माँ का प्यार और बेटी का स्वार्थ

 

A Mother’s Love, A Daughter’s Regret


“कई बार इंसान यह सोचकर निश्चिंत हो जाता है कि जिन रिश्तों ने उसे बचपन से प्यार दिया है, वे हमेशा उसी तरह उसके साथ खड़े रहेंगे। लेकिन जब जिम्मेदारियाँ बढ़ती हैं, तब रिश्तों की असली परीक्षा शुरू होती है। उस समय पता चलता है कि हम अपनों को प्यार से याद करते हैं या सिर्फ अपनी जरूरत पड़ने पर...”


संगीता अपने कमरे में बैठी गुस्से से फोन पर बात कर रही थी।


“भाभी, सच बताऊँ तो मुझे अब समझ नहीं आता कि मां को मेरी कोई परवाह है भी या नहीं।”


दूसरी तरफ उसकी भाभी कविता थी।


कविता ने हैरानी से पूछा, “क्या हुआ दीदी? आप इतनी नाराज़ क्यों लग रही हैं?”


संगीता बोली, “क्या बताऊँ। जब भी मुझे उनकी जरूरत होती है, कोई न कोई बहाना बन जाता है। लेकिन तुम्हें जरा सी परेशानी हो जाए तो मां तुरंत तुम्हारे पास खड़ी मिलती हैं।”


कविता मुस्कुराई।


“दीदी, ऐसा नहीं है। मां जी अब पहले जैसी नहीं रहीं। उम्र हो गई है। घुटनों में दर्द रहता है। अब हम लोग ही कोशिश करते हैं कि उन्हें आराम मिले।”


“वाह भाभी!” संगीता व्यंग्य से बोली, “जब काम करवाना था तब उम्र नहीं दिखी और अब जब मुझे जरूरत है तो अचानक मां बूढ़ी हो गईं?”


कविता चुप हो गई।


तभी उसका पति और संगीता का छोटा भाई रोहित कमरे में आया।


“किससे बात कर रही हो?”


“दीदी हैं,” कविता ने फोन रोहित को दे दिया।


रोहित हंसते हुए बोला, “क्या बात है दीदी? आज तो बहुत गुस्से में लग रही हो।”


संगीता बोली, “गुस्सा न करूं तो क्या करूं? तुम्हारी मां को मेरी कोई चिंता नहीं है।”


रोहित बोला, “अरे, आप तो उनकी सबसे प्यारी बेटी हो।”


“बस रहने दो,” संगीता बोली, “अगर मैं इतनी प्यारी हूं तो कुछ दिन मेरे पास आकर नहीं रह सकतीं?”


रोहित ने धीरे से पूछा, “आखिर बात क्या है?”


संगीता ने लंबी सांस ली।


“मुझे दो महीने के लिए कंपनी की ट्रेनिंग पर जाना है। रिया अब चौदह साल की हो गई है। उसे अकेला छोड़कर नहीं जा सकती। अगर मां मेरे पास आ जाएं तो मेरी परेशानी हल हो जाएगी।”


रोहित ने कहा, “ठीक है दीदी, मां से बात कर लेते हैं।”


उस शाम मां शारदा देवी ने बेटी की बात सुनी।


उन्होंने बेटे-बहू की तरफ देखा।


कविता तुरंत बोली,


“मां जी, अगर दीदी को आपकी जरूरत है तो जरूर जाइए। यहां की चिंता मत कीजिए।”


शारदा देवी बेटी की परेशानी समझ गईं।


कुछ दिनों बाद वे बेटी के शहर चली गईं।



शुरुआत के कुछ दिन अच्छे बीते।


शारदा देवी ने सोचा कि बेटी सच में बहुत परेशान होगी।


लेकिन धीरे-धीरे उन्हें सच्चाई समझ आने लगी।


संगीता सुबह घर से निकल जाती।


रात को देर से लौटती।


रिया स्कूल से आती और सीधे अपने कमरे में बंद हो जाती।


उसके हाथ से मोबाइल छूटता ही नहीं था।


एक दिन शारदा देवी ने प्यार से कहा,


“बेटा, थोड़ा बाहर खेल लिया करो। हर समय फोन अच्छी बात नहीं है।”


रिया तुरंत बोली,


“नानी, प्लीज मुझे मत समझाइए। ये पुरानी बातें अब कोई नहीं मानता।”


शारदा देवी चुप हो गईं।


उन्होंने सोचा बच्ची है।


लेकिन अगले दिनों में रिया का व्यवहार और खराब होता गया।


रिया का व्यवहार दिन-ब-दिन बदलता जा रहा था। वह घर के नौकरों से भी ठीक से बात नहीं करती थी। छोटी-छोटी बातों पर उन पर चिल्लाने लगती और किसी की भावनाओं की परवाह नहीं करती थी।


घर में तरह-तरह का अच्छा खाना बनता, लेकिन उसे उसमें कोई रुचि नहीं थी। वह लगभग हर दिन बाहर से खाना मंगवाती और वही खाना पसंद करती थी। शारदा देवी जब उसे समझातीं कि रोज़ बाहर का खाना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है, तो वह उनकी बात को अनसुना कर देती।


सबसे दुख की बात यह थी कि रिया किसी की सलाह सुनना ही नहीं चाहती थी। उसे लगता था कि वही हमेशा सही है।


एक दिन शारदा देवी ने प्यार से उसे समझाते हुए कहा,


“बेटा, मोबाइल और बाहर के खाने की भी एक सीमा होनी चाहिए। अपनी सेहत का भी ध्यान रखा करो।”


रिया तुरंत नाराज़ होकर बोली,


“नानी, आप ये सब बातें नहीं समझेंगी। आपका ज़माना अलग था। आज की दुनिया अलग है। आप बस मुझे मेरी तरह रहने दीजिए।”


यह सुनकर शारदा देवी चुप हो गईं। उन्होंने कभी अपने बच्चों को इस तरह बड़ों से बात करते नहीं देखा था। फिर भी उन्होंने सोचा कि शायद उम्र का असर है और समय के साथ रिया समझदार हो जाएगी।


उसी शाम संगीता ऑफिस से घर लौटी।


शारदा देवी ने कहा,


“बेटा, रिया अब बड़ी हो रही है। इस उम्र में उसे सिर्फ सुविधाओं की नहीं, बल्कि अपनी मां के समय और साथ की भी जरूरत होती है। थोड़ा वक्त उसके साथ बिताया करो।”


शारदा देवी ने प्यार से समझाते हुए कहा।


संगीता ने थके हुए स्वर में जवाब दिया,


“मां, आप जानती हैं कि मैं नौकरी करती हूं। घर और ऑफिस की जिम्मेदारियों के बीच मुझे अपने लिए भी मुश्किल से समय मिलता है। हर समय मैं उसके साथ नहीं रह सकती।”


शारदा देवी ने फिर समझाने की कोशिश की।


“मैं ये नहीं कह रही कि तुम हर वक्त उसके पास बैठो, लेकिन दिन में थोड़ा समय उसके लिए निकालोगी तो उसे अच्छा लगेगा। बच्चे कब बड़े हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता।”


संगीता ने हल्की नाराज़गी के साथ कहा,


“मां, आप आते ही उसकी शिकायतें लेकर बैठ जाती हैं। आजकल के बच्चों को संभालने का तरीका अलग होता है। और फिर, आपको यहां मैंने इसलिए बुलाया था ताकि मेरी कुछ जिम्मेदारियां हल्की हो सकें। अगर हर बात मुझे ही संभालनी है, तो फिर आपके आने से मुझे क्या सहारा मिला?”


शारदा देवी यह सुनकर चुप हो गईं। उन्हें महसूस हुआ कि बेटी उनकी बात समझने के बजाय उसे शिकायत समझ रही है। उनके मन में दर्द तो हुआ, लेकिन उन्होंने आगे कुछ नहीं कहा।


उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि बेटी उन्हें मां नहीं, एक जिम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति की तरह देख रही है।



समय बीतता गया।


एक महीने की बात दो महीने में बदल गई।


फिर तीन महीने हो गए।


शारदा देवी अपने घर को याद करने लगीं।


उन्हें अपने पोते आरव और परी की याद आती।


बहू कविता की याद आती जो हर दिन उनका हाल पूछती थी।


एक दिन कविता का फोन आया।


“मां जी, कैसी हैं?”


बस इतना सुनते ही शारदा देवी की आंखें भर आईं।


उन्होंने कहा,


“बहू, अब घर आने का मन कर रहा है।”


कविता सब समझ गई।


उसने उसी दिन रोहित को भेज दिया।



रोहित जब बहन के घर पहुंचा तो हैरान रह गया।


रिया नानी से ऐसे बात कर रही थी जैसे किसी नौकर से बात कर रही हो।


और संगीता यह सब देखकर भी कुछ नहीं कह रही थी।


रोहित ने उसी शाम मां को वापस ले जाने का फैसला कर लिया।


घर लौटते समय शारदा देवी पूरे रास्ते चुप रहीं।


उनकी आंखों में दर्द साफ दिखाई दे रहा था।



घर आने के बाद उनकी तबीयत धीरे-धीरे बिगड़ने लगी।


डॉक्टर ने बताया कि दिल कमजोर हो गया है।


उम्र भी काफी हो चुकी है।


अब उन्हें ज्यादा देखभाल की जरूरत थी।


कविता दिन-रात उनकी सेवा करती।


रोहित भी हर संभव कोशिश करता।


लेकिन बीमारी बढ़ती जा रही थी।


एक दिन रोहित ने बहन को फोन किया।


“दीदी, मां की हालत ठीक नहीं है। अगर कुछ दिन के लिए आ जाओ तो अच्छा रहेगा।”


संगीता ने कुछ क्षण चुप रहकर कहा,


“रोहित, मैं समझती हूँ कि माँ की तबीयत ठीक नहीं है, लेकिन इस समय मेरे लिए आ पाना बहुत मुश्किल है। ऑफिस में एक बड़ा प्रोजेक्ट चल रहा है और मुझे छुट्टी भी नहीं मिल सकती। अगर मैं अभी चली गई, तो मेरी नौकरी पर भी असर पड़ सकता है।”


रोहित की आवाज़ भर्रा गई।


“दीदी, नौकरी फिर भी संभल जाएगी, लेकिन माँ बार-बार आपका नाम ले रही हैं। उन्हें बस एक बार आपसे मिलना है।”


संगीता ने लापरवाही से जवाब दिया,


“तुम मेरी वीडियो कॉल करवा देना। मैं उनसे बात कर लूँगी। अभी मेरे लिए सब कुछ छोड़कर आना संभव नहीं है।”


कुछ पल के लिए दूसरी तरफ खामोशी छा गई।


रोहित को उम्मीद थी कि शायद बहन का दिल पिघल जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।


उसने भारी मन से कहा,


“ठीक है दीदी, जैसा आपको सही लगे।”


फोन कट गया।


रोहित देर तक मोबाइल को देखता रहा। उसकी आँखें नम हो चुकी थीं। उसे पहली बार महसूस हुआ कि जिस माँ ने अपने बच्चों के लिए पूरी ज़िंदगी समर्पित कर दी, आज उसी माँ के लिए कुछ पल निकालना भी उनकी बेटी को भारी लग रहा था। फिर भी उसने अपने मन का दर्द किसी से नहीं कहा और चुपचाप माँ के कमरे की ओर बढ़ गया।



करीब पंद्रह दिन बाद डॉक्टर ने साफ कह दिया कि अब ज्यादा उम्मीद नहीं है।


उस रात शारदा देवी ने बेटे और बहू को अपने पास बुलाया।


उन्होंने कविता का हाथ पकड़ लिया।


“बहू, तुमने बेटी से बढ़कर सेवा की है।”


कविता रोने लगी।


फिर उन्होंने बेटे की तरफ देखा।


“बेटा, मेरा एक वादा करो।”


“क्या मां?”


“अपने दिल में किसी के लिए नफरत मत रखना।”


रोहित की आंखों से आंसू बहने लगे।



कुछ दिनों बाद शारदा देवी इस दुनिया को छोड़ गईं।


संगीता अंतिम समय में भी नहीं पहुंच सकी।


जब तक वह आई, सब कुछ खत्म हो चुका था।


घर में मां की तस्वीर लगी थी।


उस तस्वीर के सामने खड़ी होकर पहली बार संगीता फूट-फूटकर रोई।


लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।



समय आगे बढ़ गया।


रिया बड़ी हो गई।


अब वह कॉलेज जाने लगी थी।


धीरे-धीरे उसने भी मां की बात मानना बंद कर दिया।


एक दिन संगीता ने उसे किसी बात पर टोका।


रिया बोली,


“मम्मी, प्लीज मुझे हर बात पर रोकना-टोकना बंद कीजिए। यह मेरी जिंदगी है, मुझे कैसे जीना है, यह मैं खुद तय कर सकती हूँ।”


ये वही शब्द थे जो कभी उसने अपनी मां की बातों को नजरअंदाज करते समय कहे थे।


उस दिन संगीता देर तक अकेली बैठी रही।


उसे अपनी मां की हर बात याद आ रही थी।


उसे याद आया कि कैसे मां उसे समय देने को कहती थीं।


कैसे वह हमेशा काम और सुविधाओं को रिश्तों से ऊपर रखती रही।


और आज वही दूरी उसकी अपनी बेटी के साथ खड़ी थी।


उसकी आंखों से आंसू बह निकले।


अब उसे समझ आ चुका था—


“रिश्ते जरूरत पड़ने पर याद करने की चीज नहीं होते। रिश्तों को समय, सम्मान और अपनापन देना पड़ता है। क्योंकि जब अपने चले जाते हैं, तब पछतावा तो रह जाता है, लेकिन उन्हें वापस लाने का कोई रास्ता नहीं बचता।”



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