मायका सिर्फ हिस्सा लेने के लिए नहीं होता
“कभी-कभी इंसान रिश्तों को निभाने के बजाय उन्हें अपने फायदे के तराज़ू में तौलने लगता है… लेकिन वक्त एक दिन उसे आईना जरूर दिखाता है…”
सुबह के आठ बजे थे। घर के आँगन में हल्की धूप फैल चुकी थी। रसोई से चाय और पराठों की खुशबू आ रही थी।
सविता जल्दी-जल्दी सबके लिए नाश्ता बना रही थी। सास के जाने के बाद पूरे घर की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर आ गई थी। पति अजय नौकरी पर जाते थे और ससुर हरिराम जी घर संभालने के नाम पर बस आदेश दिया करते थे।
“बहू… मेरी चाय में चीनी कम रखना,”
ड्रॉइंग रूम से आवाज़ आई।
“जी पिताजी…”
सविता ने तुरंत जवाब दिया।
इतने में बेटा रोहन स्कूल बैग लेकर भागता हुआ आया—
“मम्मी मेरी पानी की बोतल?”
“टेबल पर रखी है बेटा…”
सविता एक साथ दस काम कर रही थी। मगर उसके चेहरे पर कभी शिकायत नहीं दिखती थी।
नाश्ता करते हुए अचानक हरिराम जी बोले—
“बहू, सुना है तुम्हारे भाई ने नया घर लिया है?”
सविता हल्का सा मुस्कुराई—
“जी पिताजी… पिछले महीने ही लिया है।”
“अच्छा… फिर तो तुम्हें एक बार मायके होकर आना चाहिए। बहुत समय हो गया।”
सविता के हाथ रुक गए।
उसे यकीन ही नहीं हुआ कि ये बात उसके ससुर के मुंह से निकली है।
क्योंकि शादी के बाद जब भी उसने मायके जाने की बात की थी, हरिराम जी हमेशा कोई ना कोई बहाना बना देते थे।
कभी कहते—
“बहू के बार-बार मायके जाने से घर टूटते हैं…”
कभी कहते—
“अब यही तुम्हारा असली घर है…”
और कई बार तो ताना भी मार देते—
“इतनी याद आती है मायके की तो शादी क्यों की थी?”
इसी वजह से सविता पिछले डेढ़ साल से मायके नहीं जा पाई थी।
आज अचानक इतना बदलाव?
उसके मन में सवाल उठने लगे।
दोपहर को अजय ऑफिस से लौटे तो सविता ने सारी बात बताई।
अजय भी हैरान रह गए।
“सच कह रही हो? पिताजी ने खुद कहा कि तुम मायके जाओ?”
“हाँ… और बार-बार कह रहे हैं कि कुछ दिन रह भी आऊँ।”
अजय कुछ देर सोचते रहे।
फिर बोले—
“लगता है कोई बात जरूर है।”
शाम को खाने की टेबल पर हरिराम जी फिर बोले—
“बहू, टिकट कब की करा रहे हो? लड़की का मायका भी जरूरी होता है।”
सविता चुप रही।
अजय ने धीरे से कहा—
“कल की टिकट करा देता हूँ पिताजी।”
हरिराम जी तुरंत खुश हो गए।
“हाँ हाँ… बिल्कुल। और सुनो बहू, अपने पिताजी का भी ख्याल रखना। आखिर बेटी ही बूढ़े मां-बाप का असली सहारा होती है।”
सविता अंदर ही अंदर चौंक गई।
यही आदमी पहले कहा करता था—
“बेटी पराया धन होती है…”
रात को कमरे में सविता बोली—
“मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा अजय… पिताजी इतनी मीठी बातें क्यों कर रहे हैं?”
अजय ने गहरी सांस ली।
“कल तुम अपने पापा से आराम से बात करना… शायद वहीं से कुछ पता चले।”
अगले दिन सविता ने अपने पिता रमेश बाबू को फोन किया।
उधर से खुश आवाज़ आई—
“अरे बेटा! सच में आ रही है तू?”
“हाँ पापा… लेकिन एक बात पूछूँ?”
“पूछ बेटा।”
“क्या आपने पिताजी से कोई खास बात की थी?”
रमेश बाबू हँस पड़े।
“अरे हाँ… बस यूँ ही बता दिया था कि इस महीने अपनी जमीन और मकान दोनों बच्चों के नाम बराबर बाँटने वाला हूँ।”
सविता कुछ पल के लिए चुप रह गई।
अब उसे सब समझ आ चुका था।
फोन रखते ही उसकी आँखों के सामने पिछले कई साल घूम गए।
कैसे हरिराम जी हर छोटी चीज़ में हिसाब देखते थे।
कैसे उन्होंने कभी उसे बेटी नहीं माना।
और आज… संपत्ति की खबर सुनते ही उनका व्यवहार बदल गया।
उस रात सविता बहुत देर तक सोचती रही।
दो दिन बाद वह बच्चों के साथ मायके पहुँची।
मायके का दरवाज़ा खुलते ही उसका छोटा भाई निखिल दौड़कर आया।
“दीदी आ गई!”
भाभी ने गले लगा लिया।
पिता की आँखें खुशी से भर आईं।
सविता को लगा जैसे बरसों बाद उसने चैन की सांस ली हो।
चार दिन कैसे निकल गए, पता ही नहीं चला।
फिर एक शाम रमेश बाबू ने कहा—
“बेटा, अगले हफ्ते वसीयत बनवानी है। तुम दोनों भाई-बहन बराबर के हकदार हो।”
सविता तुरंत बोली—
“नहीं पापा, मुझे कुछ नहीं चाहिए। यह घर और सारी संपत्ति निखिल की ही रहने दीजिए। आखिर इतने सालों से उसी ने आपका साथ निभाया है…”
निखिल तुरंत बीच में बोल पड़ा—
“ऐसा क्यों कह रही हैं दीदी? क्या आप इस घर की बेटी नहीं हैं?”
सविता धीमी आवाज़ में बोली—
“बेटी तो हूँ… लेकिन इस घर को संभाला तुमने है। मम्मी के जाने के बाद पापा का हर सुख-दुख तुमने देखा है। असली हक तुम्हारा बनता है…”
निखिल हल्का सा मुस्कुराया और बोला—
“दीदी, रिश्ते सिर्फ एक घर में रहकर नहीं निभाए जाते। आपने शादी के बाद भी इस घर को कभी पराया नहीं समझा। हर त्योहार पर सबसे पहले पापा के लिए सोचती रहीं। उनकी दवाइयों से लेकर मेरी नौकरी तक, हर मुश्किल में आपने हमारा साथ दिया। अगर मैं पापा के पास रहकर उनका सहारा बना… तो आपने दूर रहकर भी हमेशा इस परिवार का साथ निभाया है।”
रमेश बाबू की आँखें नम हो गईं।
“अगर तू मना करेगी ना बेटा… तो मुझे लगेगा कि मैंने अपनी बेटी के साथ भेदभाव किया।”
बहुत समझाने के बाद सविता मान गई।
दो दिन बाद वह वापस ससुराल लौटने लगी।
लेकिन इस बार उसके साथ एक और व्यक्ति था।
उसके पिता।
घर पहुँचते ही हरिराम जी चौंक गए।
“अरे समधी जी! अचानक? सब ठीक तो है?”
सविता हल्की मुस्कान के साथ बोली,
“सब बिल्कुल ठीक है पिताजी।”
हरिराम जी ने दरवाज़े के पास रखे बड़े-बड़े सूटकेसों की तरफ देखा और हैरानी से बोले,
“फिर ये इतना सामान…?”
सविता ने शांत स्वर में अपने पिता की ओर देखते हुए कहा,
“पापा अब कुछ दिन हमारे साथ रहेंगे।”
इतना सुनते ही हरिराम जी के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। उनकी आँखों की चमक अचानक गायब हो गई, जैसे उन्हें ऐसी बात की बिल्कुल उम्मीद ना हो।
“मतलब?”
सविता शांत आवाज़ में बोली—
“आप ही तो कहते हैं कि बेटी और बेटा बराबर होते हैं। जब संपत्ति में बेटी बराबर की हकदार है… तो मां-बाप की जिम्मेदारी में भी बराबर की हिस्सेदार होगी ना?”
हरिराम जी चुप रह गए।
सविता आगे बोली—
“भैया ने इतने साल पापा की सेवा की। अब मेरी बारी है। मायका सिर्फ लेने का रिश्ता नहीं होता… निभाने का भी होता है।”
अजय तुरंत बोले—
“हाँ पिताजी, मैंने गेस्ट रूम तैयार कर दिया है।”
रमेश बाबू बोले—
“अरे बेटा, मैं बोझ नहीं बनना चाहता…”
अजय मुस्कुराए—
“आप बोझ नहीं, हमारे बड़े हैं।”
हरिराम जी सब सुनते रहे।
उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि लालच इंसान से उसका सम्मान भी छीन लेता है।
जिस स्वार्थ से उन्होंने बहू को मायके भेजा था… उसी ने आज उन्हें भीतर से छोटा कर दिया था।
उस रात पहली बार हरिराम जी अपने कमरे में अकेले बैठे थे।
और बाहर आँगन में सविता अपने पिता के साथ चाय पीते हुए मुस्कुरा रही थी।
सच ही कहा गया है—
“रिश्ते जब स्वार्थ से चलाए जाएँ, तो एक दिन टूट जाते हैं…
लेकिन जब फर्ज और सम्मान से निभाए जाएँ, तो वही रिश्ते घर को स्वर्ग बना देते हैं…”

Post a Comment