आई।


घर लौटी तो उसके हाथ में एक गर्म शॉल, नया स्वेटर और दवाइयों का पैकेट था।


अजय ने देखा तो फिर नाराज हो गया।


“फिर खर्चा कर आई?”


सुनीता बोली, “जरूरी सामान था।”


अजय बोला, “तुम्हें पैसे बचाना कभी आएगा भी या नहीं?”


तभी रामप्रसाद जी पहली बार ऊँची आवाज में बोले—


“बस करो अजय!”


पूरा घर शांत हो गया।


अजय हैरानी से पिता को देखने लगा।


रामप्रसाद जी बोले—


“जिस लड़की ने इस घर को अपना घर समझा, तुम उसी को ताने देते रहते हो।”


अजय चुप रहा।


शारदा देवी भी बाहर आ गईं।


उन्होंने कहा—


“तुझे पता भी है बहु अपने लिए पिछले एक साल से नई साड़ी तक नहीं लाई।”


अजय ने पहली बार ध्यान से सुनीता को देखा।


सच में… उसकी चप्पल तक टूटी हुई थी।


रामप्रसाद जी बोले—


“तू नई बाइक लेकर खुश हो गया। लेकिन कभी ये नहीं देखा कि तेरी माँ दवाई आधी करके खा रही है ताकि खर्च कम हो।”


अजय के चेहरे का रंग उड़ गया।


शारदा देवी बोलीं—


“और बहु… बहु हर महीने अपने सिलाई के पैसों से हमारी दवाई ले आती है।”


अजय चौंक पड़ा।


“क्या?”


सुनीता बोली, “मैं नहीं चाहती थी आपको पता चले।”


अजय के हाथ से बाइक की चाबी नीचे गिर गई।


उसे याद आया—


कई बार उसने देखा था कि सुनीता देर रात तक सिलाई करती रहती है।


लेकिन उसने कभी जानने की कोशिश ही नहीं की कि वो ऐसा क्यों करती है।


उसकी आँखें नम हो गईं।


वो धीरे से बोला—


“मैं इतना बदल गया था…”


फिर सुनीता के सामने हाथ जोड़कर बोला—


“मुझे माफ कर दो। मैं अपने शौक में इतना खो गया कि घरवालों की तकलीफ ही नहीं देख पाया।”


सुनीता बोली, “गलती समझ आ जाए तो इंसान बुरा नहीं रहता।”


अजय तुरंत उठा और अपनी नई बाइक की तरफ देखने लगा।


कुछ देर बाद बोला—


“ये बाइक कल ही बेच दूँगा।”


सुनीता घबरा गई।


“नहीं, इसकी जरूरत नहीं…”


लेकिन अजय बोला—


“जरूरत है। सबसे पहले बाबूजी का इलाज होगा और माँ के लिए आराम वाली कुर्सी आएगी।”


रामप्रसाद जी की आँखें भर आईं।


उन्होंने बेटे के कंधे पर हाथ रखकर कहा—


“बेटा, माँ-बाप को महंगे सामान नहीं चाहिए होते। बस इतना चाहिए कि उनका बेटा उन्हें बोझ ना समझे।”


उस दिन के बाद अजय सचमुच बदल गया।


अब वो जब भी घर आता, सबसे पहले अपने माता-पिता के कमरे में जाता।


कभी माँ के लिए फल लाता, कभी पिता के लिए दवाई।


और सुनीता…


वो हर बार मुस्कुरा देती।


क्योंकि उसे अब यकीन हो गया था कि रिश्ते तब सुंदर बनते हैं जब इंसान सिर्फ अपने लिए नहीं, अपनों के लिए भी जीना सीख जाए।



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