मेहनत का सम्मान

 

Emotional Diwali celebration scene showing a hardworking Indian maid with her children receiving gifts and kindness from her employer inside a beautifully decorated home.


हल्की ठंडी हवा खिड़कियों से अंदर आ रही थी और घर के आँगन में सूखने डाले कपड़े बार-बार उड़ रहे थे। रसोई में गैस पर दाल चढ़ी थी और कमरे के कोने में बैठी पूजा अपनी छोटी बेटी को गोद में लेकर चुप कराने की कोशिश कर रही थी।


“बस बेटा… थोड़ा सा और इंतजार कर ले… मम्मी अभी काम पर जा रही है… लौटकर तेरे लिए दवा भी लाएगी…” पूजा ने प्यार से बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।


पूजा की उम्र मुश्किल से सत्ताईस साल थी। पति की अचानक हुई मौत ने उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी थी। पहले जहां वह सिर्फ अपने परिवार का ध्यान रखती थी, अब उसे घर चलाने के लिए लोगों के यहां काम करना पड़ रहा था।


उसके दो बच्चे थे—दस साल का बेटा रोहन और छह साल की बेटी परी।


पूजा चाहती थी कि उसके बच्चे पढ़-लिखकर अच्छे इंसान बनें ताकि उन्हें कभी दूसरों के घरों में काम न करना पड़े। इसी सोच के साथ वह दिन-रात मेहनत करती थी।


वह पिछले डेढ़ साल से सुजाता जी के यहां काम कर रही थी। झाड़ू-पोछा, बर्तन, कपड़े, खाना बनाना—सब कुछ वही संभालती थी।


लेकिन सुजाता जी का स्वभाव बहुत तेज था।


उन्हें पूजा का कोई काम कभी पसंद नहीं आता था।


“अरे पूजा! ये बर्तन ठीक से चमके क्यों नहीं?”


“तुझे कितनी बार कहा है कि सोफे के नीचे भी सफाई किया कर!”


“काम में मन लगाया कर, वरना दूसरी कामवाली रख लूंगी!”


ऐसी बातें सुनना पूजा की आदत बन चुकी थी।


फिर भी वह चुप रहती क्योंकि उसे पता था कि जितनी तनख्वाह सुजाता जी देती हैं, उतनी आसानी से कहीं और नहीं मिलेगी।


ऊपर से कभी-कभी पुराने कपड़े और बच्चों के खिलौने भी दे देती थीं, जिन्हें पूजा संभालकर अपने बच्चों के लिए रख लेती थी।


एक दिन पूजा के बेटे रोहन को स्कूल में चोट लग गई। उसके सिर पर हल्की चोट आई थी और डॉक्टर ने आराम करने को कहा था।


पूजा घबराई हुई सुजाता जी के घर पहुंची और बोली—


“दीदी, आज मुझे थोड़ी जल्दी जाना पड़ेगा। रोहन की तबीयत ठीक नहीं है।”


सुजाता जी तुरंत नाराज़ हो गईं।


“तुम लोगों की यही आदत है! जब घर में काम ज्यादा होता है तभी छुट्टी चाहिए होती है।”


“लेकिन दीदी—”


“कोई लेकिन-वेकिन नहीं! आज मेरी किटी पार्टी है। इतने सारे मेहमान आने वाले हैं। तू नहीं रहेगी तो सारा काम कौन करेगा?”


पूजा की आंखें भर आईं।


“दीदी, बच्चा अकेला है घर पर…”


सुजाता जी ने बेरुखी से कहा—


“इतना भी क्या परेशान होना? पड़ोस में किसी को बोल दे देखने के लिए। काम पहले जरूरी है।”


पूजा चाहकर भी कुछ नहीं कह पाई।


वह चुपचाप काम में लग गई।


उसका मन बार-बार अपने बेटे की तरफ जा रहा था। कभी नमक ज्यादा डाल देती, कभी प्लेट हाथ से गिर जाती।


जिस पर सुजाता जी और गुस्सा हो जातीं।


“अगर काम नहीं होता तुझसे तो साफ बोल दे!”


पूजा बार-बार हाथ जोड़कर माफी मांगती रही।


रात तक जब वह घर पहुंची तो रोहन तेज बुखार में तप रहा था।


पूजा सारी रात उसके पास बैठी रही।


अगले दो दिन वह काम पर नहीं जा पाई।


तीसरे दिन जब वह सुजाता जी के घर पहुंची तो उन्होंने दरवाजा खोलते ही डांटना शुरू कर दिया।


“अब आने की जरूरत क्या थी?”


“दीदी, बच्चे की तबीयत—”


“सब बहाने हैं!”


पूजा चुपचाप सिर झुकाकर खड़ी रही।


कुछ देर बाद सुजाता जी ने गुस्से में कहा—


“चल ठीक है… इस बार छोड़ रही हूं। लेकिन आगे से इतनी छुट्टियां मत लेना।”


पूजा ने राहत की सांस ली।


उस दिन के बाद उसने कभी छुट्टी लेने की हिम्मत नहीं की।


चाहे खुद बीमार हो जाए, वह काम पर जरूर आती।


समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।


करवा चौथ और फिर दिवाली का त्योहार आने वाला था।


पूजा का काम पहले से कई गुना बढ़ चुका था।


सुजाता जी पूरे घर की सफाई करवाने में लगी थीं।


“ये परदे उतारो।”


“अलमारी साफ करो।”


“छत के जाले भी हटाओ।”


पूजा सुबह से रात तक लगातार काम करती रहती।


लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की।


एक दिन सुजाता जी के घर उनकी बड़ी बहन आईं।


उन्होंने देखा कि पूजा लगातार बिना रुके काम कर रही है।


“बहुत मेहनती लड़की है,” उन्होंने मुस्कुराकर कहा।


लेकिन सुजाता जी तुरंत बोलीं—


“अरे रहने दो दीदी… काम तो करती है लेकिन दस गलतियां भी करती है।”


पूजा ने कुछ नहीं कहा।


जब वह जाने लगी तो सुजाता जी की बहन ने उसके हाथ में हजार रुपये रख दिए।


“बच्चों के लिए मिठाई और कपड़े ले जाना,” उन्होंने प्यार से कहा।


पूजा ने घबराकर पैसे लौटाने चाहे।


“नहीं मैडम… रहने दीजिए…”


लेकिन उन्होंने जबरदस्ती पैसे उसके हाथ में रख दिए।


पूजा की आंखों में खुशी चमक उठी।


उसे लगा इस बार वह बच्चों के लिए अच्छे कपड़े खरीद पाएगी।


लेकिन किस्मत को शायद कुछ और मंजूर था।


दिवाली से ठीक एक दिन पहले सुजाता जी की तबीयत अचानक बिगड़ गई।


उन्हें चक्कर आया और वह सीढ़ियों के पास गिर पड़ीं।


पूजा घबरा गई।


वह तुरंत दौड़कर उन्हें संभालने लगी।


“दीदी… आंखें खोलिए…”


उसने पानी पिलाया और तुरंत पड़ोसियों की मदद से उन्हें अस्पताल लेकर पहुंची।


डॉक्टर ने जांच के बाद कहा—


“इनका बीपी बहुत बढ़ गया था। सही समय पर अस्पताल लाना जरूरी था।”


सुजाता जी चुपचाप पूजा को देखने लगीं।


उनकी आंखों में पहली बार शर्म दिखाई दे रही थी।


डॉक्टर ने मुस्कुराकर कहा—


“आप बहुत भाग्यशाली हैं कि आपके पास इतनी जिम्मेदार इंसान है।”


अस्पताल से लौटते समय पूजा मन ही मन परेशान थी।


“इस बार भी बच्चों के कपड़े नहीं ले पाई…”


लेकिन उसने यह बात किसी से नहीं कही।


घर पहुंचने पर जैसे ही दरवाजा खुला, पूजा हैरान रह गई।


उसके दोनों बच्चे अंदर बैठे थे।


टेबल पर मिठाइयां रखी थीं और पास में नए कपड़ों के पैकेट।


पूजा आश्चर्य से सुजाता जी की ओर देखने लगी।


सुजाता जी धीरे से बोलीं—


“तू हमेशा मेरे घर को अपना समझकर संभालती रही… लेकिन मैंने तुझे कभी अपनापन नहीं दिया।”


उनकी आंखों से आंसू बहने लगे।


“आज समझ आया कि इंसान की कीमत उसके पैसों से नहीं, उसके दिल से होती है।”


उन्होंने बच्चों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—


“इस बार दिवाली हम सब साथ मनाएंगे।”


पूजा की आंखें भर आईं।


उसने धीरे से कहा—


“दीदी… आपने इतना सब क्यों किया?”


सुजाता जी मुस्कुराईं।


“क्योंकि तू सिर्फ कामवाली नहीं है… हमारे परिवार का हिस्सा है।”


इतना सुनते ही पूजा रो पड़ी।


उसके बच्चों के चेहरे पर भी खुशी साफ दिखाई दे रही थी।


उस दिन पहली बार उस घर में अमीरी-गरीबी का फर्क नहीं था।


सिर्फ अपनापन था… सम्मान था… और रिश्तों की सच्ची मिठास थी।


दोस्तों, इंसान चाहे किसी भी काम से जुड़ा हो, उसका सम्मान करना हमारा फर्ज होता है। कई बार हम पैसे या हैसियत के घमंड में दूसरों की मेहनत की कीमत भूल जाते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि हर मेहनतकश इंसान सम्मान का हकदार होता है। रिश्ते तभी सुंदर बनते हैं जब उनमें इंसानियत और अपनापन हो।



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