रिश्ते भी रहें, मैं भी रहूँ
आँगन में हल्की हवा चल रही थी, और घर के अंदर कामकाज की धीमी आवाज़ें गूँज रही थीं। मैं रसोई में खड़ी सब्ज़ी काट रही थी कि तभी दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई।
दरवाज़ा खोला तो सामने रीना खड़ी थी—हमारे पड़ोस में रहने वाली, अभी कुछ ही महीनों पहले शादी करके आई थी। चेहरे पर थकान साफ़ दिख रही थी, लेकिन उसने जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की।
“आंटी… थोड़ी देर बैठ सकती हूँ?” उसने धीमे से पूछा।
“अरे क्यों नहीं बेटा, आओ।” मैंने उसे अंदर बुलाया और पानी का गिलास थमाया।
वो सोफे पर बैठ गई, लेकिन बेचैनी उसके चेहरे पर साफ़ थी। कुछ पल तक वो चुप रही, जैसे शब्द ढूंढ रही हो।
फिर अचानक बोली— “आंटी, क्या हर बार समझौता लड़की को ही करना पड़ता है?”
मैंने उसकी तरफ देखा, लेकिन तुरंत जवाब नहीं दिया। बस इतना कहा— “क्या हुआ?”
वो हल्का सा हँसी, लेकिन उस हँसी में दर्द था— “कुछ खास नहीं… वही रोज़ की बातें।”
“जैसे?”
उसने गहरी साँस ली— “घर में सब ठीक है… कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं है। लेकिन… हर चीज़ में मुझे ही बदलना पड़ता है।”
मैं ध्यान से सुन रही थी।
“सुबह कैसे उठना है, क्या पहनना है, कैसे बोलना है… यहाँ तक कि कब हँसना है, ये भी बताया जाता है। अगर मैं अपने तरीके से कुछ कर दूँ, तो कहा जाता है—‘हमारे घर में ऐसा नहीं होता।’”
वो मेरी तरफ देखती हुई बोली— “आंटी, मेरा भी तो एक घर था… वहाँ सब कुछ मेरे तरीके से होता था। क्या शादी के बाद वो सब खत्म हो जाता है?”
मैंने धीरे से कहा— “बदलाव तो आता है बेटा… हर नए रिश्ते में थोड़ा झुकना पड़ता है।”
वो तुरंत बोली— “झुकना ठीक है आंटी… लेकिन अगर हर बार सिर्फ मैं ही झुकूँ तो?”
उसका सवाल सीधा था, और सच्चा भी।
कुछ पल चुप रहकर वो फिर बोली— “मेरी मम्मी हमेशा कहती थीं—‘घर बसाने के लिए सहना पड़ता है।’
लेकिन उन्होंने कभी ये नहीं बताया कि कितना सहना पड़ता है।”
मैंने देखा, उसकी आँखें भर आई थीं, लेकिन वो रोना नहीं चाहती थी।
“कल की बात है,” उसने कहना शुरू किया,
“मैंने बस इतना कहा कि मुझे नौकरी करना है। बस… इतना सुनते ही घर में माहौल बदल गया।”
“क्यों?” मैंने पूछा।
“कहा गया—‘हमारे घर की बहुएँ बाहर काम नहीं करतीं।’
मैंने पूछा—‘क्यों?’
तो जवाब मिला—‘क्योंकि ये हमारी परंपरा है।’”
वो थोड़ा रुककर बोली— “आंटी, परंपरा क्या सिर्फ रोकने के लिए होती है?”
उसकी बात सुनकर मैं कुछ सोच में पड़ गई।
वो आगे बोली— “मैंने उनसे कहा कि मैं घर की जिम्मेदारियाँ भी निभाऊँगी और काम भी करूँगी।
लेकिन उन्हें लगा जैसे मैं घर के खिलाफ जा रही हूँ।”
उसने धीरे से कहा— “मैं घर तोड़ना नहीं चाहती… बस खुद को खोना भी नहीं चाहती।”
उसकी ये बात मेरे दिल को छू गई।
मैंने पूछा— “तुम्हारे पति क्या कहते हैं?”
वो हल्का सा मुस्कुराई— “वो कहते हैं—‘थोड़ा टाइम दो, सब ठीक हो जाएगा।’
लेकिन आंटी… अगर मैं हर दिन खुद को थोड़ा-थोड़ा बदलती रहूँ, तो एक दिन मैं बचूँगी ही नहीं।”
कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।
मैंने पहली बार उसकी बातों को अपने जीवन से जोड़कर देखा।
कितनी बार मैंने भी “सब ठीक रखने” के लिए अपनी पसंद छोड़ी थी…
कितनी बार “शांति” के लिए चुप रह गई थी…
मैंने धीमे से कहा— “तो तुम क्या करना चाहती हो?”
उसने बिना सोचे जवाब दिया— “मैं बात करना चाहती हूँ… लड़ना नहीं।
समझाना चाहती हूँ… झुकना नहीं।
और अगर मुझे गलत समझा जाए… तब भी खुद को सही मानना बंद नहीं करना चाहती।”
उसकी आवाज़ में अब डर नहीं था… साफ़ आत्मविश्वास था।
मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा— “ये आसान नहीं होगा।”
वो भी मुस्कुरा दी— “मुझे आसान नहीं चाहिए आंटी… मुझे सही चाहिए।”
मैं कुछ पल तक उसे देखती रही।
फिर मैंने कहा— “एक बात याद रखना… रिश्ते निभाने के लिए आवाज़ दबाना जरूरी नहीं होता।
कभी-कभी सही तरीके से आवाज़ उठाना ही रिश्तों को मजबूत बनाता है।”
उसने सिर हिलाया।
उठते-उठते वो बोली— “आंटी, मैं कोशिश करूँगी कि मैं बदलूँ… लेकिन अपनी पहचान खोकर नहीं।”
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा— “और अगर कभी लगे कि तुम खुद से दूर जा रही हो… तो रुक जाना।”
वो मुस्कुराई और बाहर चली गई।
मैं दरवाज़े पर खड़ी उसे जाते हुए देखती रही…
और मन ही मन सोचने लगी—
शायद हमारी पीढ़ी ने रिश्तों को बचाने के लिए खुद को चुप किया…
और ये नई पीढ़ी रिश्तों को सच में मजबूत बनाने के लिए बोलना सीख रही है।
पहली बार लगा—
समझौता और सम्मान में बहुत फर्क होता है…
और सही रास्ता वही है जहाँ दोनों साथ चलें।

Post a Comment