बहु चुप थी, इसलिए सबने उसे मजबूत समझ लिया

 

Hardworking Indian woman managing kitchen and family responsibilities in a warm household setting


“कई बार इंसान अपने परिवार के लिए इतना कुछ करता चला जाता है… कि धीरे-धीरे लोग उसकी मेहनत को प्यार नहीं, उसकी जिम्मेदारी समझने लगते हैं…”


रसोई में बर्तनों की आवाज़ लगातार गूंज रही थी।

गैस पर चाय चढ़ी थी, साथ में आलू की सब्जी बन रही थी और तवे पर रोटियाँ सिक रही थीं।


नेहा एक हाथ से रोटी सेंक रही थी और दूसरे हाथ से अपनी बेटी की पानी की बोतल भर रही थी। तभी पीछे से उसकी सास शारदा देवी की तेज आवाज़ आई—


“बहु… चाय बनी कि नहीं अभी तक? तुम्हारे पिताजी को दवाई खानी है।”


नेहा जल्दी से कप में चाय डालते हुए बोली—

“बस मम्मी जी, अभी लाई।”


उधर उसका बेटा आरव स्कूल यूनिफॉर्म पहनते हुए बोला—

“मम्मी… मेरे जूते नहीं मिल रहे।”


“बेटा बेड के नीचे देखो… कल वहीं उतारे थे तुमने।”


इतने में पति विकास ऑफिस के कपड़े पहनते हुए कमरे से निकला और बोला—


“नेहा, मेरा टिफिन जल्दी पैक कर दो… आज मीटिंग है।”


नेहा बिना कुछ बोले तेजी से सब काम करती रही।


घर के हर सदस्य की जरूरत का उसे ध्यान था।

लेकिन उसकी अपनी जरूरतें कब पीछे छूट गईं… उसे खुद भी याद नहीं था।


कुछ देर बाद उसने सबको नाश्ता कराया। बच्चों को स्कूल भेजा। ससुर जी की दवाई दी। पति का बैग तैयार किया। फिर खुद जल्दी-जल्दी तैयार होकर स्कूल के लिए निकल गई।


नेहा पास के सरकारी स्कूल में टीचर थी।


स्कूल पहुँचते-पहुँचते ही उसकी सांस फूलने लगती थी। लेकिन चेहरे पर हमेशा मुस्कान रखती थी।


उस दिन क्लास में बच्चों को पढ़ाते हुए भी उसका ध्यान बार-बार घर की तरफ जा रहा था।


उसे याद आया कि शाम को विकास के ताऊजी और ताईजी आने वाले हैं।


मतलब शाम को फिर ढेर सारे काम।


स्कूल की छुट्टी होते ही बाकी टीचर स्टाफ रूम में बैठकर चाय पी रहे थे। लेकिन नेहा जल्दी-जल्दी अपनी कॉपियाँ बैग में रख रही थी।


उसकी सहेली कविता बोली—

“अरे बैठ ना पाँच मिनट… इतनी भी क्या जल्दी है?”


नेहा हल्की मुस्कान के साथ बोली—

“घर जाकर पूरा खाना भी बनाना है… मेहमान आने वाले हैं।”


कविता बोली—

“यार तू मशीन है क्या? सुबह घर, फिर स्कूल, फिर घर।”


नेहा हँसते हुए बोली—

“अब आदत हो गई है।”


लेकिन सच ये था कि आदत नहीं… मजबूरी हो गई थी।


वो सब्जियाँ और मिठाई लेते हुए घर पहुँची। जैसे ही दरवाजे के अंदर आई, शारदा देवी की आवाज़ फिर सुनाई दी—


“बहु, इतनी देर लगा दी? मेहमान कभी भी आते होंगे।”


नेहा ने घड़ी देखी।

उसे खुद बैठकर पानी पीने तक का समय नहीं मिला था।


वो जल्दी से किचन में घुस गई।


उसकी बेटी सिया पीछे आई और बोली—


“मम्मी, मैं आपकी मदद कर दूँ?”


नेहा ने प्यार से कहा—

“नहीं बेटा, तुम पढ़ाई करो।”


सिया उदास होकर बोली—

“आप हमेशा यही बोलती हो।”


नेहा कुछ पल के लिए चुप हो गई।


फिर बोली—

“अच्छा चलो… सलाद काट दो।”


सिया खुशी से मुस्कुरा दी।


काम करते-करते नेहा को अपनी शादी के दिन याद आने लगे।


जब रिश्ता तय हुआ था तब शारदा देवी ने उसके माता-पिता से कहा था—


“हमें नौकरी करने वाली बहु चाहिए… लेकिन घर की जिम्मेदारी पहले होनी चाहिए।”


नेहा ने भी बिना सोचे तुरंत हामी भर दी थी।


उसे लगा था कि सब मिलकर घर संभालेंगे।


लेकिन शादी के बाद धीरे-धीरे पूरा घर उसी की जिम्मेदारी बन गया।


सुबह सबसे पहले उठना…

सबके लिए नाश्ता बनाना…

बच्चों को तैयार करना…

स्कूल जाना…

लौटकर फिर खाना बनाना…

रात तक काम करते रहना…


उसकी जिंदगी बस जिम्मेदारियों में बदल गई थी।


तभी बाहर से विकास की आवाज़ आई—


“नेहा… चाय बन गई क्या?”


नेहा ने जल्दी से गैस पर दूसरा पतीला चढ़ा दिया।


कुछ देर बाद मेहमान आ गए।


ताईजी ने घर में कदम रखते ही मुस्कुराकर कहा—


“वाह शारदा, तुम्हारी बहु तो पूरा घर संभाल रही है।”


शारदा देवी गर्व से बोलीं—

“हाँ हमारी बहु बहुत काम करती है।”


नेहा चाय लेकर आई। उसके चेहरे पर थकान साफ दिख रही थी।


ताईजी ने गौर से उसे देखा और बोलीं—


“बेटा, तुम ठीक हो ना?”


“जी ताईजी।”


“लेकिन तुम्हारा चेहरा तो बता रहा है कि तुम बहुत थक चुकी हो।”


नेहा मुस्कुराकर चुप हो गई।


तभी ताईजी ने शारदा देवी की तरफ देखा और बोलीं—


“शारदा… तुम इसकी मदद नहीं करती क्या?”


शारदा देवी तुरंत बोलीं—


“अरे हमने थोड़ी कहा है नौकरी करने को। खुद की इच्छा से करती है। अब बाहर भी जाएगी तो घर भी संभालना पड़ेगा।”


ताईजी शांत स्वर में बोलीं—


“घर केवल बहु का होता है क्या?”


कमरे में सन्नाटा छा गया।


विकास मोबाइल चला रहा था। लेकिन अब उसका ध्यान भी बातचीत पर चला गया।


ताईजी फिर बोलीं—


“सुबह से देख रही हूँ… नेहा एक मिनट बैठी तक नहीं। और तुम लोग इसे सामान्य बात समझ रहे हो।”


शारदा देवी बोलीं—

“अरे बहन, औरतों को तो काम करना ही पड़ता है।”


“काम करना और अकेले सबका बोझ उठाना… दोनों अलग बातें हैं।” ताईजी ने समझाया।


नेहा की आँखें भर आईं।


लेकिन वो फिर भी बोली—

“ताईजी, सच में मुझे कोई परेशानी नहीं है।”


ताईजी हल्का सा मुस्कुराईं—


“बेटा, सबसे ज्यादा थका हुआ इंसान ही अक्सर यही बोलता है कि मैं ठीक हूँ।”


सिया तुरंत बोल पड़ी—


“हाँ दादी… मम्मी कभी अपने लिए टाइम ही नहीं निकालतीं। कल तो इन्होंने खाना भी ठंडा खाया था।”


आरव भी बोला—


“और रात में मम्मी के सिर में दर्द हो रहा था।”


बच्चों की बातें सुनकर विकास चुप हो गया।


उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसने कभी गौर ही नहीं किया कि नेहा कितना काम करती है।


ताईजी ने विकास की तरफ देखते हुए कहा—


“बेटा, पत्नी केवल जिम्मेदारी निभाने के लिए नहीं होती… वो इंसान भी होती है।”


विकास धीरे से बोला—


“शायद गलती मेरी है…”


नेहा तुरंत बोली—

“नहीं ऐसा मत कहिए।”


लेकिन विकास पहली बार सच में सोचने लगा था।


उस रात खाने के बाद जब नेहा बर्तन समेट रही थी, तभी विकास किचन में आया।


नेहा हैरानी से बोली—

“आप यहाँ?”


विकास ने सिंक में पड़े बर्तनों की तरफ देखते हुए कहा—


“आज बर्तन मैं धो देता हूँ।”


नेहा को लगा शायद वो मजाक कर रहा है।


लेकिन विकास सच में बर्तन धोने लगा।


इतने में शारदा देवी भी वहाँ आ गईं।


उन्होंने बेटे को बर्तन धोते देखा तो बोलीं—


“अरे रहने दो… लोग क्या कहेंगे?”


विकास मुस्कुराया—


“लोग ये कहेंगे कि पति अपनी पत्नी की मदद कर रहा है।”


शारदा देवी चुप हो गईं।


ताईजी दूर बैठी सब देख रही थीं। उनके चेहरे पर संतोष था।


अगले दिन से घर में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा।


आरव अपना बैग खुद तैयार करने लगा।

सिया अपने कपड़े खुद फोल्ड करने लगी।

विकास छुट्टी वाले दिन किचन में हाथ बँटाने लगा।


और सबसे बड़ा बदलाव शारदा देवी में आया।


अब वो हर समय केवल आदेश नहीं देती थीं।

कभी नेहा को बैठाकर चाय पिला देतीं।

कभी कहतीं—


“बहु, आज सब्जी मैं काट देती हूँ।”


एक दिन नेहा बालकनी में बैठी आराम से चाय पी रही थी।


सिया मुस्कुराकर बोली—


“मम्मी… अब आप पहले जैसी नहीं लगतीं।”


“कैसी?”


“पहले हमेशा थकी रहती थीं… अब खुश लगती हो।”


नेहा की आँखें भर आईं।


इतने में शारदा देवी भी वहाँ आ गईं।


उन्होंने धीरे से कहा—


“बहु… मुझे माफ कर देना। मैं समझ ही नहीं पाई कि तुम अंदर से कितना थक चुकी थीं।”


नेहा तुरंत बोली—


“मम्मी जी, आप ऐसी बातें मत कहिए।”


शारदा देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया—


“नहीं बहु… सच कह रही हूँ। घर चलाना केवल बहु की जिम्मेदारी नहीं होती… पूरे परिवार की होती है।”


नेहा मुस्कुरा दी।


कई दिनों बाद उसे लगा कि इस घर में उसकी मेहनत को केवल काम नहीं… सम्मान भी मिल रहा है।


अब घर का माहौल बदल चुका था।


काम वही थे… लेकिन बोझ नहीं लगता था।

क्योंकि अब जिम्मेदारियाँ बाँटी जा रही थीं।


और सच तो यही है…


जब घर के लोग एक-दूसरे का हाथ पकड़ लेते हैं…

तब जिंदगी आसान हो जाती है।


दोस्तों, घर की औरत अगर हर समय चुपचाप काम कर रही है… तो इसका मतलब ये नहीं कि उसे थकान नहीं होती।

वो भी इंसान है। उसे भी आराम, सम्मान और अपनापन चाहिए।


क्योंकि घर केवल दीवारों से नहीं चलता…

घर उस औरत की मुस्कान से चलता है… जो पूरे परिवार को जोड़े रखती है।



No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.