पिता की बीमारी का सबसे बड़ा झूठ
बरसात के बाद की उमस भरी दोपहर थी। आसमान में बादल तो छाए हुए थे, लेकिन गर्मी कम होने का नाम नहीं ले रही थी। कानपुर की एक तंग गली में बने छोटे से मकान के बाहर दूधवाला अपनी पुरानी साइकिल खड़ी किए खड़ा था। उसके चेहरे पर झुंझलाहट साफ दिखाई दे रही थी।
“भाभी जी, तीन दिन से उधार चल रहा है,” उसने थोड़ा ऊँची आवाज़ में कहा, “अब और दूध नहीं दे पाऊंगा।”
दरवाज़े पर खड़ी श्रेया ने होंठ भींच लिए। गोद में उसकी डेढ़ साल की बेटी अन्वी लगातार रो रही थी। शायद भूख से।
श्रेया ने धीमे स्वर में कहा, “भैया… बस आज शाम तक इंतज़ार कर लीजिए।”
दूधवाले ने सिर हिलाया।
“नहीं भाभी, मालिक हिसाब मांगता है। मैं अब और उधार नहीं लिख सकता।”
इतना कहकर वह साइकिल घुमाकर चला गया।
श्रेया कुछ देर दरवाज़े पर खड़ी रही। उसकी आंखें भर आई थीं। उसने धीरे से अपनी कलाई की तरफ देखा। वहां सिर्फ एक पतली सोने की चूड़ी बची थी।
वह कुछ पल उसे देखती रही, फिर कांपते हाथों से उतारने लगी।
उसी समय गली के मोड़ पर एक ऑटो आकर रुका।
उसमें से विवेक उतरा।
आज फैक्ट्री में बिजली खराब हो जाने के कारण काम जल्दी बंद हो गया था, इसलिए वह दोपहर में ही घर लौट आया था।
ऑटो से उतरते ही उसकी नजर श्रेया पर पड़ी।
उसने साफ देखा— श्रेया हाथ में चूड़ी पकड़े खड़ी थी।
विवेक के कदम अचानक रुक गए।
“श्रेया…?”
श्रेया चौंक गई। उसने जल्दी से चूड़ी पल्लू में छिपा ली।
“तुम… अभी कैसे आ गए?”
विवेक धीरे-धीरे उसके पास आया। उसकी नजर अन्वी के चेहरे पर गई। बच्ची के होंठ सूखे हुए थे और वह रोते-रोते थक चुकी थी।
विवेक का दिल घबरा उठा।
“घर में दूध नहीं है?”
श्रेया चुप रही।
“मैं तुमसे पूछ रहा हूं।”
उसकी आंखों से आंसू बह निकले।
“मैं संभाल लेती…”
“कैसे संभालती?” विवेक की आवाज भारी हो गई।
कुछ पल की खामोशी के बाद श्रेया टूट गई।
“मांजी ने कहा था पहले अस्पताल का खर्च जरूरी है।”
विवेक का माथा सिकुड़ गया।
पिछले चार महीनों से उसकी मां हर हफ्ते फोन पर रोती थीं।
“तेरे पापा की किडनी खराब हो गई है बेटा…”
“डॉक्टर ने तुरंत पैसे मांगे हैं…”
“इलाज रुका तो कुछ भी हो सकता है…”
इन बातों को सुनकर विवेक ने दिन-रात मेहनत की थी। फैक्ट्री में ओवरटाइम किया। अपनी बाइक गिरवी रख दी। यहां तक कि श्रेया के गहने भी बिक गए।
फिर भी घर में हमेशा पैसों की कमी बनी रहती।
वह इसे मजबूरी समझता रहा।
लेकिन आज उसकी बेटी भूखी थी।
विवेक ने धीमे स्वर में पूछा, “पापा अस्पताल में हैं?”
श्रेया ने डरते हुए सिर हिलाया।
“मुझे नहीं लगता।”
“मतलब?”
“परसों मैं दवा लेने गई थी,” श्रेया बोली, “रास्ते में मैंने पिताजी को चौक वाले रेस्टोरेंट में देखा।”
विवेक का चेहरा सख्त हो गया।
“क्या?”
“वो बिल्कुल ठीक थे। किसी आदमी के साथ बैठकर हंस-हंसकर बातें कर रहे थे।”
विवेक कुछ पल तक कुछ बोल ही नहीं पाया।
तभी उसके मोबाइल पर बैंक का मैसेज आया।
“₹3,50,000 transferred to S. Constructions.”
विवेक चौंक गया।
यह वही अकाउंट था जिसमें वह इलाज के लिए पैसे भेजता था।
उसने तुरंत बैंक ऐप खोला। पिछले दो महीनों की हिस्ट्री देखते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
हर बड़े ट्रांजैक्शन के सामने किसी न किसी प्रॉपर्टी कंपनी का नाम लिखा था।
उसके हाथ कांपने लगे।
वह तेजी से घर के अंदर गया।
ड्रॉइंग रूम में पहुंचते ही वह रुक गया।
कमरे में नया एलईडी टीवी लगा था।
छोटा भाई रोहन महंगे मोबाइल पर गेम खेल रहा था।
और उसके पिता, जिन्हें चलने में तकलीफ होने की बात कही जाती थी, आराम से सोफे पर बैठे समोसे खा रहे थे।
विवेक दरवाज़े पर ही रुक गया।
उसकी मां मुस्कुराकर बोलीं, “अरे बेटा! आज जल्दी आ गया?”
लेकिन इस बार विवेक की आंखों में अपनापन नहीं था।
उसने सीधे पूछा—
“इलाज कहां चल रहा है पापा का?”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
महेश जी ने खांसने की एक्टिंग की।
“बेटा… डॉक्टर ने आराम करने को कहा है…”
विवेक चीख पड़ा—
“झूठ मत बोलिए!”
रोहन घबरा गया।
मां गुस्से में बोलीं—
“यही दिन देखना बाकी था! अब मां-बाप को झूठा कहेगा?”
विवेक ने मोबाइल उनकी तरफ बढ़ा दिया।
“तो ये पैसे कहां गए?”
किसी के पास जवाब नहीं था।
कुछ देर बाद रोहन धीरे से बोला—
“भैया… पापा ने एक प्लॉट बुक कराया है।”
विवेक स्तब्ध रह गया।
“क्या?”
मां तुरंत बोलीं—
“हम तुम्हारे लिए ही तो कर रहे थे। कल को जमीन रहेगी तो सबका फायदा होगा।”
विवेक की आंखें भर आईं।
“मेरी बेटी भूखी है…” उसकी आवाज टूट गई, “और आपको प्लॉट की पड़ी है?”
दरवाज़े पर खड़ी श्रेया चुपचाप रो रही थी।
वह इतने दिनों तक इसलिए चुप रही क्योंकि उसे डर था कि सच सामने आया तो घर टूट जाएगा।
लेकिन सच तो यह था कि घर पहले ही टूट चुका था।
बस कोई मानना नहीं चाहता था।
विवेक धीरे-धीरे अपने पिता के सामने जाकर खड़ा हो गया।
“एक बार सच बोल दीजिए…”
उसकी आवाज कांप रही थी।
“क्या बीमारी झूठ थी?”
महेश जी ने नजरें झुका लीं।
और वही जवाब काफी था।
विवेक की आंखों से आंसू बह निकले।
उसे लगा जैसे उसके भीतर सब कुछ खत्म हो गया हो।
उसने मुड़कर श्रेया को देखा।
सूनी कलाई…
घिसी हुई चप्पल…
गोद में रोती बच्ची…
आज पहली बार उसे अपनी पत्नी का दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
उस रात वह देर तक चुप बैठा रहा।
फिर धीरे से बोला—
“तुमने इतना सब अकेले कैसे सहा?”
श्रेया हल्का सा मुस्कुराई, लेकिन आंखों से आंसू बह निकले।
“क्योंकि मुझे लगा परिवार बचाना जरूरी है।”
विवेक ने बेटी को गोद में उठा लिया।
“परिवार वो नहीं होता जहां डर में जीना पड़े।”
उस रात दो बजे तक वह चुपचाप सामान बांधता रहा।
सुबह जब वह जाने लगा तो उसकी मां रोने लगीं।
“बहू ने बेटा छीन लिया…”
लेकिन इस बार विवेक शांत था।
उसने धीरे से कहा—
“नहीं मां… लालच ने बेटा दूर किया है।”
इतना कहकर वह घर से बाहर निकल गया।
जेब में सिर्फ बारह सौ रुपये थे।
सामने मुश्किलों से भरी जिंदगी खड़ी थी।
लेकिन कई महीनों बाद पहली बार उसे खुद से शर्म नहीं आ रही थी।
क्योंकि आज उसने सिर्फ बेटा बनने की नहीं…
एक पति और पिता होने की जिम्मेदारी निभाई थी।

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