गरीबी से बड़ा था माँ का दर्द

 

Emotional Indian family scene inside a small house during a rainy night as a brave son protects his exhausted mother from an angry drunken father


बरसात का मौसम था। रात के करीब ग्यारह बज चुके थे। बाहर तेज हवा चल रही थी और छोटी सी कच्ची झोपड़ी की खिड़की बार-बार हिल रही थी। कमरे के अंदर मिट्टी के तेल वाला दीपक धीमी रोशनी दे रहा था।


कमला चूल्हे के पास बैठे-बैठे ही थकान से झपकी लेने लगी थी। सुबह चार बजे से वह काम में लगी हुई थी। कभी किसी के घर झाड़ू-पोंछा, कभी बर्तन, तो कभी कपड़े धोना। दिनभर मेहनत करते-करते उसका शरीर जवाब दे चुका था।


पास में उसकी दो बेटियाँ और छोटा बेटा गहरी नींद में सो रहे थे।


कमला की जिंदगी में सुकून नाम की कोई चीज़ नहीं थी। उसका पति रतन पहले रिक्शा चलाता था, लेकिन पिछले कुछ सालों से शराब और जुए का आदी हो गया था। जो भी कमाता, शाम तक उड़ा देता। कई बार तो घर का सामान तक बेच चुका था।


उस रात भी दरवाजे पर जोर की ठोकर पड़ी।


“कमला! दरवाजा खोल!”


कमला की नींद टूट गई। वह घबराकर उठी और जल्दी से दरवाजा खोला। रतन लड़खड़ाता हुआ अंदर आया। उसकी आँखें लाल थीं और कपड़ों से शराब की बदबू आ रही थी।


अंदर आते ही वह चिल्लाया—


“खाना निकाल!”


कमला ने धीमी आवाज में कहा—


“आज बस बच्चों के लिए ही बना था… आटा खत्म हो गया।”


रतन गुस्से से तिलमिला उठा।


“सारा दिन काम करती है, फिर भी घर में खाना नहीं है?”


कमला चुप रही। वह जानती थी जवाब देने का मतलब नई मुसीबत बुलाना है।


लेकिन रतन का गुस्सा बढ़ता गया। उसने पास रखा लोटा फेंक दिया। आवाज सुनकर बच्चे डरकर उठ बैठे।


छोटी बेटी पायल सहमकर बोली—


“माँ…”


कमला बच्चों को शांत कराने लगी।


“सो जाओ बेटा… कुछ नहीं हुआ।”


इतने में रतन ने कमला का हाथ पकड़ लिया।


“बच्चों के सामने ड्रामा मत कर!”


उसने जोर से धक्का दिया। कमला दीवार से टकरा गई। उसके माथे से हल्का खून निकल आया।


यह देखकर चौदह साल का अर्जुन खुद को रोक नहीं पाया।


वह तेजी से अपनी माँ के सामने आकर खड़ा हो गया।


“बस करो!”


रतन हँस पड़ा।


“अरे वाह! अब तू मुझे सिखाएगा?”


अर्जुन की आवाज काँप रही थी, लेकिन आँखों में गुस्सा साफ था।


“हाँ! क्योंकि माँ इंसान है… कोई सामान नहीं।”


कमला डर गई।


“अर्जुन बेटा, पीछे हट जा…”


लेकिन अर्जुन पहली बार चुप नहीं हुआ।


“हर रोज यही होता है। माँ दिनभर भूखी रहकर भी हमें खिलाती है… और आप उन्हें मारते हो!”


रतन ने हाथ उठाया, लेकिन इस बार अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ लिया।


कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।


रतन शायद पहली बार समझ रहा था कि उसका बेटा अब छोटा नहीं रहा।


अर्जुन बोला—


“आज के बाद माँ पर हाथ उठाया ना… तो मैं ये घर छोड़ दूँगा और अपनी बहनों को भी ले जाऊँगा।”


यह सुनते ही कमला की आँखें भर आईं।


रतन गुस्से में बाहर निकल गया और दरवाजा पटक दिया।


पूरी रात कमला बच्चों को सीने से लगाए बैठी रही।


सुबह अर्जुन जल्दी उठ गया। उसने स्कूल बैग की जगह पुराने थैले में कुछ सामान रखा।


कमला ने पूछा—


“कहाँ जा रहा है?”


“काम ढूँढने।”


“नहीं बेटा! तेरी उम्र पढ़ने की है।”


अर्जुन मुस्कुराया।


“पढ़ूँगा भी माँ… लेकिन अब आपको अकेले नहीं लड़ने दूँगा।”


उस दिन से अर्जुन सुबह स्कूल जाने लगा और शाम को चाय की दुकान पर काम करने लगा।


धीरे-धीरे घर की हालत थोड़ी सुधरने लगी। पायल और छोटी बहन रानी भी पहले से ज्यादा हँसने लगीं।


एक शाम रतन घर आया तो उसने देखा अर्जुन अपनी बहनों को पढ़ा रहा था और कमला सिलाई कर रही थी।


घर में कई दिनों बाद शांति थी।


रतन चुपचाप दरवाजे पर बैठ गया। शायद पहली बार उसे एहसास हुआ कि उसने अपने ही परिवार को कितना दर्द दिया है।


उसकी नजर अर्जुन पर गई। छोटा सा लड़का जिम्मेदारियों के बोझ तले वक्त से पहले बड़ा हो चुका था।


रतन की आँखें झुक गईं।


धीरे से बोला—


“कमला…”


कमला ने उसकी तरफ देखा।


“अगर… मैं बदलना चाहूँ… तो क्या बहुत देर हो गई है?”


कमला कुछ पल चुप रही। फिर बोली—


“देर तब होती है जब इंसान कोशिश छोड़ देता है।”


उस रात पहली बार रतन बिना शराब के सोया।


और कई महीनों बाद उस छोटे से घर में डर नहीं… उम्मीद ने जगह ली थी।



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