बराबरी सिर्फ संपत्ति में क्यों?

 

Indian family discussing property rights and family responsibilities during an emotional conversation at home


बरामदे में रखी घड़ी रात के नौ बजने का इशारा कर रही थी। बाहर हल्की बारिश हो रही थी और छत से गिरती बूंदों की आवाज पूरे घर में गूंज रही थी। लेकिन घर के अंदर का माहौल मौसम से भी ज्यादा भारी था।


डाइनिंग टेबल पर खाना लगा हुआ था, मगर किसी का खाने में मन नहीं था।


नेहा रसोई से आखिरी कटोरी लेकर बाहर आई तो उसने देखा—उसकी सास शारदा देवी सोफे पर बैठी थीं, चेहरा तना हुआ था। सामने उसके पति रोहित चुपचाप बैठे थे और उनकी छोटी बहन प्रिया मोबाइल हाथ में लिए बार-बार किसी से चैट कर रही थी।


नेहा समझ गई कि फिर कोई नई बात होने वाली है।


“भैया, मैंने फैसला कर लिया है,” प्रिया ने अचानक मोबाइल मेज पर रखते हुए कहा, “मैं और अमित नया फ्लैट खरीद रहे हैं। डाउन पेमेंट के लिए बीस लाख की जरूरत है। पापा की जो एफडी और प्लॉट है, उसमें मेरा भी बराबर का हक है।”


रोहित ने धीरे से कहा, “प्रिया, पापा की बीमारी में बहुत पैसा लग चुका है। अभी घर की हालत—”


“तो क्या हुआ?” प्रिया ने बात काट दी। “मैं बेटी हूँ इस घर की। कोई एहसान नहीं मांग रही। कानून ने बेटियों को बराबरी का अधिकार दिया है।”


शारदा देवी तुरंत बेटी के पक्ष में बोलीं, “बिल्कुल सही कह रही है प्रिया। बेटा-बेटी बराबर होते हैं। रोहित, तू अगले महीने प्लॉट बेच दे।”


रोहित ने सिर झुका लिया। उसकी आंखों में थकान साफ दिखाई दे रही थी।


नेहा अब तक चुप थी। उसने पानी का गिलास मेज पर रखा और शांत आवाज में बोली—


“मांजी, प्रिया दीदी बिल्कुल सही कह रही हैं। बेटी को बराबरी का हक मिलना चाहिए।”


प्रिया के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।


“देखा मम्मी? कम से कम भाभी तो समझती हैं।”


नेहा ने धीरे से कहा, “लेकिन बराबरी सिर्फ हिस्से में ही क्यों हो? जिम्मेदारियों में क्यों नहीं?”


कमरे का माहौल अचानक बदल गया।


शारदा देवी ने भौंहें चढ़ाईं, “क्या कहना चाहती है तू?”


नेहा अंदर गई और एक फाइल लेकर वापस आई। उसने फाइल खोलकर मेज पर रख दी।


“पिछले डेढ़ साल में पापा जी के इलाज में अठारह लाख रुपये लगे। रोहित ने अपनी सारी सेविंग खत्म कर दी। फिर बैंक से लोन लिया। उसके अलावा इस घर की मरम्मत के लिए सात लाख का कर्ज और है।”


प्रिया चुप हो गई।


नेहा ने आगे कहा, “कुल मिलाकर पच्चीस लाख का कर्ज है। और जिस प्लॉट की बात हो रही है, उसकी कीमत करीब चालीस लाख है।”


प्रिया ने तुरंत कहा, “तो उसमें से बीस लाख मुझे मिलेंगे।”


नेहा ने उसकी तरफ देखा।


“ठीक है दीदी। लेकिन पहले पच्चीस लाख का कर्ज हटेगा। क्योंकि वो भी इसी परिवार और पापा जी पर खर्च हुआ है। उसके बाद जो पंद्रह लाख बचेंगे, वो बराबर बांट लेते हैं। साढ़े सात लाख आपके, साढ़े सात हमारे।”


“वाह भाभी!” प्रिया तिलमिलाकर बोली, “जब जिम्मेदारी निभाने की बात आती है तो सब बेटी के सिर डाल देते हैं।”


नेहा मुस्कुराई।


“और जब संपत्ति लेने की बात आती है तो बेटी बराबरी याद दिलाती है। बात सिर्फ इतनी है दीदी कि रिश्ते सुविधा देखकर नहीं बदलने चाहिए।”


शारदा देवी गुस्से में बोलीं, “बहू, तू मेरी बेटी को लालची कह रही है?”


“नहीं मांजी,” नेहा ने शांत स्वर में कहा, “मैं सिर्फ एक सीधा सवाल पूछ रही हूँ। अगर बेटी को पिता की संपत्ति में बराबरी चाहिए, तो क्या पिता के दुख, इलाज और कर्ज में उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं?”


रोहित पहली बार बोला।


“मां, मैंने कभी प्रिया को पराया नहीं माना। लेकिन सच यह है कि हर महीने मेरी आधी तनख्वाह ईएमआई में चली जाती है। नेहा नौकरी न करे तो घर चलाना मुश्किल हो जाए।”


प्रिया ने नाराज होकर कहा, “तो क्या मैं अपने सपने छोड़ दूं?”


नेहा ने तुरंत जवाब दिया, “नहीं दीदी। सपने सबको पूरे करने चाहिए। लेकिन अपने सपनों की कीमत सिर्फ एक इंसान क्यों चुकाए?”


कमरे में सन्नाटा छा गया।


बाहर बारिश और तेज हो चुकी थी।


शारदा देवी ने धीरे से कहा, “लेकिन समाज में हमेशा बेटा ही मां-बाप की जिम्मेदारी उठाता आया है।”


नेहा ने विनम्र आवाज में कहा, “तो फिर समाज में हमेशा संपत्ति भी बेटे को ही मिलती थी मांजी। अगर हम नई सोच अपनाते हैं, तो उसे पूरा अपनाना होगा। आधी पुरानी और आधी नई सोच से सिर्फ अन्याय पैदा होता है।”


प्रिया की आंखें झुक गईं।


उसे याद आया—पिछले साल जब पापा अस्पताल में थे, तब वह सिर्फ दो दिन के लिए आई थी। बाकी महीनों रोहित और नेहा ही अस्पताल के चक्कर लगाते रहे थे। नेहा ने अपनी ज्वेलरी तक बेच दी थी, मगर कभी किसी से जिक्र नहीं किया।


रोहित ने धीमे स्वर में कहा, “प्रिया, अगर तू कहे तो मैं तुझे पैसे दे दूंगा। लेकिन फिर सच में हम कर्ज में डूब जाएंगे।”


पहली बार प्रिया के चेहरे पर ग्लानि दिखाई दी।


उसने धीरे से पूछा, “भाभी… आपने अपने गहने सच में बेच दिए थे?”


नेहा हल्का सा मुस्कुराई।


“घर बचाने के लिए कभी-कभी औरतें अपने शौक नहीं, अपनी यादें बेचती हैं दीदी।”


प्रिया की आंखें भर आईं।


कुछ पल बाद उसने धीमी आवाज में कहा, “भैया… मुझे हिस्सा चाहिए, लेकिन सिर्फ अधिकार वाला नहीं। जिम्मेदारी वाला भी।”


सबने उसकी तरफ देखा।


प्रिया ने आगे कहा, “प्लॉट बिके तो पहले पूरा कर्ज खत्म होगा। बाकी जो बचेगा, उसमें से मेरा हिस्सा बाद में देख लेंगे। अभी जरूरी यह है कि घर बोझ से बाहर निकले।”


शारदा देवी हैरानी से बेटी को देखने लगीं।


रोहित की आंखें नम हो गईं।


नेहा चुपचाप उठी और रसोई की तरफ चली गई।


पीछे अब भी खामोशी थी… लेकिन इस बार वह बोझ वाली नहीं, समझदारी वाली खामोशी थी।


कई बार घर रिश्तों से नहीं टूटते…

दोहरे मापदंडों से टूटते हैं।

और कई बार एक सही सवाल ही पूरे परिवार का आईना बन जाता है।



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