खुद को मिटाकर जीती रही वो

 

Indian housewife smiling softly while singing in kitchen as her husband watches emotionally in a warm family home


कॉलोनी के पीछे बनी तंग गली में जैसे ही किसी घर से हँसी की तेज़ आवाज़ आती, लोग बिना देखे समझ जाते—“अरे, रिद्धिमा आ गयी होगी ऑफिस से।”


वो सचमुच ऐसी ही थी…हर जगह मौजूद।

कभी छत पर कपड़े उतारते-उतारते गाना गुनगुनाने लगती, कभी पड़ोस की बच्चों को होमवर्क करा देती, कभी सड़क पर बैठी बूढ़ी अम्मा को दवाई ला देती।


पूरा मोहल्ला उसे “रेडियो” कहता था।


उसकी माँ अक्सर झुंझला कर कहतीं, “इतना बोलती है लड़की…ससुराल वाले दो दिन में वापस छोड़ जाएंगे।”


और वो हँसकर जवाब देती, “तो क्या हुआ…आपके पास वापस आ जाऊँगी।”


तभी पीछे से उसका छोटा भाई चिल्लाता, “कोई वापस नहीं करेगा…बस मुँह में टेप चिपका देंगे।”


“राहुलsss…”


और फिर वही रोज़ का दृश्य…

वो चप्पल लेकर उसके पीछे भागती…राहुल पूरे घर में दौड़ता…माँ माथा पकड़ लेतीं।


पापा अखबार से नज़र उठाकर मुस्कुराते हुए कहते,

“अगर तुम दोनों की कुश्ती खत्म हो गई हो… तो इस बेचारे आदमी को एक कप चाय भी मिल सकती है क्या?”


घर छोटा था…पर उसमें अपनापन बहुत बड़ा था।


रिद्धिमा बैंक में नौकरी करती थी।

सुबह भागते-दौड़ते निकलती…शाम लौटते ही कभी रसोई में माँ का हाथ बँटाती, कभी पापा के पैर दबाती।


उसकी बड़ी बहन नेहा की शादी हो चुकी थी।

पर नेहा रोज़ वीडियो कॉल कर लिया करती।


“क्या पहन कर गयी थी ऑफिस?”


“आज फिर लेट पहुँची ना?”


“और सुन…इतना भरोसा सब पर मत किया कर।”


रिद्धिमा हँस देती।


“दीदी…दुनिया इतनी भी खराब नहीं होती।”


नेहा अक्सर चुप हो जाती।

क्योंकि वह जानती थी…दुनिया सचमुच इतनी आसान नहीं होती।



एक दिन रिश्ते की बात आयी।


लड़का बहुत अच्छी नौकरी में था।

अपना फ्लैट…गाड़ी…अच्छा परिवार।


सबसे बड़ी बात—“बहू नौकरी करे हमें कोई दिक्कत नहीं।”


बस यही सुनकर पापा मान गए।


रिद्धिमा ने लड़के को पहली बार होटल में देखा।


वह बहुत कम बोल रहा था।

उसने सोचा—शायद शर्मीला होगा।


उसने हल्की मुस्कान के साथ पूछा, “आपको घूमना-फिरना पसंद है?”


लड़के ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया, “ज़्यादा समय नहीं मिल पाता।”


उसने फिर बात आगे बढ़ाने की कोशिश की, “फिल्में देखते हैं?”


“बहुत कम।”


“दोस्तों के साथ बाहर जाना…मस्ती करना?”


“मुझे ज्यादा मेलजोल पसंद नहीं।”


बातचीत पाँच मिनट में खत्म हो गयी।


घर लौटते वक्त माँ ने पूछा, “कैसा लगा?”


वो थोड़ी देर सोचती रही।


“अच्छे लग रहे हैं…बस थोड़े शांत हैं।”


माँ ने राहत की साँस ली।


“अच्छा है…तुम जैसी चंचल लड़की को शांत पति ही संभाल पाएगा।”


उसे यह बात मज़ाक लगी थी।


पर शादी के बाद धीरे-धीरे समझ आया…कुछ लोग शांत नहीं होते…बस भीतर से बंद होते हैं।



ससुराल बहुत व्यवस्थित घर था।


हर चीज़ समय से।


कौन कब उठेगा…कौन कहाँ बैठेगा…किस समय खाना बनेगा…सब तय।


पहले ही दिन सास ने कहा,

“हमारे घर में ज़ोर से हँसना अच्छा नहीं लगता।”


रिद्धिमा को लगा…शायद मज़ाक होगा।


पर नहीं था।


दूसरे दिन उसने काम करते-करते गाना गुनगुनाया तो ससुर जी ने अखबार मोड़े बिना कहा,

“टीवी कम आवाज़ में भी चल सकता है।”


वो एक पल को समझी ही नहीं।


फिर एहसास हुआ…वो उसके गाने की बात कर रहे थे।


धीरे-धीरे उसने गाना कम कर दिया।


फिर लगभग बंद।


पति विवेक सुबह ऑफिस जाते…रात लौटकर लैपटॉप खोल लेते।


वो इंतज़ार करती…आज शायद पूछेंगे—


“दिन कैसा था?”


पर अक्सर बस इतना सुनाई देता—


“चाय मिलेगी?”


या


“मेरी नीली फाइल कहाँ है?”


एक दिन उसने हिम्मत करके कहा,

“कहीं बाहर चलते हैं ना…”


विवेक ने स्क्रीन से नज़र हटाए बिना कहा,

“भीड़ पसंद नहीं।”


“तो कहीं शांत जगह चलेंगे।”


“घर से ज्यादा शांत कहाँ मिलेगा?”


उसके पास कोई जवाब नहीं था।



धीरे-धीरे उसने खुद को उस घर के हिसाब से बदलना शुरू कर दिया।


चलना धीरे।

बोलना कम।

हँसना कम।

माँ को रोज़ फोन करना कम।


उसे लगा…शायद यही परिपक्व होना होता है।


कुछ महीनों बाद देवर की शादी हो गयी।


नई बहू—सान्या।


पहले ही दिन देर तक सोती रही।


सास नाराज़ थीं।

रिद्धिमा खुद चाय बनाकर कमरे में दे आयी।


सान्या ने बिना संकोच कहा,

“भाभी…मैं ना सुबह जल्दी उठ ही नहीं पाती।”


रिद्धिमा मुस्कुरा दी।


“कोई बात नहीं…आदत हो जाएगी।”


पर आदत कभी नहीं हुई।


सान्या खुलकर हँसती थी।

मन हो तो खाना बनाती…मन ना हो तो बाहर से ऑर्डर।


देवर उसे लेकर हर वीकेंड घूमने जाता।


और आश्चर्य की बात…घर में किसी को बुरा नहीं लगता था।


सास मुस्कुराकर कहतीं,

“नई पीढ़ी है…थोड़ी अलग होती है।”


रिद्धिमा कई बार सोचती—


“जब मैं अलग थी…तब किसी ने मुझे अलग होने दिया था क्या?”



एक दिन उसे तेज़ बुखार था।


शरीर काँप रहा था।


फिर भी उसने सबके लिए नाश्ता बनाया।


सान्या कमरे से निकली और बोली,

“अरे भाभी…आपकी तबीयत खराब है क्या?”


“थोड़ा बुखार है।”


“तो आप आराम करो ना।”


वो हल्का सा हँस दी।


“घर का काम कौन करेगा?”


सान्या ने बिल्कुल सहज स्वर में कहा,

“जो रोज़ नहीं करते…आज वो कर लेंगे।”


इतनी साधारण सी बात…


पर रिद्धिमा के भीतर कुछ हिल गया।


क्या सचमुच…ऐसा भी हो सकता है?


उस दिन पहली बार उसने अपने कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद किया।


बाहर घर का सारा काम वैसे ही चलता रहा।

किसी को कोई खास परेशानी नहीं हुई।

रसोई भी संभल गयी…चाय भी बन गयी…और सबने समय पर खाना भी खा लिया।


उसे पहली बार एहसास हुआ—

जिसे वह वर्षों से अपने बिना असंभव समझती रही,

वो सब उसके बिना भी हो सकता था।


दुनिया सचमुच उसके कंधों पर नहीं टिकी थी…

बस उसने ही खुद को हर जिम्मेदारी का अकेला आधार बना लिया था।


शाम को विवेक कमरे में आए।


“कैसी हो अब?”


वो चुप रही।


फिर उसने धीमे स्वर में कहा—


“अगर एक दिन मैं कोई काम ना करूँ…तो क्या सचमुच इस घर की ज़िंदगी रुक जाएगी?”


विवेक ने पहली बार लैपटॉप एक तरफ रखकर उसकी ओर गौर से देखा।


“क्या हुआ है तुम्हें?”


इतने वर्षों से भीतर दबे शब्द जैसे अचानक रास्ता पा गए।


उसकी आँखें भर आयीं। होंठ काँपे, फिर बड़ी मुश्किल से बोली—


“मैं थक जाती हूँ, विवेक… बहुत थक जाती हूँ।

हर किसी की जरूरत, हर किसी का समय, हर किसी की पसंद याद रहती है मुझे… पर मैं क्या महसूस करती हूँ, ये किसी को याद नहीं रहता।

इस घर में मैं सबके लिए हूँ… पर मेरे लिए कोई नहीं है।”


कमरे में सन्नाटा फैल गया।


वो हल्की कड़वाहट भरी हँसी हँस दी।


“कभी-कभी लगता है…मैं इस घर की बहू नहीं… बस एक ऐसी व्यवस्था बनकर रह गयी हूँ, जो बिना रुके चलती रहनी चाहिए।

पर मैं भी इंसान हूँ विवेक… मुझे भी आराम चाहिए… अपनापन चाहिए… दो मीठे शब्द चाहिए…”


कमरे में लंबी चुप्पी फैल गयी।


शायद विवेक पहली बार उसे सुन रहे थे।


सचमुच सुन रहे थे।



उसके बाद सब अचानक नहीं बदला।


पर थोड़ा-थोड़ा बदलने लगा।


उसने हर जिम्मेदारी अपने सिर लेना बंद किया।


रविवार को देर तक सोना शुरू किया।


पुरानी सहेलियों से मिलना शुरू किया।


ऑफिस के बाद कभी-कभी खुद के लिए कॉफी पीने चली जाती।


और सबसे बड़ी बात…


उसने फिर से गाना शुरू कर दिया।


पहले धीरे-धीरे।


फिर खुलकर।


एक दिन रसोई में काम करते हुए वही पुराना गीत गुनगुना रही थी—


“रिमझिम गिरे सावन…”


तभी पीछे से आवाज़ आयी—


“आप अच्छा गाती हैं।”


वो पलटी।


विवेक दरवाजे पर खड़े थे।


सालों बाद पहली बार उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।


उसने मज़ाक में कहा,

“अब आवाज़ से किसी को परेशानी तो नहीं होगी?”


विवेक कुछ पल चुप रहे।


फिर धीमे स्वर में बोले—


“शायद…घर में यही आवाज़ कम थी।”



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