एक झूठ जिसने दोस्ती बदल दी
सुबह का समय था। मुंबई की बारिश अभी-अभी थमी थी। सरकारी बैंक की पुरानी इमारत के बाहर लोग छाते झाड़ते हुए अंदर जा रहे थे। अंदर कैश काउंटरों पर हलचल शुरू हो चुकी थी।
उसी शाखा में काम करते थे दो पुराने सहकर्मी — शेखावत साहब और थॉमस सर।
शेखावत साहब राजस्थान के बीकानेर से थे। शांत स्वभाव, कम बोलने वाले और हर खर्च सोच-समझकर करने वाले इंसान। दूसरी ओर थॉमस सर केरल के कोच्चि से थे। हमेशा मुस्कुराते रहने वाले, मिलनसार और रिश्तों को दिल से निभाने वाले।
दोनों की दोस्ती पूरे बैंक में मशहूर थी।
थॉमस सर जब भी छुट्टियों में अपने गाँव जाते, लौटते समय शेखावत परिवार के लिए कुछ न कुछ ज़रूर लाते—केले के चिप्स, नारियल की मिठाइयाँ, मसाले और उनकी पत्नी के लिए सुंदर कसावु साड़ी।
हर बार शेखावत साहब असहज हो जाते।
“आप हर बार इतना सब क्यों ले आते हैं?” वे कहते।
थॉमस सर हँसते हुए जवाब देते— “अपने लोगों के लिए लाया सामान बोझ नहीं होता।”
शेखावत साहब बाहर से मुस्कुरा देते, लेकिन भीतर कहीं एक झिझक बैठी रहती। वे भी कई बार सोचते कि बीकानेर जाकर थॉमस सर के लिए भुजिया, राजस्थानी पगड़ी या कोई खास चीज़ लाएँगे। मगर फिर मन में हिसाब-किताब शुरू हो जाता।
“इतना खर्च करने की क्या ज़रूरत… मुंबई में सब मिल जाता है…”
और बात वहीं खत्म हो जाती।
समय ऐसे ही बीतता रहा।
एक दिन बैंक में अचानक बड़ी समस्या खड़ी हो गई। ऑडिट चल रहा था और काम का दबाव बहुत ज्यादा था। उसी बीच शेखावत साहब के पास गाँव से फोन आया कि उनकी माँ की तबीयत खराब है।
वे तुरंत मैनेजर के पास छुट्टी माँगने पहुँचे।
मैनेजर ने फाइल बंद करते हुए कहा— “अभी छुट्टी असंभव है। ऑडिट खत्म होने तक कोई छुट्टी नहीं मिलेगी।”
शेखावत साहब उदास होकर अपनी सीट पर लौट आए।
थॉमस सर ने पूछा— “क्या हुआ?”
उन्होंने सारी बात बता दी।
थॉमस सर तुरंत मैनेजर के केबिन में गए।
करीब दस मिनट बाद दोनों बाहर निकले।
मैनेजर ने छुट्टी मंजूर कर दी थी।
शेखावत साहब हैरान थे।
“आपने क्या कहा?”
थॉमस सर मुस्कुराए— “बस इतना कि आपका काम मैं संभाल लूँगा।”
शेखावत साहब भावुक हो गए।
उन्होंने कहा— “इस बार गाँव से आपके लिए कुछ खास जरूर लाऊँगा।”
दो दिन बाद वे बीकानेर के लिए निकल गए।
लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था।
जयपुर पहुँचते ही उन्हें छोटे भाई का फोन आया— “भाभी के पिताजी का एक्सीडेंट हो गया है। हालत गंभीर है।”
परिवार सीधे अहमदाबाद निकल गया।
चार दिन अस्पताल और भागदौड़ में निकल गए। माँ से भी ठीक से मिलना नहीं हो पाया।
वापस मुंबई लौटते समय शेखावत साहब के मन में सबसे बड़ी चिंता यही थी कि अब थॉमस सर को क्या जवाब देंगे।
वे सच बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे।
मुंबई पहुँचकर उन्होंने स्टेशन के पास की दुकान से बीकानेरी भुजिया, मिठाइयाँ और एक राजस्थानी शोपीस खरीद लिया।
अगले दिन बैंक में थॉमस सर ने मुस्कुराकर पूछा— “कैसी रहीं छुट्टियाँ?”
शेखावत साहब बोले— “बहुत अच्छी… और ये आपके लिए।”
थॉमस सर ने खुशी से सामान रख लिया।
लेकिन उसके बाद उनके व्यवहार में हल्का बदलाव आने लगा।
पहले जैसी आत्मीयता नहीं रही।
वे अब औपचारिक होकर बात करते।
शेखावत साहब बेचैन रहने लगे।
एक शाम बैंक बंद होने के बाद उन्होंने पूछ ही लिया— “क्या मैंने कोई गलती की है?”
थॉमस सर कुछ पल चुप रहे।
फिर धीरे से बोले— “गलती सामान की नहीं… भरोसे की है।”
शेखावत साहब समझ गए कि बात खुल चुकी है।
थॉमस सर बोले— “आप जो भुजिया लाए थे, वही पैकेट कल मैंने दादर मार्केट में देखा। उसी दुकानदार ने बताया कि आपने परसों वहीं से खरीदा था।”
शेखावत साहब का चेहरा उतर गया।
थॉमस सर आगे बोले— “अगर आप सच बता देते तो मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगता। लेकिन आपने दोस्ती में दिखावा क्यों किया?”
अब शेखावत साहब खुद को रोक नहीं पाए।
उन्होंने पूरी सच्चाई बता दी।
सब सुनने के बाद थॉमस सर शांत स्वर में बोले— “देखिए, मैं आपके लाए सामान की कीमत नहीं देखता। मैं तो सिर्फ अपनापन देखता हूँ। लेकिन झूठ रिश्तों को अंदर से खोखला कर देता है।”
शेखावत साहब की आँखें भर आईं।
उन्होंने कहा— “मुझे लगा था सच बताऊँगा तो आप सोचेंगे कि मैं एहसान भूल गया।”
थॉमस सर हल्का सा मुस्कुराए— “सच्चे रिश्तों में हिसाब नहीं होता। वहाँ सिर्फ भरोसा होता है।”
उस दिन पहली बार शेखावत साहब को एहसास हुआ कि कई बार इंसान पैसे बचाने के चक्कर में रिश्तों की सबसे बड़ी पूँजी खोने लगता है — विश्वास।

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