जिस दर्द को ठुकराया, वही लौटकर आया
“कई बार इंसान दूसरों के भरोसे और मजबूरी का फायदा उठाकर खुद को बहुत चालाक समझने लगता है… लेकिन वक्त एक दिन उसी इंसान को ऐसी जगह लाकर खड़ा कर देता है, जहां उसे अपने किए हर धोखे का हिसाब देना पड़ता है…”
ड्रॉइंग रूम में रिश्तेदारों की आवाजें लगातार गूंज रही थीं।
रसोई में बर्तनों की खनखनाहट चल रही थी और घर के बाहर टेंट वाले सजावट का सामान उतार रहे थे।
नेहा जल्दी-जल्दी सबके लिए चाय बना रही थी। तभी पीछे से उसकी सास विमला देवी तेज आवाज में बोलीं,
“नेहा, तुमने अभी तक पूजा वाले कमरे की सफाई नहीं की? मेहमान आने वाले हैं और तुम्हें कोई चिंता ही नहीं है।”
नेहा बिना कुछ बोले अपना काम करती रही।
तभी उसके पति अमित ने भी वहीं आकर कहा,
“मम्मी सही कह रही हैं। थोड़ा जिम्मेदारी से काम किया करो। हर चीज मम्मी को ही क्यों देखनी पड़ती है?”
नेहा ने पलटकर अमित की तरफ देखा।
“जिम्मेदारी? सुबह से अकेली काम कर रही हूं मैं। तुम्हारी बहन अपने कमरे में फोन चला रही है और तुम दोस्तों के साथ बाहर बैठे हो। जिम्मेदारी सिर्फ मेरी ही है क्या?”
अमित को उसका जवाब पसंद नहीं आया।
“तुम हर बात में बहस क्यों करने लगती हो?”
“क्योंकि अब चुप रहने की आदत खत्म हो रही है अमित।”
नेहा की आवाज भर्रा गई थी।
इतने में विमला देवी ताना मारते हुए बोलीं,
“हमें तो शुरू से पता था कि नौकरी करने वाली लड़कियां घर नहीं संभाल पाती।”
ये सुनकर नेहा की आंखें भर आईं। लेकिन उसने खुद को संभाला और चुपचाप वहां से चली गई।
कमरे में जाकर उसने अलमारी खोली तो अंदर अपनी मां की तस्वीर रखी दिखाई दी। तस्वीर देखते ही उसकी आंखों के सामने पुरानी बातें घूमने लगीं।
नेहा के पिता का देहांत बहुत पहले हो चुका था। उसकी मां सुजाता जी ने सिलाई करके और लोगों के घरों में खाना बनाकर उसे पढ़ाया-लिखाया था। बड़ी मुश्किलों से उन्होंने नेहा की शादी अमित से की थी।
शादी के बाद शुरू में सब ठीक था। लेकिन धीरे-धीरे विमला देवी को हर बात में कमी नजर आने लगी।
कभी दहेज को लेकर ताने, तो कभी मायके वालों को लेकर बातें।
नेहा सब सहती रही क्योंकि वो अपनी मां को परेशान नहीं करना चाहती थी।
लेकिन एक दिन अचानक उसकी मां की तबीयत बिगड़ गई। उन्हें लकवा मार गया था।
नेहा तुरंत मायके पहुंची। वहां हालत देखकर वो टूट गई। मां बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थीं।
उसने अमित से कहा,
“कुछ दिनों के लिए मम्मी को हमारे साथ ले चलते हैं। वहां अकेली कैसे रहेंगी?”
लेकिन अमित तुरंत बोला,
“हम कोई अस्पताल नहीं चला रहे हैं नेहा। यहां पहले ही कितनी जिम्मेदारियां हैं।”
“पर वो मेरी मां हैं अमित।”
“तो क्या हुआ? हर चीज की लिमिट होती है।”
बहुत बहस के बाद अमित मान तो गया, लेकिन विमला देवी बिल्कुल खुश नहीं थीं।
सुजाता जी घर आ गईं।
शुरू के कुछ दिन ठीक रहे। लेकिन फिर रोज ताने शुरू हो गए।
“आजकल लोग बेटी के घर आकर आराम से बस जाते हैं।”
“बीमारी का खर्चा भी कोई कम होता है क्या?”
“हमने तो बहू लाई थी, पूरा परिवार नहीं।”
नेहा सब सुनती रहती।
सुजाता जी को भी सब सुनाई देता था। वो अंदर ही अंदर घुटने लगी थीं।
एक दिन विमला देवी ने मौका देखकर उनसे कहा,
“समधन जी, सरकार की तरफ से बुजुर्गों को कुछ सुविधा मिल रही है। उसके लिए कुछ फॉर्म भरने होंगे।”
सुजाता जी सीधी-सादी थीं। उन्होंने बिना पढ़े कागजों पर साइन कर दिए।
असल में वो उनके घर के पेपर थे।
अमित और विमला देवी ने मिलकर धोखे से उनका मकान अपने नाम करवा लिया।
कुछ महीने बाद जब मोहल्ले वाले घर खाली करवाने पहुंचे, तब नेहा को सच्चाई पता चली।
उस दिन घर में बहुत बड़ा झगड़ा हुआ था।
नेहा रोते हुए बोली,
“तुम लोगों ने मेरी बीमार मां के साथ धोखा किया है।”
अमित बेपरवाही से बोला,
“अरे आखिर वो सब तुम्हारा ही तो था। हमने अपने काम में लगा लिया तो क्या गलत किया?”
“गलत? ये चोरी है… धोखा है।”
विमला देवी हंसते हुए बोलीं,
“जो करना है कर लो।”
उस रात नेहा अपनी मां के पास जाकर खूब रोई थी।
उसने कहा,
“मम्मी, मैं पुलिस में शिकायत करूंगी।”
लेकिन सुजाता जी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं बेटा। तू अपना घर मत तोड़।”
“पर मम्मी…”
“मैं अब ज्यादा दिन नहीं हूं। पर तेरे बाद तेरा साथ देने वाला कोई तो होना चाहिए।”
नेहा अपनी मां की कसम के आगे हार गई।
लेकिन कुछ ही महीनों बाद सुजाता जी इस दुनिया से चली गईं।
उनके जाने के बाद नेहा पूरी तरह बदल गई थी। वो घर में रहती जरूर थी, लेकिन अब उसके मन में किसी के लिए अपनापन नहीं बचा था।
उधर अमित और विमला देवी को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था।
लेकिन वक्त धीरे-धीरे अपना हिसाब तैयार कर रहा था।
करीब चार साल बाद अमित ने अपने दोस्त के साथ मिलकर नया बिजनेस शुरू किया। बिजनेस अच्छा चलने लगा तो अमित को घमंड होने लगा।
वो अक्सर कहता,
“दिमाग हो तो इंसान कहीं से भी पैसा बना सकता है।”
लेकिन एक दिन उसका वही दोस्त सारा पैसा लेकर भाग गया।
अमित पर कर्ज चढ़ गया।
घर गिरवी रखने की नौबत आ गई।
इसी तनाव में एक रात विमला देवी सीढ़ियों से गिर गईं। उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई।
अब वो खुद बिस्तर से उठ नहीं पा रही थीं।
जिस औरत ने कभी बीमार इंसान का दर्द नहीं समझा था, आज वही दूसरों के सहारे पर थी।
अमित ने नेहा से कहा,
“मम्मी को संभाल लो।”
नेहा शांत आवाज में बोली,
“मैं नर्स नहीं हूं अमित।”
“वो तुम्हारी सास हैं।”
“और मेरी मां क्या थीं?”
अमित चुप हो गया।
कुछ दिनों बाद अमित की बड़ी बहन सीमा वहां आई। उसने आकर अपनी मां को संभालना शुरू किया।
एक दिन सीमा ने अमित से कहा,
“तुझे पता है सबसे बड़ा दुख क्या होता है?”
अमित चुप रहा।
“जब इंसान अपने ही कर्मों से अकेला पड़ जाता है।”
वो आगे बोली,
“जिस मां-बेटे ने एक बीमार और मजबूर औरत का घर छीन लिया… आज वही लोग सेवा की उम्मीद कर रहे हैं।”
अमित की आंखें झुक गईं।
उसे पहली बार एहसास हो रहा था कि उसने क्या खो दिया।
नेहा आज भी उसी घर में थी… लेकिन अब सिर्फ रिश्ते निभाने के लिए, दिल से नहीं।
और अमित…
वो रोज अपनी मां को बिस्तर पर पड़े देखता और हर बार उसे सुजाता जी का चेहरा याद आ जाता।
शायद इसलिए कहते हैं…
धोखे से कमाया हुआ सुख ज्यादा दिनों तक साथ नहीं देता, लेकिन उसका पछतावा जिंदगी भर इंसान का पीछा नहीं छोड़ता।

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