जब बेटे को मां की बीमारी का सच पता चला

 

Emotional family moment at a crowded Indian railway station as a mother reunites with her son and future daughter-in-law.


रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर असामान्य भीड़ थी। लोग अपने-अपने सामान के साथ इधर-उधर भाग रहे थे। चाय वालों की आवाजें, बच्चों की शरारतें और आती-जाती ट्रेनों की तेज़ सीटी पूरे माहौल को शोर से भर रही थीं।


भीड़ के बीच खड़ी थी डॉ. रागिनी। हाथ में छोटा-सा बैग था और आंखों में अजीब-सी बेचैनी। बार-बार उनकी नजर स्टेशन के मुख्य द्वार पर जा रही थी।


तभी पीछे से आवाज आई—


“मां…”


रागिनी पलटीं तो सामने उनका बेटा ऋतिक खड़ा था। चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान, लेकिन आंखों में शिकायत साफ दिखाई दे रही थी।


“आप सच में चली जातीं? बिना मुझे बताए?” उसने धीमे स्वर में पूछा।


रागिनी ने नजरें झुका लीं।


“मैं सिर्फ कुछ दिनों के लिए जा रही थी बेटा…”


“झूठ मत बोलिए मां। आपके कमरे में जो फाइल मिली है, उस में सब लिखा था।”


रागिनी का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया।


पास खड़ी प्रिया दोनों मां-बेटे को बेचैनी से देख रही थी। वह अभी तक पूरी तरह समझ ही नहीं पाई थी कि आखिर अचानक ऐसा क्या हो गया। कुछ देर पहले तक आत्मविश्वास से भरी और हर परिस्थिति में शांत रहने वाली डॉ. रागिनी उसे एक मजबूत महिला लगी थीं, लेकिन इस समय उनके चेहरे पर ऐसा दर्द दिखाई दे रहा था जैसे कोई पुराना घाव अचानक फिर से हरा हो गया हो।


प्रिया ऋतिक की होने वाली पत्नी थी। दोनों ने साथ में एमबीए किया था और पिछले ढाई साल से एक-दूसरे को पसंद करते थे। ऋतिक कई बार अपनी मां के बारे में उससे बातें करता था—कैसे रागिनी ने अकेले संघर्ष करके उसे बड़ा किया, कैसे उन्होंने कभी किसी परेशानी के आगे हार नहीं मानी। यही वजह थी कि प्रिया के मन में रागिनी के लिए पहले से ही बहुत सम्मान था।


लेकिन आज उन्हें इस हालत में देखकर प्रिया खुद घबरा गई थी।


कुछ देर तक तीनों चुप खड़े रहे।


फिर ऋतिक ने कांपती आवाज में कहा—


“मां, आप को इतनी बड़ी बीमारी है और आपने मुझे बताया तक नहीं?”


रागिनी की आंखें भर आईं।


“मैं तुम्हारी खुशियों के बीच अपनी बीमारी का बोझ नहीं डालना चाहती थी।”


“खुशियां?” ऋतिक की आवाज ऊंची हो गई, “जिस मां ने पूरी जिंदगी मेरे लिए अकेले संघर्ष किया, वही मां आज दर्द में है और मैं खुश रहूं?”


पास से गुजरते लोग मुड़-मुड़ कर देखने लगे।


रागिनी ने बेटे का हाथ पकड़ लिया।


“बेटा, मैं नहीं चाहती थी कि तुम्हारी जिंदगी रुक जाए।”


“और मैं नहीं चाहता कि आप अकेली लड़ाई लड़ें।”


प्रिया आगे बढ़ी और धीरे से रागिनी के पास बैठ गई।


“मम्मी…” उसने पहली बार उन्हें इस नाम से पुकारा, “अब यह सिर्फ आपकी लड़ाई नहीं है।”


रागिनी ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।


प्रिया की आंखों में आंसू थे।


“जिस दिन मैं आप से मिली थी, उसी दिन समझ गई थी कि ऋतिक इतना अच्छा इंसान क्यों है। आप जैसी मां हर किसी को नहीं मिलती।”


रागिनी की पलकों से आंसू बह निकले।


उन्हें अचानक कई साल पुरानी बातें याद आने लगीं…


वह दिन जब उनके पति अचानक उन्हें और छोटे से ऋतिक को छोड़ कर चले गए थे।


उस रात घर में सिर्फ सन्नाटा था। रिश्तेदार सहानुभूति जता रहे थे, लेकिन कोई साथ देने को तैयार नहीं था।


एक रिश्तेदार ने तो साफ कह दिया था—


“रागिनी, अकेली औरत बच्चे को संभाल नहीं पाएगी। दूसरी शादी कर लो।”


लेकिन रागिनी ने उसी दिन फैसला कर लिया था कि वह अपने बेटे को किसी कमी का एहसास नहीं होने देंगी।


दिन में अस्पताल की नौकरी, रात में प्राइवेट क्लिनिक।


कई-कई रातें बिना सोए गुजर जातीं।


कभी ऋतिक को गोद में लेकर अस्पताल की ड्यूटी करनी पड़ती, तो कभी खुद भूखा रह कर बेटे की फीस भरनी पड़ती।


धीरे-धीरे समय बदलता गया।


ऋतिक बड़ा हो गया। पढ़ाई में तेज़ था। एमबीए के बाद उसे अच्छी नौकरी मिल गई।


रागिनी को लगता था अब जिंदगी आसान हो जाएगी।


लेकिन कुछ महीनों पहले अचानक उन्हें कमजोरी महसूस होने लगी।


जांच करवाई तो पता चला कि उन्हें गंभीर बीमारी है।


रिपोर्ट हाथ में आते ही उनके पैरों तले जमीन खिसक गई थी।


उस दिन अस्पताल के कॉरिडोर में वह काफी देर तक अकेली बैठी रही थीं।


डॉ. रजत ने समझाया भी था—


“इलाज संभव है रागिनी, लेकिन तुम्हें हिम्मत रखनी होगी।”


पर रागिनी को सबसे ज्यादा डर अपने बेटे की जिंदगी को लेकर था।


उन्हें लगा अगर ऋतिक को सच्चाई पता चली तो वह अपनी सारी खुशियां छोड़ देगा।


इसलिए उन्होंने चुप रहने का फैसला किया।


लेकिन आज स्टेशन पर सब सामने आ चुका था।


ऋतिक ने मां के हाथ अपने हाथों में ले लिए।


“आप हमेशा मेरी ताकत बनी रहीं। अब मेरी बारी है।”


रागिनी कुछ बोल ही नहीं पाईं।


प्रिया मुस्कराई।


“और वैसे भी… अभी तो मुझे अपनी सास के साथ ढेर सारी शॉपिंग करनी है।”


इतना सुनते ही माहौल थोड़ा हल्का हो गया।


रागिनी हल्का-सा मुस्कराईं।


उसी समय डॉ. रजत भी वहां पहुंच गए।


“अरे वाह… मरीज यहां भागने की तैयारी में थी और परिवार ने पकड़ लिया।”


ऋतिक ने गंभीर होकर पूछा—


“अंकल, सच-सच बताइए… मां ठीक हो जाएंगी न?”


डॉ. रजत ने शांत स्वर में कहा—


“बीमारी मुश्किल जरूर है, लेकिन नामुमकिन नहीं। सबसे जरूरी है परिवार का साथ।”


ऋतिक ने तुरंत टिकट फाड़ कर कूड़ेदान में डाल दिया।


“अब कहीं नहीं जाएंगी मां।”


रागिनी हैरानी से बेटे को देखती रह गईं।


“पागल लड़के…”


“हां मां,” ऋतिक मुस्कराया, “आप का बेटा हूं न।”


कुछ दिनों बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था।


जहां पहले खामोशी रहती थी, वहां अब हंसी सुनाई देती।


प्रिया रोज अस्पताल साथ जाती।


ऋतिक मां के लिए खुद खाना बनाना सीख गया था।


एक दिन रागिनी दवा लेकर कमरे से बाहर आईं तो देखा—


रसोई में ऋतिक और प्रिया दोनों आटे से सने हुए खड़े थे।


पूरा किचन अस्त-व्यस्त था।


“हे भगवान… यह क्या हाल बना दिया तुम दोनों ने?” रागिनी हंस पड़ीं।


ऋतिक ने गर्व से कहा—


“मां, आज हम ने आपके लिए गोल रोटियां बनाई हैं।”


रागिनी ने रोटी हाथ में ली।


वह रोटी दुनिया की सबसे टेढ़ी रोटी थी।


लेकिन उसे देखते ही उनकी आंखें भर आईं।


उन्हें एहसास हुआ—


बीमारी शरीर को कमजोर कर सकती है, इंसान को नहीं… अगर अपने साथ हों।


कुछ महीनों बाद अस्पताल में आखिरी रिपोर्ट देखते हुए डॉ. रजत मुस्कराए।


“कांग्रेचुलेशन डॉ. रागिनी… अब खतरा काफी कम हो चुका है।”


रागिनी की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले।


बाहर खड़े ऋतिक और प्रिया दौड़ कर अंदर आए।


“मां ठीक हो गईं?” ऋतिक ने उत्सुकता से पूछा।


“हां,” डॉ. रजत हंस पड़े, “अब तुम्हारी मां पहले से ज्यादा मजबूत हो गई हैं।”


ऋतिक ने तुरंत मां को गले लगा लिया।


रागिनी ने बेटे और प्रिया दोनों को अपनी बांहों में भर लिया।


उनके चेहरे पर संतोष था।


क्योंकि जिंदगी ने आखिरकार उन्हें वह खुशी दे दी थी, जिसका इंतजार उन्होंने बरसों किया था।



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