बेटी का हक, बहू का अपराध क्यों?
"जिस दिन नंदिता ने अपनी सास से कहा— 'मम्मी जी, अगर बेटी का मायका उसका हक है, तो बहू का मायका उसकी गलती क्यों बन जाता है?' उस दिन पूरे घर में ऐसा सन्नाटा छा गया कि किसी के पास कोई जवाब नहीं था।"
नंदिता की शादी को सात साल हो चुके थे।
वह एक संयुक्त परिवार में रहती थी। पति रोहन, सास-ससुर और पाँच साल की बेटी पाखी के साथ उसका जीवन बाहर से देखने पर बिल्कुल सामान्य लगता था।
पाखी घर की सबसे छोटी सदस्य थी, इसलिए सबकी लाडली भी थी।
दादा की आँखों का तारा...
दादी की जान...
और नाना-नानी की दुनिया।
नंदिता का मायका दूसरे शहर में था। उसके माता-पिता उम्रदराज़ हो चुके थे। माँ को घुटनों में दर्द रहता था और पिता का स्वास्थ्य भी पहले जैसा नहीं रहा था।
वे हर बार फोन पर कहते, "बेटा, जब समय मिले तो पाखी को लेकर कुछ दिन के लिए आ जाया कर। घर में रौनक हो जाती है।"
नंदिता भी जाना चाहती थी।
लेकिन जैसे ही वह मायके जाने की बात करती, उसकी सास सावित्री जी का चेहरा बदल जाता।
"इतनी दूर जाने की क्या ज़रूरत है?"
"इतने छोटे बच्चे को लेकर सफर करोगी?"
"वहाँ इसकी दिनचर्या बिगड़ जाएगी।"
"बेटी, मायका कोई भागा नहीं जा रहा। बाद में चली जाना।"
हर बार नंदिता चुप हो जाती।
कभी एक महीना टलता...
कभी दो महीने...
और देखते-देखते पूरा साल निकल जाता।
आख़िर एक दिन उसने हिम्मत करके कहा, "मम्मी जी, इस बार मैं मम्मी-पापा के पास कुछ दिन रहना चाहती हूँ।"
बहुत समझाने-बुझाने के बाद अनुमति मिली।
लेकिन असली परेशानी तो उसके बाद शुरू हुई।
सुबह फोन आता।
"पाखी उठ गई क्या?"
थोड़ी देर बाद फिर फोन।
"उसे दूध पिला दिया?"
दोपहर में फोन।
"बाहर मत निकलना, धूप बहुत है।"
शाम को फोन।
"मुझे वीडियो कॉल पर पाखी को दिखाओ।"
रात को फोन।
"उसे खाँसी तो नहीं हुई? मुझे बहुत चिंता हो रही है।"
शुरू में नंदिता ने इसे प्यार समझा।
फिर उसे लगा कि यह चिंता नहीं, निगरानी है।
वह मायके में रहकर भी चैन से बैठ नहीं पाती थी।
माँ से बातें अधूरी रह जातीं।
पिता के साथ चाय पीने का समय भी फोन की घंटी में टूट जाता।
दस दिन रुकने का सोचकर गई नंदिता चार दिन बाद ही लौट आई।
माँ ने मुस्कुराकर पूछा, "इतनी जल्दी जा रही है बेटा?"
नंदिता ने मुस्कुराने की कोशिश की।
"बस माँ... घर का भी ध्यान रखना होता है।"
लेकिन माँ उसकी आँखों की नमी पढ़ चुकी थीं।
कुछ महीनों बाद सावित्री जी की बेटी रीमा अपने बेटे के साथ मायके आई।
घर में जैसे त्योहार का माहौल हो गया।
सावित्री जी खुशी से खिल उठीं।
"रीमा, इस बार कम से कम एक महीना रुकेगी।"
"आराम कर।"
"ससुराल की चिंता मत कर।"
"बच्चे को भी यहाँ कितना अच्छा लगेगा।"
नंदिता चुपचाप सब सुन रही थी।
उसके मन में कोई जलन नहीं थी।
बस एक सवाल था।
क्या बेटी का मायका हक होता है और बहू का मायका एहसान?
उसने कुछ नहीं कहा।
लेकिन अगले दिन एक घटना ने उसे बोलने पर मजबूर कर दिया।
रीमा अपने बेटे को गोद से उतारकर आँगन में उसके साथ खेल रही थी। नन्हा बच्चा खिलखिलाते हुए मिट्टी में हाथ डाल-दालकर छोटे-छोटे घर बनाने की कोशिश कर रहा था।
उसे देखकर सावित्री जी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्होंने प्यार से कहा, "अरे, बच्चे हैं... खेलने दो। ऐसे ही तो बड़े होते हैं। हर बात पर इतना डरोगे, तो उनका बचपन कैसे जी पाएगा?"
नंदिता ने शांत स्वर में उनकी ओर देखते हुए कहा, "मम्मी जी, कहीं इसे इंफेक्शन न हो जाए?"
सावित्री जी ने सहज भाव से जवाब दिया, "अरे नहीं, इतनी चिंता मत करो। थोड़ा-बहुत तो चलता है।"
नंदिता कुछ पल चुप रही, फिर बोली, "लेकिन अगर इसे बुखार आ गया तो?"
"या फिर इसकी तबीयत खराब हो गई तो?"
इसके बाद उसने सावित्री जी की आँखों में देखते हुए धीमे, लेकिन अर्थपूर्ण स्वर में कहा,
"वैसे भी... इतने छोटे बच्चे को लेकर मायके आना शायद ठीक नहीं होता। आखिर बच्चे की देखभाल में ज़रा-सी लापरवाही भी भारी पड़ सकती है, है न मम्मी जी?"
नंदिता की बात सुनते ही सावित्री जी का चेहरा बदल गया। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि बहू आज वही शब्द उन्हें लौटा रही थी, जो बरसों से वह उसे सुनाती आई थीं।
रीमा ने हैरानी से नंदिता की ओर देखा।
सावित्री जी का चेहरा उतर गया।
"बहू, ये कैसी बातें कर रही हो?" सावित्री जी ने नाराज़ होकर कहा। "बच्चा अपनी नानी के घर आया है। यहाँ उसके खाने-पीने से लेकर उसकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का पूरा ध्यान रखा जाएगा। हमें भी अपने नाती की उतनी ही चिंता है।"
नंदिता ने उनकी आँखों में देखते हुए शांत लेकिन दृढ़ स्वर में पूछा—
"अच्छा मम्मी जी... अगर नानी का घर बच्चे के लिए इतना सुरक्षित है और नानी उस पर अपनी जान छिड़क सकती है, तो क्या मेरी मम्मी अपनी नातिन का ख्याल नहीं रख सकतीं?"
"क्या उन्हें अपनी नातिन से प्यार नहीं है?"
"अगर आपकी बेटी का बच्चा अपने नाना-नानी के घर पूरी तरह सुरक्षित है, तो मेरी बेटी अपने नाना-नानी के घर असुरक्षित कैसे हो जाती है?"
नंदिता के इन सवालों के बाद कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
सावित्री जी के होंठ हिले, लेकिन इस बार उनके पास कोई जवाब नहीं था।
नंदिता की आवाज़ काँप रही थी।
लेकिन इस बार वह रुकी नहीं।
"जब रीमा दीदी अपने बच्चे के साथ मायके आती हैं, तब आप कहती हैं कि बच्चे कहीं भी पल जाते हैं।"
"लेकिन जब मैं अपनी बेटी को लेकर मायके जाना चाहती हूँ, तब आपको हर खतरा दिखाई देने लगता है।"
"क्या मेरी माँ का प्यार कम है?"
"क्या मेरी बेटी सिर्फ आपकी पोती है, मेरी माँ की नातिन नहीं?"
कमरे में खामोशी फैल गई।
रीमा भी सिर झुकाकर बैठ गई।
नंदिता की आँखों से आँसू बह निकले।
"मम्मी जी, मैंने कभी आपसे अपने मायके का हक नहीं छीना।"
"मैंने हमेशा इस घर को अपना घर माना।"
"लेकिन क्या बहू बनने के बाद एक लड़की बेटी होना छोड़ देती है?"
सावित्री जी की आँखें भर आईं।
उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि उन्होंने चिंता के नाम पर नंदिता के हिस्से की खुशियाँ कम कर दी थीं।
उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
"बहू... शायद मैं गलत थी।"
"मुझे लगता था कि मैं पोती के लिए चिंता करती हूँ।"
"लेकिन मैंने कभी यह नहीं सोचा कि तेरे माँ-बाप भी अपनी बेटी और नातिन का इंतजार करते होंगे।"
नंदिता कुछ नहीं बोली।
सावित्री जी उसके पास आईं और उसका हाथ पकड़ लिया।
"मुझे माफ़ कर दे।"
"अब से तू जब चाहे मायके जाएगी।"
"और उतने दिन रुकेगी, जितने दिन तेरा मन करेगा।"
कुछ दिनों बाद नंदिता अपनी बेटी के साथ मायके गई।
इस बार किसी फोन की घंटी ने उसे परेशान नहीं किया।
शाम को सावित्री जी का सिर्फ एक संदेश आया—
"आराम से रहना बहू। पाखी को मेरी तरफ से प्यार देना... और अपने मम्मी-पापा के साथ खूब समय बिताना।"
संदेश पढ़कर नंदिता की आँखें नम हो गईं।
उसने महसूस किया कि रिश्ते तब नहीं टूटते जब कोई अपनी बात कहता है।
रिश्ते तब कमजोर होते हैं, जब एक इंसान की भावनाओं को बार-बार अनदेखा किया जाता है।
क्योंकि बेटी हो या बहू...
मायका सिर्फ एक घर नहीं होता।
वह वह जगह होती है जहाँ लड़की बिना किसी भूमिका के सिर्फ "बेटी" बनकर जी पाती है।
और हर बेटी को यह अधिकार मिलना चाहिए...
चाहे वह किसी की बेटी हो या किसी की बहू।
आपकी क्या राय है? क्या शादी के बाद भी बहू को मायके में उतना ही अधिकार मिलना चाहिए जितना बेटी को? अपने विचार जरूर साझा करें।

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