शक के पीछे छुपा सबसे खूबसूरत सच

Emotional Indian family reunion inside a beautifully decorated art gallery and community center with children holding paint brushes


डाइनिंग टेबल पर रखा खाना पूरी तरह ठंडा हो चुका था, लेकिन नेहा अब तक कुर्सी पर उसी तरह बैठी थी। उसकी नजरें बार-बार दीवार पर लगी घड़ी पर जा टिकतीं और फिर मोबाइल स्क्रीन पर लौट आतीं। रात के दस बज चुके थे, लेकिन उसके पति आरव का कोई फोन नहीं आया था।


यह पहली बार नहीं था। पिछले कुछ महीनों से आरव का व्यवहार लगातार बदलता जा रहा था। पहले जो आदमी ऑफिस से लौटते ही सबसे पहले नेहा को आवाज लगाता था, वही अब घर आकर सीधे अपने कमरे में चला जाता था। खाने की मेज पर बातें कम हो गई थीं और फोन पर मुस्कुराहटें ज्यादा।


नेहा ने कई बार खुद को समझाया था कि शायद काम का दबाव होगा। लेकिन उसका दिल हर बार एक ही सवाल पूछता—क्या सचमुच सिर्फ काम ही वजह है?


घर में उनके अलावा एक और इंसान रहती थी—नेहा की चचेरी बहन सिया। दो साल पहले सिया के पिता की अचानक मृत्यु हो गई थी। उसके बाद से वह पढ़ाई के लिए नेहा के घर में ही रह रही थी। नेहा ने हमेशा उसे अपनी छोटी बहन से बढ़कर माना था।


सिया हंसमुख और बेहद समझदार लड़की थी। घर में उसकी मौजूदगी से पहले हमेशा रौनक रहती थी। लेकिन अब वह भी बदली-बदली रहने लगी थी। पहले जहां वह हर छोटी बात नेहा से साझा करती थी, वहीं अब अक्सर अपने कमरे में बंद रहती।


नेहा का डर धीरे-धीरे शक में बदलने लगा था।


उसे लगने लगा था कि शायद आरव और सिया के बीच कुछ ऐसा चल रहा है जो उससे छुपाया जा रहा है।


उस रात जब आरव घर लौटा, तो उसके हाथ में एक बड़ा सा गिफ्ट बैग था। नेहा ने अनजाने में पूछा, “क्या है इसमें?”


आरव थोड़ा घबरा गया। “ऑफिस का सामान है,” इतना कहकर वह जल्दी से कमरे में चला गया।


नेहा के अंदर जैसे कुछ टूट गया।


उसे पहली बार लगा कि उसका घर उससे छिन रहा है।


अगले दिन रविवार था। आरव सुबह जल्दी कहीं निकल गया। थोड़ी देर बाद सिया भी तैयार होकर बाहर जाने लगी।


“कहां जा रही हो?” नेहा ने सामान्य बनने की कोशिश करते हुए पूछा।


“कॉलेज का थोड़ा काम है दीदी,” सिया ने नजरें चुराते हुए जवाब दिया।


दरवाजा बंद होते ही नेहा की आंखें भर आईं।


उसे अब यकीन होने लगा था कि दोनों उससे झूठ बोल रहे हैं।


उसने तय कर लिया कि आज वह सच जानकर ही रहेगी।


करीब एक घंटे बाद उसने चुपचाप ऑटो लिया और सिया का पीछा करने लगी। उसका दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे खुद अपनी सांसें सुनाई दे रही थीं।


सिया शहर के बीच बने एक बड़े से कम्युनिटी सेंटर के सामने उतरी। नेहा भी थोड़ी दूरी पर रुक गई।


कुछ देर बाद उसने देखा—आरव भी वहां पहुंच चुका था।


दोनों अंदर चले गए।


नेहा की आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा।


उसने कांपते कदमों से अंदर प्रवेश किया।


लेकिन अंदर का दृश्य देखकर वह वहीं रुक गई।


पूरा हॉल रंग-बिरंगी सजावट से भरा हुआ था। दीवारों पर बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी थीं। उन तस्वीरों में छोटे-छोटे बच्चों के चेहरे मुस्कुरा रहे थे।


मंच पर एक बड़ा बैनर लगा था—


“नई उड़ान — अनाथ बच्चों के लिए कला और शिक्षा केंद्र”


नेहा कुछ समझ नहीं पा रही थी।


तभी मंच पर खड़े आरव की नजर उस पर पड़ी। उसके चेहरे पर हैरानी फैल गई।


“नेहा… तुम यहां?”


सिया भी घबरा गई। “दीदी… आपने…”


नेहा की आंखों में आंसू भर आए।


“मुझे सब समझ आ गया,” उसने टूटे हुए स्वर में कहा, “तुम दोनों को अब सफाई देने की जरूरत नहीं है।”


आरव और सिया ने एक-दूसरे की तरफ देखा। फिर अचानक दोनों हंस पड़े।


नेहा हैरानी से उन्हें देखने लगी।


आरव जल्दी से उसके पास आया और उसका हाथ पकड़ लिया।


“पागल लड़की,” उसने धीमे से कहा, “तुम्हें क्या लगा था?”


नेहा चुप रही।


तभी सिया ने मंच के पीछे रखा एक बड़ा सा बोर्ड सामने खींचा। उस पर लिखा था—


“संस्थापक — नेहा शर्मा”


नेहा के पैरों तले जमीन खिसक गई।


“ये… क्या है?”


सिया की आंखें चमक उठीं।


“दीदी, आपको याद है ना, आप हमेशा कहती थीं कि जिन बच्चों का कोई नहीं होता, उनके लिए कुछ करना चाहिए? आपने अपनी नौकरी छोड़कर मेरे लिए और घर के लिए कितना कुछ छोड़ा। लेकिन आपने कभी अपने सपनों के बारे में नहीं सोचा।”


आरव मुस्कुराया।


“पिछले आठ महीनों से हम दोनों इसी पर काम कर रहे थे। यह सेंटर तुम्हारे नाम पर है। यहां गरीब और अनाथ बच्चों को मुफ्त में पढ़ाई और पेंटिंग सिखाई जाएगी।”


नेहा अवाक खड़ी थी।


आरव आगे बोला, “जिस गिफ्ट बैग को देखकर तुम परेशान हुई थीं, उसमें इसी सेंटर की फाइलें थीं। और सिया कॉलेज नहीं, यहां आती थी। हम दोनों चाहते थे कि उद्घाटन के दिन तुम्हें सरप्राइज दें।”


नेहा की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।


उसे अपनी सोच पर शर्म आने लगी थी।


वह जिन दो लोगों पर सबसे ज्यादा भरोसा करती थी, उन्हीं पर उसने शक किया था।


सिया ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया।


“दीदी, पिछले कुछ दिनों से आप हमसे दूर-दूर रहने लगी थीं। मैं समझ गई थी कि आपके मन में कुछ चल रहा है। लेकिन मैं चाहकर भी सच नहीं बता सकती थी।”


नेहा अब खुद को रोक नहीं पाई। उसने सिया को कसकर गले लगा लिया।


आरव भी दोनों के पास आ गया।


तीनों लंबे समय तक वैसे ही खड़े रहे।


उसी वक्त कुछ छोटे बच्चे दौड़ते हुए उनके पास आए। उनके हाथों में रंग और ब्रश थे।


एक छोटी बच्ची ने मासूमियत से पूछा, “मैडम, क्या आप हमें पेंटिंग सिखाएंगी?”


नेहा ने कांपते होंठों से मुस्कुराने की कोशिश की।


उसने पहली बार महसूस किया कि जिंदगी में हर खामोशी धोखा नहीं होती। कई बार कुछ रिश्ते चुप रहकर भी हमारे लिए दुनिया की सबसे खूबसूरत चीजें तैयार कर रहे होते हैं।


उसने बच्चों की तरफ देखा, फिर आरव और सिया की तरफ।


आज उसे सिर्फ अपना परिवार ही नहीं मिला था, बल्कि जीने की एक नई वजह भी मिल गई थी।



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