बहू बदली नहीं थी, उसे बदल दिया गया था
“रिश्तों में दूरी हमेशा गलतफहमियों से नहीं आती… कई बार बार-बार मिले अपमान और तानों की वजह से इंसान खुद ही अपने दिल के दरवाजे बंद कर लेता है। फिर लोग शिकायत तो करते हैं कि सामने वाला बदल गया है, लेकिन यह नहीं देखते कि उसे बदलने पर मजबूर किसने किया था…”
बरामदे में बैठी सावित्री देवी का चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था।
उनकी आवाज पूरे घर में गूंज रही थी।
“आजकल की बहुओं को तो बस अपने मायके वाले ही अच्छे लगते हैं। ससुराल वालों से तो जैसे कोई मतलब ही नहीं होता। जब देखो मुंह फुलाए घूमती रहती हैं।”
रसोई में खड़ी नेहा चुपचाप बर्तन समेट रही थी।
उसे अच्छी तरह पता था कि ये बातें उसी को सुनाने के लिए बोली जा रही हैं।
घर में जब भी कोई बात होती, किसी न किसी तरह उसका नाम बीच में आ ही जाता था।
नेहा ने जवाब देना बहुत पहले छोड़ दिया था।
क्योंकि हर जवाब का नतीजा सिर्फ एक नया झगड़ा होता था।
कुछ देर पहले ही उसके मामा-मामी उससे मिलने आए थे।
कई महीनों बाद उनसे मुलाकात हुई थी।
इसलिए वह उनके साथ बैठकर हंस-बोल रही थी।
बस यही बात सावित्री देवी को पसंद नहीं आई।
“अरे, हमारी भी तो रिश्तेदारियां हैं। लेकिन इनके लिए तो बस मायके वाले ही सबसे खास हैं।”
नेहा ने फिर भी कुछ नहीं कहा।
वह अपने कमरे में चली गई।
लेकिन आज सावित्री देवी का गुस्सा शांत होने वाला नहीं था।
वे उसके पीछे-पीछे कमरे तक पहुंच गईं।
“लगता है नौकरी का असर सिर चढ़कर बोल रहा है। अब तो घर वालों के बीच बैठना भी तुम्हें अपनी शान के खिलाफ लगता है।”
नेहा ने गहरी सांस ली।
फिर शांत स्वर में बोली,
“मम्मी जी, अगर आप सच सुनना चाहती हैं तो मैं बता सकती हूं कि मैं दूर क्यों रहती हूं।”
“हां बताओ, क्या अत्याचार कर दिया हमने तुम पर?”
नेहा हल्का सा मुस्कुराई।
“अत्याचार जैसा कोई बड़ा शब्द मैं नहीं कहूंगी, मम्मी जी। लेकिन इतना जरूर कहूंगी कि इस घर में रहते हुए भी मुझे कभी अपनेपन का एहसास नहीं हुआ। हर बार ऐसा लगा जैसे मैं इस परिवार का हिस्सा नहीं, बल्कि कोई बाहरी इंसान हूं जिसे हर कदम पर खुद को साबित करना पड़ता है।”
सावित्री देवी का चेहरा तमतमा उठा।
“वाह बहू! हमने तुम्हें इस घर की बहू बनाकर सम्मान दिया, हर सुविधा दी, और अब तुम कह रही हो कि हमने तुम्हें अपना नहीं माना?” उन्होंने नाराज़गी से कहा।
नेहा कुछ पल चुप रही।
फिर बोली,
“आपको शायद याद नहीं होगा, लेकिन मुझे सब याद है।”
और उसकी आंखों के सामने पुराने दिन घूमने लगे।
शादी के बाद जब वह पहली बार इस घर में आई थी, तब वह बहुत खुश रहती थी।
सबके साथ बैठती।
बातें करती।
हंसती।
घर के हर सदस्य को अपना बनाने की कोशिश करती।
लेकिन हर बार उसकी किसी न किसी बात का मजाक बना दिया जाता।
अगर वह खुलकर बातें करे तो कहा जाता, ‘बहुत बोलती है।’
और अगर चुपचाप अपने काम में लगी रहे तो ताना मिलता, ‘देखो ज़रा, कितनी घमंडी है।’”
अगर कोई सुझाव दे दे तो कहा जाता,
“अभी आई है और घर चलाना सिखा रही है।”
एक बार घर में सभी लोग बैठे हुए थे।
नेहा भी उनके साथ बैठी थी।
बातों-बातों में उसने कहा,
“पापा जी, अगर बैठक वाले कमरे में हल्के रंग के पर्दे लगा दिए जाएं तो कमरा और खुला-खुला लगेगा।”
उसने तो बस अपनी राय दी थी।
लेकिन तभी उसकी ननद बोली,
“भाभी, अभी एक महीना हुआ है आपको आए हुए और आपने घर बदलना शुरू कर दिया?”
सब हंसने लगे।
नेहा भी मुस्कुरा दी।
उसे लगा मजाक है।
लेकिन फिर देवर ने कहा,
“धीरे-धीरे पूरा घर अपने हिसाब से कर लेंगी।”
सावित्री देवी ने भी हंसते हुए कहा,
“हमें तो डर लगने लगा है।”
सबके लिए वह मजाक था।
लेकिन नेहा के लिए नहीं।
उसे पहली बार महसूस हुआ था कि उसकी बातों की कोई कीमत नहीं है।
उसके बाद उसने राय देना कम कर दिया।
लेकिन बातें यहीं खत्म नहीं हुईं।
कुछ महीनों बाद उसके माता-पिता घर आए।
नेहा बहुत खुश थी।
वह उनके साथ बैठकर बातें कर रही थी।
तभी उसकी ननद ने कहा,
“भाभी, लगता है हमें तो आपसे बात करने का मौका ही नहीं मिलेगा।”
सब हंस पड़े।
लेकिन उसी शाम जब नेहा अपनी ननद के साथ बैठी बातें कर रही थी, तब वही ननद अपनी मां से कह रही थी,
“भाभी बहुत सवाल पूछती हैं। हर बात में दखल देती हैं।”
उस दिन नेहा को समझ आ गया था कि वह चाहे कुछ भी करे, गलत ही कहलाएगी।
धीरे-धीरे उसने खुद को सीमित कर लिया।
जितना जरूरी हो उतना ही बोलती।
बाकी समय अपने काम में लगी रहती।
फिर उसने नौकरी शुरू कर ली।
उसे वहां सुकून मिलता था।
कम से कम वहां लोग उसकी हर बात का मतलब निकालने की कोशिश नहीं करते थे।
सावित्री देवी ने कई बार शिकायत की।
“पहले जैसी नहीं रही बहू।”
लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि पहले जैसी रहने दिया किसने था।
कमरे में खड़ी सावित्री देवी अब चुप थीं।
नेहा की बातें उनके दिल में उतर रही थीं।
उन्हें याद आने लगा कि सचमुच हर बार उनकी बेटी और बेटे ने मिलकर नेहा की छोटी-छोटी बातों को बड़ा मुद्दा बना दिया था।
और उन्होंने कभी नेहा का पक्ष सुनने की कोशिश ही नहीं की।
उन्हें यह भी याद आया कि कितनी बार नेहा रोते हुए अपने कमरे में गई थी।
और उन्होंने सोच लिया था कि बहू नाटक कर रही है।
पहली बार उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ।
उन्होंने धीरे से कहा,
“तो इसलिए तुम सबसे दूर-दूर रहती हो?”
नेहा की आंखें भर आईं।
“जब हर बात पर इंसान को कटघरे में खड़ा कर दिया जाए, तब वह बोलना बंद कर देता है मम्मी जी।”
सावित्री देवी की नजरें झुक गईं।
आज उनके पास कोई जवाब नहीं था।
उन्हें समझ आ चुका था कि रिश्ते एक दिन में नहीं टूटते।
वे रोज-रोज दिए गए तानों, अपमानों और गलतफहमियों से धीरे-धीरे कमजोर होते हैं।
उन्होंने आगे बढ़कर नेहा का हाथ पकड़ लिया।
“मुझसे गलती हुई बहू।”
नेहा ने आश्चर्य से उनकी तरफ देखा।
सावित्री देवी की आंखों में सचमुच पछतावा था।
“हम हमेशा यही सोचते रहे कि तुम बदल गई हो। लेकिन कभी यह नहीं सोचा कि तुम्हें बदलने की वजह हम खुद हैं।”
नेहा की आंखों से आंसू बह निकले।
कई सालों बाद पहली बार उसे लगा कि किसी ने उसके दर्द को समझा है।
उस दिन घर में कोई बड़ा चमत्कार नहीं हुआ।
लेकिन एक जरूरी शुरुआत जरूर हुई।
शिकायतों की जगह समझदारी ने ले ली थी।
और शायद यही किसी भी रिश्ते को बचाने का पहला कदम होता है।
क्योंकि अपनापन सिर्फ यह कह देने से नहीं आता कि “तुम हमारे अपने हो।”
अपनापन तो तब महसूस होता है जब इंसान की बात सुनी जाए, उसकी भावनाओं की कद्र की जाए और उसे हर वक्त गलत साबित करने की कोशिश न की जाए।

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