जब उसे लगा कि शायद इस घर में उसकी अहमियत नहीं रही...
सुबह के पाँच बजे थे।
अलार्म बजने से कुछ मिनट पहले ही कविता की आँख खुल गई। उसने धीरे से उठकर देखा कि उसके पति अमित और दोनों बच्चे अभी गहरी नींद में थे। बाहर हल्की ठंड थी और रसोई की खिड़की से आती हवा में सुबह की ताजगी घुली हुई थी।
कविता रोज़ की तरह अपने काम में लग गई।
सबसे पहले चाय बनाई।
फिर बच्चों के टिफिन तैयार किए।
पति के लिए नाश्ता बनाया।
सास-ससुर की दवाइयाँ समय पर रखीं।
पूजा के लिए दीपक जलाया।
घर की सफाई की।
कपड़े धोए।
और फिर सबको समय पर उनकी ज़रूरत की चीज़ें देकर मुस्कुराते हुए विदा किया।
यह उसकी रोज़ की दिनचर्या थी।
लेकिन उसने कभी इसे बोझ नहीं माना।
वह इस घर को अपना घर मान चुकी थी।
पति की कमाई सीमित थी, इसलिए वह हर खर्च सोच-समझकर करती।
कभी बेवजह कोई मांग नहीं रखती।
पुरानी साड़ी को नए तरीके से पहन लेती।
बच्चों की छोटी-छोटी खुशियों में अपनी खुशियाँ ढूंढ लेती।
पति के माता-पिता का सम्मान करती।
देवर-ननद को अपने भाई-बहनों जैसा मानती।
घर में कोई बीमार पड़ जाए तो रात भर जागकर सेवा करती।
लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसके मन में एक सवाल बार-बार उठने लगा था।
"क्या मैं सच में इस घर के लिए मायने रखती हूँ?"
उसे लगता था कि वह जो कुछ भी करती है, उसे अब सामान्य मान लिया गया है।
कोई यह नहीं कहता कि उसने अच्छा किया।
कोई यह नहीं कहता कि उसके बिना घर अधूरा है।
कई बार वह सोचती—
"अगर मैं एक दिन कुछ न करूँ, तो क्या किसी को फर्क पड़ेगा?"
धीरे-धीरे यह सोच उसके मन में घर करती चली गई।
वह पहले की तरह हँसती नहीं थी।
बात-बात पर मज़ाक करने वाली कविता अब सिर्फ ज़रूरत भर बोलती।
चेहरे पर मुस्कान रहती, लेकिन आँखों की चमक कहीं खो गई थी।
शुरुआत में किसी ने ध्यान नहीं दिया।
सबने सोचा कि शायद थक गई होगी।
लेकिन जब तीन दिन बीत गए और कविता की खामोशी बनी रही, तो घर का माहौल बदलने लगा।
बच्चों ने महसूस किया कि माँ अब पहले की तरह उनके साथ बैठकर बातें नहीं करती।
सास को लगा कि बहू की हँसी जैसे घर से गायब हो गई है।
ससुर कई बार उसकी तरफ देखते, लेकिन कुछ समझ नहीं पाते।
और अमित...
उसे सबसे ज़्यादा बेचैनी होने लगी।
उस शाम अमित दफ्तर से लौटा तो उसने देखा कि कविता बालकनी में चुपचाप बैठी आसमान देख रही है।
उसने पास जाकर पूछा,
"कविता... सब ठीक है ना?"
कविता ने बिना उसकी तरफ देखे कहा,
"हाँ... सब ठीक है।"
अमित ने धीरे से कहा,
"अगर सब ठीक है तो तुम इतनी चुप क्यों हो गई हो?"
कविता ने जवाब नहीं दिया।
कुछ देर बाद अमित फिर बोला,
"तुम्हें पता है, पहले जब मैं घर आता था तो तुम्हारी आवाज़ सबसे पहले सुनाई देती थी। बच्चों की शिकायतें, तुम्हारी हँसी, तुम्हारी बातें... सब कुछ।
अब घर में सब कुछ है... लेकिन पता नहीं क्या नहीं है।"
इतने में सास भी वहाँ आ गईं।
उन्होंने प्यार से कविता के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
"बहू, कई दिनों से देख रही हूँ, तू खोई-खोई रहती है। कोई बात है क्या?"
कविता ने मुस्कुराने की कोशिश की।
"नहीं माँजी... ऐसी कोई बात नहीं।"
ससुर भी पास आकर बैठ गए।
उन्होंने कहा,
"बेटी, इंसान जब अपने मन की बात दबाकर रखता है ना, तो वह बाहर से ठीक दिखता है लेकिन अंदर से टूटने लगता है।
अगर कोई परेशानी है, तो हमें बता। हम अपने हैं।"
इतने में देवर रोहन और ननद नेहा भी आ गए।
नेहा बोली,
"भाभी, आपने मुझसे भी बातें करना कम कर दिया है। क्या मैंने कुछ गलत कहा?"
रोहन ने हँसते हुए कहा,
"अगर मायके जाने का मन है तो बता दीजिए। टिकट अभी करवा देता हूँ। लेकिन पहले आप पहले वाली भाभी बन जाइए। घर सूना-सूना लग रहा है।"
सबकी बातें सुनकर कविता की आँखें भर आईं।
काफी देर तक वह चुप रही।
फिर धीमी आवाज़ में बोली,
"मैं बस... एक बात सोच रही थी।"
सब उसकी तरफ देखने लगे।
कविता ने काँपती आवाज़ में कहा,
"मुझे लगने लगा था कि शायद मेरी कोई खास अहमियत नहीं है।
मैं जो करती हूँ, वह सब बस मेरा फर्ज समझ लिया गया है।
कभी-कभी मन करता था कि कोई कहे कि मैं भी इस घर के लिए जरूरी हूँ...
कि मेरे होने से फर्क पड़ता है।"
यह सुनकर कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
अमित ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में पश्चाताप था।
वह बोला,
"कविता, शायद गलती हमारी है।
हमने यह मान लिया कि तुम्हें पता होगा कि तुम हमारे लिए कितनी जरूरी हो।
लेकिन हर इंसान को यह सुनने का अधिकार है कि वह कितना खास है।
तुम सिर्फ इस घर का काम करने वाली नहीं हो।
तुम इस घर की धड़कन हो।
तुम्हारे बिना यह घर सिर्फ दीवारों का मकान रह जाएगा।"
सास की आँखों से आँसू निकल आए।
उन्होंने कहा,
"जब तू दो दिन मायके गई थी ना, तब मुझे समझ आया था कि घर संभालना कितना मुश्किल है।
लेकिन शायद मैंने कभी तुझे यह कहा नहीं।
तू बहू नहीं, मेरी बेटी है।"
ससुर बोले,
"बेटी, सम्मान सिर्फ मन में रखना काफी नहीं होता।
उसे जताना भी चाहिए।
आज से हम यह गलती नहीं करेंगे।"
नेहा ने तुरंत कविता को गले लगा लिया।
"भाभी, आप मेरी दूसरी माँ जैसी हैं। मेरी हर परेशानी सबसे पहले आप ही समझती हैं।"
रोहन बोला,
"और मेरी सबसे बड़ी साथी भी आप ही हैं।"
इतने में दोनों बच्चे भी दौड़कर आ गए।
बेटी ने मासूमियत से पूछा,
"मम्मा, आप उदास थीं क्या?"
कविता ने उसे सीने से लगा लिया।
बेटा बोला,
"मम्मा, जब आप हँसती नहीं हो ना, तो हमारा घर अच्छा नहीं लगता।"
बस...
इतना सुनना था कि कविता की बरसों से जमा हुई नमी आँसुओं में बह निकली।
उसने पहली बार महसूस किया कि प्यार हमेशा बड़े शब्दों में नहीं मिलता।
कई बार वह सुबह की बनी हुई चाय में छुपा होता है।
किसी की चिंता भरी नज़र में होता है।
किसी के इंतज़ार में होता है।
किसी बच्चे के मासूम सवाल में होता है।
और कभी-कभी...
उसे पहचानने के लिए बस मन के भ्रम का पर्दा हटाना पड़ता है।
उस रात अमित ने मुस्कुराते हुए कहा,
"कल रविवार है।
कोई काम नहीं होगा।
नाश्ता मैं बनाऊँगा।
बच्चे सफाई करेंगे।
माँ-पिताजी बच्चों को कहानी सुनाएँगे।
और तुम... बस आराम करोगी।"
कविता हँस पड़ी।
"तुम लोगों से नाश्ता बन गया, तो मैं मान जाऊँगी।"
रोहन बोला,
"भाभी, अगर नाश्ता खराब हुआ तो बाहर से मँगवा लेंगे।"
पूरा घर ठहाकों से गूँज उठा।
बहुत दिनों बाद कविता की हँसी पूरे घर में सुनाई दी।
उस दिन उसे एक बात समझ आ गई—
हर रिश्ते में प्यार होता है, लेकिन हर प्यार बोलकर जताया नहीं जाता।
और कभी-कभी, अपने मन के वहम हमें उन भावनाओं से दूर कर देते हैं जो हमारे बिल्कुल पास होती हैं।
उसने मन ही मन ठान लिया कि अब वह अपनी भावनाएँ दबाकर नहीं रखेगी।
क्योंकि रिश्ते सिर्फ जिम्मेदारियों से नहीं चलते...
वे बातचीत, अपनापन और एक-दूसरे को यह एहसास दिलाने से मजबूत होते हैं कि—
"तुम हो... इसलिए यह घर घर है।"
और सच तो यही है...
किसी इंसान की अहमियत उसके चले जाने के बाद नहीं समझनी चाहिए।
समय रहते उसे यह बता देना चाहिए कि वह हमारे जीवन में कितनी महत्वपूर्ण जगह रखता है।
क्योंकि एक सच्चे दिल से कहा गया छोटा सा वाक्य—
"तुम हमारे लिए बहुत मायने रखते हो..."
कई टूटते हुए मनों को फिर से जीने की वजह दे सकता है।

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