एक अधूरी माँ का प्यार

Elderly Indian woman comforting a teenage girl in a residential society park while family members stand nearby with emotional expressions.


“कई बार हमें लगता है कि कुछ लोग बिना वजह हमारी जिंदगी में दखल देते हैं। उनकी बातें हमें बुरी लगती हैं, उनकी रोक-टोक हमें अपनी आज़ादी पर हमला लगती है। लेकिन समय जब सच का पर्दा उठाता है, तब पता चलता है कि जिन लोगों को हम अपनी परेशानी समझ रहे थे, वही चुपचाप हमारी सबसे बड़ी सुरक्षा बनकर खड़े थे...”


हमारी सोसाइटी में रहने वाली निर्मला देवी को लगभग हर कोई जानता था।


सफेद बाल, साधारण सी साड़ी और चेहरे पर हमेशा गंभीर भाव।


लेकिन उनकी एक आदत थी, जिसकी वजह से बच्चे हों या बड़े, कोई उनसे ज्यादा घुलना-मिलना पसंद नहीं करता था।


उन्हें हर बात में टोकने की आदत थी।


> सोसाइटी में कोई बच्चा सीढ़ियों पर दौड़ता हुआ दिखाई दे जाता, तो निर्मला देवी तुरंत उसे प्यार से टोक देतीं।


"अरे बेटा, धीरे चलो... कहीं पैर फिसल गया तो चोट लग जाएगी।"


अगर कोई युवक तेज रफ्तार से बाइक चलाते हुए अंदर आता, तो वह बिना झिझक उसे भी समझा देतीं।


"बेटा, गाड़ी थोड़ा संभालकर चलाओ। यहाँ छोटे-छोटे बच्चे भी खेलते हैं।"


उनकी यही आदत कई लोगों को पसंद नहीं थी। जैसे ही वह वहाँ से जातीं, कुछ लोग आपस में फुसफुसाने लगते।


"पता नहीं क्यों हर बात में बोलना जरूरी समझती हैं।"


"ऐसा लगता है जैसे पूरी सोसाइटी की जिम्मेदारी इन्होंने अकेले ही उठा रखी हो।"


"अपना काम करें तो ज्यादा अच्छा रहे।"


मैं भी उस समय बाकी लोगों की तरह यही सोचती थी कि शायद निर्मला देवी को दूसरों के मामलों में जरूरत से ज्यादा दखल देने की आदत है।


एक दिन मेरी बेटी रिया स्कूल से लौटी तो बहुत उदास थी।


मैंने पूछा,


"क्या हुआ?"


वह बोली,


"कुछ नहीं।"


लेकिन मैं समझ गई कि जरूर कोई बात है।


बहुत पूछने पर उसने बताया कि उसकी सबसे अच्छी दोस्त अनुष्का कई दिनों से स्कूल नहीं आ रही।


अनुष्का उसी सोसाइटी में रहती थी।


उसके पिता बैंक में नौकरी करते थे और परिवार काफी अच्छा माना जाता था।


मुझे भी चिंता हुई।


अगले दिन पार्क में अनुष्का की माँ दिखाई दीं।


मैंने हालचाल पूछा।


उनके चेहरे पर बनावटी मुस्कान थी।


"बस थोड़ी तबीयत खराब है।"


इतना कहकर उन्होंने बात बदल दी।


लेकिन मुझे लगा कि बात कुछ और है।


कुछ दिनों बाद मैंने देखा कि अनुष्का बालकनी में खड़ी थी।


पहले की तरह चंचल नहीं लग रही थी।


चेहरा बुझा-बुझा सा था।


उसी समय नीचे से गुजरती निर्मला देवी ने उसे देखा।


उन्होंने ऊपर देखकर आवाज लगाई,


"बेटा, कैसी हो?"


अनुष्का ने हल्की सी मुस्कान दी और अंदर चली गई।


उसकी आँखों में एक अजीब सी उदासी थी।


समय बीतता गया।


एक दिन सोसाइटी में अचानक हंगामा मच गया।


अनुष्का के घर के बाहर भीड़ जमा थी।


मैं भी दौड़कर वहाँ पहुँची।


पता चला कि अनुष्का घर से गायब थी।


उसके माता-पिता रो रहे थे।


सब लोग अलग-अलग बातें कर रहे थे।


"कहीं दोस्तों के साथ चली गई होगी।"


"आजकल के बच्चे किसी की सुनते कहाँ हैं।"


"फोन चेक किया क्या?"


पूरा माहौल तनाव से भरा हुआ था।


तभी निर्मला देवी भी वहाँ आ गईं।


उन्होंने सबकी बातें सुनीं और सीधे अनुष्का की माँ से पूछा,


"क्या पिछले कुछ दिनों से वह ज्यादा चुप रहने लगी थी?"


महिला ने सिर हिला दिया।


"क्या वह कमरे में अकेले ज्यादा रहती थी?"


"हाँ।"


"क्या उसने खाना कम कर दिया था?"


"हाँ।"


निर्मला देवी कुछ पल चुप रहीं।


फिर उन्होंने कहा,


"मुझे लगता है वह किसी बड़ी परेशानी में थी।"


सब लोग हैरानी से उन्हें देखने लगे।


अनुष्का के पिता बोले,


"आपको कैसे पता?"


निर्मला देवी ने धीमी आवाज में कहा,


"क्योंकि मैं पिछले कई दिनों से उसे देख रही थी। उसकी आँखों में वही दर्द था जो कई साल पहले मेरी बेटी की आँखों में था।"


पूरा माहौल एकदम शांत हो गया।


पहली बार किसी ने निर्मला देवी को अपनी निजी जिंदगी के बारे में बात करते सुना था।


उन्होंने काँपती आवाज में कहा,


"मेरी बेटी भी बहुत चुप रहने लगी थी। हम समझ नहीं पाए। हमें लगा कि यह उम्र का असर है। लेकिन वह अंदर ही अंदर अवसाद से जूझ रही थी। एक दिन उसने हार मान ली।"


उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।


"उस दिन के बाद से मैं हर बच्चे पर नजर रखती हूँ। लोग समझते हैं कि मैं दखल देती हूँ। लेकिन सच यह है कि मैं नहीं चाहती कि किसी और माँ की गोद मेरी तरह सूनी हो जाए।"


यह सुनकर वहाँ मौजूद लोगों की आँखें नम हो गईं।


तभी एक युवक दौड़ता हुआ आया।


वह सोसाइटी के गेट पर काम करने वाले गार्ड का बेटा था।


उसने बताया,


"मैंने अनुष्का को बस स्टैंड पर देखा था। वह अकेली बैठी रो रही थी।"


तुरंत उसके पिता और कुछ लोग वहाँ पहुँचे।


करीब एक घंटे बाद वे अनुष्का को लेकर लौटे।


जैसे ही उसकी माँ ने उसे देखा, वह दौड़कर उससे लिपट गई।


दोनों फूट-फूटकर रोने लगे।


काफी देर बाद जब माहौल थोड़ा शांत हुआ तो अनुष्का ने जो बताया, उसे सुनकर सबके पैरों तले जमीन खिसक गई।


स्कूल के कुछ बच्चे कई महीनों से उसे ऑनलाइन परेशान कर रहे थे।


उसकी तस्वीरों को एडिट करके सोशल मीडिया पर डाल रहे थे।


उसे धमकियाँ दे रहे थे।


वह डर के कारण किसी को कुछ नहीं बता पाई।


धीरे-धीरे वह अंदर से टूटती चली गई।


उसे लगने लगा कि उसकी वजह से परिवार बदनाम हो जाएगा।


इसलिए वह घर छोड़कर चली गई थी।


उसकी माँ जोर-जोर से रोने लगीं।


"बेटा, तूने हमें बताया क्यों नहीं?"


अनुष्का भी रोते हुए बोली,


"मुझे लगा आप लोग परेशान हो जाएंगे।"


तभी निर्मला देवी उसके पास गईं।


उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखा।


"बेटा, परेशानी बाँटने से छोटी होती है। अकेले सहने से बड़ी।"


अनुष्का ने पहली बार किसी बच्चे की तरह उनके गले लगकर रोना शुरू कर दिया।


उस दिन के बाद सोसाइटी में बहुत कुछ बदल गया।


लोगों ने पहली बार समझा कि निर्मला देवी की रोक-टोक के पीछे जिज्ञासा नहीं, बल्कि एक अधूरी माँ का दर्द था।


वह हर बच्चे में अपनी खोई हुई बेटी को देखती थीं।


जो लोग उनका मजाक उड़ाते थे, अब उन्हें सम्मान से देखने लगे।


कुछ महीनों बाद अनुष्का फिर से सामान्य जीवन में लौटने लगी।


वह स्कूल जाने लगी।


उसके चेहरे पर मुस्कान वापस आने लगी।


एक दिन मैं पार्क में बैठी थी।


अनुष्का बच्चों के साथ हँसते हुए खेल रही थी।


पास ही निर्मला देवी बेंच पर बैठी थीं।


उनकी आँखों में संतोष साफ दिखाई दे रहा था।


मैं उनके पास जाकर बैठ गई।


"आपने उस दिन अनुष्का को बचा लिया।"


वह हल्का सा मुस्कुराईं।


"नहीं बेटी, मैंने नहीं। उसे उसके परिवार के प्यार ने बचाया। मैंने तो बस समय रहते दर्द पहचान लिया।"


मैं कुछ पल चुप रही।


फिर बोली,


"लोग आपको गलत समझते रहे और आपने कभी सफाई भी नहीं दी।"


उन्होंने आसमान की तरफ देखते हुए कहा,


"हर बात की सफाई देना जरूरी नहीं होता। अगर किसी की भलाई हो रही हो, तो लोगों की गलतफहमी भी कभी-कभी छोटी कीमत होती है।"


उनकी बात सुनकर मैं सोच में पड़ गई।


उस दिन मुझे एहसास हुआ कि हर सख्त दिखने वाला इंसान कठोर नहीं होता।


कुछ लोग अपने पुराने घावों के कारण दूसरों को बचाने की कोशिश करते हैं।


और कई बार जिन लोगों को हम सबसे ज्यादा गलत समझते हैं, वही चुपचाप सबसे ज्यादा अच्छा काम कर रहे होते हैं।


क्योंकि सच्ची इंसानियत वही है, जो बिना किसी स्वार्थ के किसी टूटते हुए इंसान को संभाल ले और उसे फिर से जीने की उम्मीद दे दे।


क्या आपने भी कभी किसी ऐसे व्यक्ति को देखा है, जिसे लोग गलत समझते थे, लेकिन बाद में उसकी अच्छाई और त्याग का सच सबके सामने आया? अपने विचार और अनुभव जरूर साझा करें।



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