बेटे की सच्चाई जानकर पूरा वृद्धाश्रम रो पड़ा

 

An emotional scene of an elderly Indian man sitting alone on a broken bench at a rainy railway station while people walk past him in the background.


रेलवे स्टेशन के बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। लोग अपने बैग संभालते हुए जल्दी-जल्दी भाग रहे थे। उसी भीड़ के बीच एक बूढ़ा आदमी स्टेशन की टूटी हुई बेंच पर चुपचाप बैठा था। उसके हाथ में एक पुराना बैग था और आँखों में अजीब-सी बेचैनी।


पास खड़े लोग उसे बार-बार देख रहे थे।


तभी एक आदमी ने दूसरे से कहा—


“लगता है बेटों ने घर से निकाल दिया होगा बेचारे को।”


दूसरे ने ताना मारते हुए कहा—


“आजकल के बच्चों से और उम्मीद भी क्या करनी। बूढ़े माँ-बाप बोझ लगने लगते हैं।”


वो बूढ़ा आदमी सब सुन रहा था, लेकिन चुप था।


उसका नाम था हरिनारायण।


करीब सत्तर साल की उम्र, कमजोर शरीर और चेहरे पर गहरी उदासी।


कुछ देर बाद एक पुलिस वाला उसके पास आया और बोला—


“बाबा, यहाँ कब से बैठे हो?”


हरिनारायण ने धीमी आवाज़ में जवाब दिया—


“सुबह से…”


“घर कहाँ है?”


बूढ़े आदमी की आँखें भर आईं।


“अब कोई घर नहीं बेटा…”


पुलिस वाला उसे पास के वृद्धाश्रम ले गया।


आश्रम में बाकी बुजुर्गों ने जब उसकी कहानी सुनी तो सबके अंदर गुस्सा भर गया।


हरिनारायण ने बस इतना बताया था कि उसका इकलौता बेटा अमित उसे स्टेशन पर बैठाकर चला गया और फिर कभी वापस नहीं आया।


बस… इतना सुनना था कि सब अमित को कोसने लगे।


एक बुजुर्ग महिला बोली—


“कैसा पत्थर दिल बेटा निकला।”


दूसरे आदमी ने कहा—


“जिस बाप ने खून-पसीना बहाकर उसे बड़ा किया, उसी को सड़क पर छोड़ दिया।”


हरिनारायण हर बार बस यही कहता—


“मेरा बेटा बुरा नहीं है…”


लेकिन कोई उसकी बात नहीं मानता।


दिन गुजरते गए।


आश्रम में रहने वाले लोग हरिनारायण का सम्मान करते थे क्योंकि वो हमेशा दूसरों की मदद करते रहते थे।


किसी को दवाई चाहिए होती तो वो खुद उठकर ले आते।


किसी की तबीयत खराब होती तो रातभर उसके पास बैठे रहते।


लेकिन जब भी कोई उनके बेटे अमित का नाम लेता, उनकी आँखें भर आतीं।


एक दिन आश्रम में टीवी पर खबर चल रही थी।


“शहर के मशहूर बिजनेसमैन अमित मल्होत्रा ने करोड़ों रुपए की नई कंपनी शुरू की…”


टीवी पर अमित की तस्वीर देखते ही आश्रम में बैठे लोग भड़क उठे।


एक आदमी गुस्से में बोला—


“देखो… बाप को छोड़कर खुद मजे कर रहा है।”


दूसरा बोला—


“इतना बड़ा आदमी बन गया लेकिन बाप के लिए दिल नहीं पिघला।”


हरिनारायण चुपचाप टीवी बंद करके अपने कमरे में चले गए।


उस रात उन्होंने खाना भी नहीं खाया।


धीरे-धीरे उनकी तबीयत खराब रहने लगी।


डॉक्टर ने कहा कि उनका दिल बहुत कमजोर हो चुका है।


लेकिन हरिनारायण हर दिन दरवाजे की तरफ देखते रहते।


उन्हें उम्मीद थी कि एक दिन उनका बेटा जरूर आएगा।


फिर एक रात उनकी हालत अचानक बिगड़ गई।


आश्रम के मैनेजर मिश्रा जी तुरंत उन्हें अस्पताल लेकर गए।


ऑक्सीजन लगी हुई थी।


सांसें टूट रही थीं।


मिश्रा जी ने उनका हाथ पकड़ा और कहा—


“किसी को बुलाना है?”


हरिनारायण की आँखों से आँसू बह निकले।


उन्होंने बहुत मुश्किल से कहा—


“अमित को मत बुलाना…”


“लेकिन क्यों?”


“वो… बहुत बड़ी मुसीबत में है…”


इतना कहकर उनकी सांसें रुक गईं।


पूरे आश्रम में मातम छा गया।


लेकिन लोगों के अंदर अमित के लिए नफरत और बढ़ गई।


सब कह रहे थे—


“कम से कम बाप की आखिरी यात्रा में तो आना चाहिए था।”


मिश्रा जी ने आखिर अमित को फोन लगाया।


फोन बंद था।


एक दिन बीत गया…


दो दिन बीत गए…


तीसरे दिन अचानक आश्रम के बाहर कई गाड़ियाँ आकर रुकीं।


एक दुबला-पतला आदमी तेजी से अंदर भागा।


उसके बिखरे बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी और सूजी हुई आँखें देखकर कोई पहचान नहीं पाया।


वो सीधे हरिनारायण की तस्वीर के सामने जाकर फूट-फूटकर रोने लगा।


मिश्रा जी ने धीरे से कहा—


“अमित…”


सब लोग हैरान रह गए।


एक आदमी गुस्से में बोला—


“अब आने से क्या फायदा?”


दूसरा चिल्लाया—


“जिस बाप को स्टेशन पर छोड़ दिया था, उसकी लाश देखने आए हो?”


अमित जमीन पर बैठ गया।


उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।


उसने कांपती आवाज़ में कहा—


“मैंने उन्हें कभी नहीं छोड़ा था…”


कमरे में सन्नाटा छा गया।


मिश्रा जी ने पूछा—


“तो सच क्या है?”


अमित ने जेब से एक पुरानी फाइल निकाली।


उसमें अस्पताल के कागज थे।


उसने रोते हुए कहा—


“पाँच साल पहले मुझे पता चला कि मुझे किडनी फेलियर है… डॉक्टर ने कहा था कि मैं ज्यादा दिन नहीं बचूँगा…”


सब लोग ध्यान से सुन रहे थे।


अमित बोला—


“मैं अपने पिता को टूटते हुए नहीं देख सकता था। इसलिए मैंने उनसे झूठ बोला कि मुझे बिजनेस के लिए बाहर जाना है।”


“फिर स्टेशन पर क्यों छोड़ा?”


अमित की आवाज टूट गई।


“क्योंकि उसी दिन मैं अस्पताल में भर्ती होने जा रहा था… मैं चाहता था कि उन्हें लगे मैं अपनी जिंदगी में व्यस्त हूँ… ना कि मौत से लड़ रहा हूँ…”


सबकी आँखें नम हो गईं।


अमित आगे बोला—


“मैंने अपनी सारी प्रॉपर्टी बेचकर उनके रहने और इलाज का इंतजाम किया। हर महीने आश्रम के खाते में पैसे मैं ही भेजता था…”


मिश्रा जी की आँखें भर आईं।


उन्होंने धीरे से कहा—


“ये सच है… हरिनारायण जी के सारे खर्च अमित ही उठाते थे…”


एक आदमी ने पूछा—


“लेकिन तुम मिलने क्यों नहीं आए?”


अमित रो पड़ा।


उसने अपनी शर्ट ऊपर उठाई।


उसके शरीर पर ऑपरेशन के गहरे निशान थे।


“मैं पिछले चार साल से अस्पतालों में था… कई बार मौत के करीब पहुँच गया… लेकिन पिताजी को कभी सच नहीं बताया…”


सब लोग पत्थर की तरह खड़े थे।


अमित ने तस्वीर की तरफ देखते हुए कहा—


“मैं चाहता था कि वो मुझे सफल समझें… बीमार नहीं…”


इतना कहते ही वो बच्चे की तरह रोने लगा।


पूरा आश्रम रो रहा था।


जो लोग उसे कलयुगी बेटा कह रहे थे, वही आज शर्म से सिर झुकाए खड़े थे।


मिश्रा जी ने धीमी आवाज में कहा—


“हरिनारायण जी आखिरी समय तक कहते रहे… मेरा बेटा बुरा नहीं है…”


ये सुनते ही अमित जोर-जोर से रो पड़ा।


उसने अपने पिता की तस्वीर को सीने से लगा लिया।


कभी-कभी जिंदगी में जो इंसान सबसे ज्यादा गलत दिखाई देता है… वही सबसे बड़ा त्याग कर रहा होता है।


दुनिया अक्सर सच जाने बिना फैसले सुना देती है।


लेकिन हर कहानी के पीछे एक दर्द छुपा होता है… जो हर किसी को दिखाई नहीं देता।



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