सच्चा पति वही जो मुश्किल में साथ दे
“कई बार इंसान अपने रिश्तों को निभाने के बजाय दूसरों की बातों में आकर उन्हें कमजोर करने लगता है… लेकिन सच्चा साथ वही होता है, जो मुश्किल वक्त में भी एक-दूसरे का हाथ ना छोड़े…”
पूरे घर में बर्तनों की आवाज़ गूंज रही थी।
रसोई में गैस पर दाल चढ़ी थी, सिंक में बर्तन भरे पड़े थे और आँगन में सूखने डाले कपड़े हवा में उड़ रहे थे।
सरोज जी धीरे-धीरे झाड़ू लगा रही थीं। उम्र बढ़ने के साथ अब उनके घुटनों में दर्द रहने लगा था। तभी उनके पति विनोद जी पानी की बाल्टी लेकर आए और बोले,
“अरे रहने दो सरोज, मैं पोछा लगा देता हूँ। तुम कब से काम कर रही हो।”
सरोज जी हल्का मुस्कुराईं और बोलीं,
“तुम भी ना… लोग क्या कहेंगे, बुढ़ापे में बीवी के पीछे-पीछे घूमते रहते हो।”
विनोद जी हँस पड़े।
“लोगों का काम है कहना। तुम मेरी पत्नी हो, तुम्हारी मदद नहीं करूँगा तो किसकी करूँगा?”
इतने में उनका बेटा आदित्य ऑफिस से घर लौटा। उसने दरवाजे से ही देखा कि उसके पापा पोछा लगा रहे हैं और माँ रसोई में खड़ी रोटियाँ बना रही हैं।
आदित्य बोला,
“पापा, आप ये सब क्यों कर रहे हो? मुझे बुला लेते।”
विनोद जी बोले,
“तुम ऑफिस से थक कर आए हो बेटा। और फिर घर का काम करने से कोई छोटा नहीं हो जाता।”
आदित्य चुप हो गया।
रात को खाना खाते समय विनोद जी बार-बार सरोज जी को सब्ज़ी परोस रहे थे।
“थोड़ा और खा लो। दवाई खाली पेट मत लेना।”
सरोज जी बोलीं,
“बस करो अब, ज्यादा नहीं खाया जाता।”
आदित्य उन दोनों को चुपचाप देखता रहा।
उसकी शादी को अभी सिर्फ आठ महीने हुए थे। उसकी पत्नी पूजा बहुत सीधी और समझदार लड़की थी। शादी के बाद उसने पूरे घर को अपना मान लिया था। सुबह सबसे पहले उठना, सबके लिए चाय बनाना, सारा खाना संभालना, कपड़े धोना… वो बिना शिकायत सब करती रहती थी।
शुरू-शुरू में सब ठीक था।
लेकिन धीरे-धीरे आदित्य की माँ को पूजा की हर बात में कमी दिखने लगी।
कभी वो कहतीं,
“आजकल की लड़कियों को काम ही कहाँ आता है।”
तो कभी कहतीं,
“हमारे जमाने में बहुएँ घर सिर पर उठा लेती थीं।”
पूजा चुप रहती।
एक दिन आदित्य ऑफिस जाने के लिए अपनी शर्ट खुद प्रेस करने लगा। तभी सरोज जी ने देख लिया।
वो तुरंत बोलीं,
“ये क्या कर रहे हो तुम?”
आदित्य बोला,
“बस मम्मी, शर्ट प्रेस कर रहा हूँ।”
सरोज जी नाराज़ होकर बोलीं,
“तो बहू किसलिए है घर में? अभी से उसके काम तुम करोगे तो आगे वो तुम्हें ही नचाएगी।”
विनोद जी भी वहीं बैठे थे। उन्होंने भी कहा,
“बेटा, शादी के बाद जिम्मेदारियाँ बदल जाती हैं।”
उस दिन आदित्य कुछ नहीं बोला।
लेकिन उसके बाद उसने धीरे-धीरे अपने सारे छोटे-बड़े काम पूजा पर छोड़ दिए।
पूजा को बदलाव महसूस हुआ।
पहले जो आदित्य हर काम में उसका हाथ बँटाता था, अब छोटी-छोटी बातों पर उसे टोकने लगा था।
अगर कभी चाय देर से मिलती तो कह देता,
“तुमसे इतना भी नहीं होता?”
अगर तौलिया अपनी जगह ना मिले तो आवाज़ लगा देता।
सरोज जी भी मौका मिलते ही कहतीं,
“बहुएँ घर सँभालने के लिए लाई जाती हैं, आराम करने के लिए नहीं।”
पूजा अंदर ही अंदर टूटने लगी थी।
एक दिन पूजा को तेज बुखार हो गया। उसका पूरा शरीर दर्द से टूट रहा था। रातभर उसे नींद नहीं आई।
सुबह उसकी आँख देर से खुली।
उधर आदित्य उठ चुका था। उसने देखा पूजा की हालत ठीक नहीं है, तो वो खुद रसोई में चला गया और चाय बनाने लगा।
तभी सरोज जी आ गईं।
उन्होंने बेटे को रसोई में देखा तो उनका चेहरा उतर गया।
“वाह बेटा… अब बीवी ने तुम्हें रसोई में भी उतार दिया?”
आदित्य बोला,
“मम्मी, पूजा की तबीयत बहुत खराब है।”
सरोज जी बोलीं,
“इतनी भी क्या खराबी कि उठकर चाय ना बना सके?”
इतने में पूजा लड़खड़ाते हुए बाहर आई और बोली,
“मम्मी जी, सच में मेरी तबीयत…”
लेकिन सरोज जी ने उसकी बात बीच में ही काट दी।
“रहने दो बहाने। हमने भी घर चलाया है।”
आदित्य को पहली बार बहुत बुरा लगा।
उसने पूजा को सहारा देकर कमरे में बैठाया और खुद डॉक्टर के पास ले गया।
डॉक्टर ने कहा कि पूजा को कमजोरी और तनाव दोनों बहुत ज्यादा हैं।
उस दिन आदित्य देर तक सोचता रहा।
रात को जब वो पानी लेने उठा तो उसने देखा कि उसके पापा सरोज जी के पैरों में दवाई लगा रहे थे।
विनोद जी बोले,
“दर्द ज्यादा है क्या?”
सरोज जी बोलीं,
“थोड़ा कम है अब।”
फिर विनोद जी ने प्यार से कहा,
“तुम्हारा दर्द मेरा दर्द है।”
बस यही बात आदित्य के दिल में उतर गई।
अगले दिन वो ऑफिस से लौटते वक्त पूजा के लिए दवाइयाँ और उसकी पसंद की मिठाई लेकर आया।
घर पहुँचकर उसने सबके सामने कहा,
“मम्मी, अगर पापा आपकी तकलीफ में आपका साथ दे सकते हैं… तो मैं पूजा का साथ क्यों नहीं दे सकता?”
घर में सन्नाटा छा गया।
आदित्य आगे बोला,
“पत्नी सिर्फ काम करने के लिए नहीं होती। वो भी इंसान है… उसे भी दर्द होता है।”
सरोज जी कुछ नहीं बोलीं।
उस रात पहली बार आदित्य ने पूजा से माफी मांगी।
वो बोला,
“मैं दूसरों की बातों में आकर बदल गया था। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।”
पूजा की आँखों में आँसू आ गए।
धीरे-धीरे आदित्य फिर पहले जैसा हो गया।
वो कभी रसोई में पूजा की मदद कर देता, कभी खुद अपना सामान संभाल लेता।
शुरू में सरोज जी को ये सब बिल्कुल पसंद नहीं आया।
लेकिन जब उन्होंने देखा कि अब घर में लड़ाई कम होने लगी है… पूजा पहले से ज्यादा खुश रहने लगी है… और आदित्य भी सुकून में है… तब उन्हें अपनी गलती समझ आने लगी।
एक दिन सरोज जी की तबीयत अचानक खराब हो गई।
पूजा पूरी रात उनके पास बैठी रही। समय पर दवाई देती रही, सिर दबाती रही।
सुबह सरोज जी की आँख खुली तो उन्होंने देखा पूजा कुर्सी पर बैठे-बैठे ही सो गई थी।
उस पल उनकी आँखें भर आईं।
उन्होंने धीरे से पूजा का हाथ पकड़ा और बोलीं,
“मुझे माफ कर देना बहू… मैंने तुम्हें समझने में बहुत देर कर दी।”
पूजा मुस्कुरा दी।
उधर दरवाजे पर खड़ा आदित्य ये सब देख रहा था।
आज बहुत दिनों बाद उसे लग रहा था कि उसका घर सच में घर बन गया है।

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