कुछ चीज़ें कभी पुरानी नहीं होतीं
बरसों बाद इस बार जब मैं मायके पहुँची, तो दरवाज़े पर कदम रखते ही कुछ अलग-सा एहसास हुआ। घर वही था, लोग वही थे, लेकिन माहौल बदल चुका था। पहले जहाँ आँगन में पुरानी चारपाइयाँ बिछी रहती थीं, वहाँ अब छोटी-सी लकड़ी की झूला-कुर्सी रखी थी। दीवारों पर नया रंग था और खिड़कियों पर हल्के रंग के परदे।
मैं मुस्कुराते हुए अंदर आई।
“वाह भाभी… आपने तो घर को बिल्कुल नया बना दिया।”
मेरी बात सुनकर भाभी खुश हो गईं।
“धीरे-धीरे सब बदल दिया दीदी… बस एक चीज़ पर आपके पापा अटक गए हैं।”
उन्होंने ड्राइंग रूम के कोने की तरफ इशारा किया।
वहाँ पुरानी सिलाई मशीन रखी थी। काले रंग की भारी मशीन, जिसके नीचे लोहे का पैडल लगा था। उसके ऊपर साफ कपड़ा ढका हुआ था, जैसे घर में किसी खास चीज़ को संभालकर रखा जाता है।
भाभी धीरे से बोलीं—
“दीदी, अब इसका कोई इस्तेमाल भी नहीं होता। मैंने कहा था हटाकर उसकी जगह छोटी अलमारी रख देते हैं, लेकिन पापा मानते ही नहीं। कहते हैं ये कहीं नहीं जाएगी। आप समझाइए ना।”
मैं कुछ पल चुप रही।
उस मशीन को देखते ही जैसे बरसों पुरानी आवाज़ें कानों में लौट आईं।
टक…टक…टक…
रात देर तक चलने वाली उस सिलाई मशीन की आवाज़।
माँ उसी मशीन पर हमारे कपड़े सिलती थीं।
त्योहार आने से पहले घर में अलग ही रौनक होती थी। माँ कपड़ों के थान निकालकर बैठ जातीं और हम सब उनके आसपास मंडराते रहते।
“माँ मेरा फ्रॉक पहले बनाना…”
“नहीं, पहले मेरी शर्ट…”
और माँ हँसते हुए कहतीं—
“सबका बनेगा… एक-एक करके।”
पापा की आमदनी ज्यादा नहीं थी। नए कपड़े खरीदना हर बार आसान नहीं होता था। इसलिए माँ अपने हाथों से हमारे लिए कपड़े सिलती थीं।
मुझे आज भी याद है, स्कूल के वार्षिक समारोह में मुझे नाटक में हिस्सा लेना था। सब बच्चे बाज़ार से किराए के कपड़े ला रहे थे।
मैं उदास होकर बैठी थी क्योंकि हमारे पास पैसे नहीं थे।
उस रात माँ बहुत देर तक इसी मशीन पर कुछ सिलती रहीं।
सुबह जब मैं उठी, तो मेरे लिए सुंदर-सी पोशाक तैयार थी।
मैं खुशी से उछल पड़ी थी।
उस दिन स्कूल में सबने मेरे कपड़ों की तारीफ की थी और मैं गर्व से कहती फिर रही थी—
“ये मेरी माँ ने बनाए हैं।”
धीरे-धीरे वक्त बदल गया।
भैया नौकरी पर चले गए। मेरी शादी हो गई। घर में नई चीज़ें आने लगीं।
लेकिन वो पुरानी सिलाई मशीन उसी कोने में रही।
माँ के जाने के बाद तो पापा उसे और भी ज्यादा संभालकर रखने लगे थे।
मैं यादों में खोई हुई थी कि तभी बाहर से पापा की आवाज़ आई—
“अरे बिटिया आ गई क्या?”
मैंने मुड़कर देखा।
पापा हाथ में सब्ज़ियों का थैला लिए अंदर आ रहे थे।
मुझे देखकर उनके चेहरे पर वही पुरानी चमक आ गई।
“कैसी है मेरी बेटी?”
मैं उनके गले लग गई।
तभी भाभी मुस्कुराते हुए बोलीं—
“पापाजी, आज दीदी आपको समझाएँगी। अब इस पुरानी मशीन को हटाने का समय आ गया है।”
पापा कुछ क्षण चुप रहे।
फिर धीरे-धीरे मशीन के पास जाकर खड़े हो गए।
उन्होंने उसके ऊपर रखा कपड़ा हटाया और बहुत प्यार से उस पर हाथ फेरा।
“जानती हो बहू… तुम्हारी माँ ने इस मशीन के सहारे पूरा घर संभाला है।”
उनकी आवाज़ धीमी हो गई।
“जब मेरी तनख्वाह कम पड़ जाती थी, तब यही मशीन हमारी मदद करती थी। रात-रात भर जागकर तुम्हारी माँ लोगों के कपड़े सिलती थी।”
मैंने देखा, पापा की आँखें भर आई थीं।
वे हल्का सा मुस्कुराए।
“तुम लोगों की पढ़ाई… त्योहार… दवाइयाँ… न जाने कितनी जरूरतें इस मशीन ने पूरी की हैं।”
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
भाभी अब चुप थीं।
शायद पहली बार उन्होंने उस मशीन के पीछे छिपी मेहनत को महसूस किया था।
पापा ने मेरी तरफ देखा।
“बेटा, कुछ चीज़ें पुरानी जरूर हो जाती हैं… लेकिन उनका साथ कभी पुराना नहीं होता।”
मैंने आगे बढ़कर पापा का हाथ पकड़ लिया।
भाभी धीरे से बोलीं—
“पापाजी… मशीन कहीं नहीं जाएगी।”
पापा हँस पड़े।
“अरे मैं भी कहाँ इसे चलाने वाला हूँ… बस इसे देखकर लगता है तुम्हारी माँ यहीं कहीं आसपास है।”
उस शाम भाभी ने ड्राइंग रूम अच्छे से सजाया।
पुरानी मशीन को साफ किया, उसके ऊपर छोटा-सा फूलदान रखा और दीवार पर माँ की तस्वीर टांग दी।
अब वो मशीन घर में बेकार सामान नहीं लग रही थी।
वो उस घर की कहानी बन चुकी थी…
एक ऐसी कहानी, जिसे कोई नया सामान कभी नहीं बदल सकता।

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