जिम्मेदारियों का बंटवारा

 

Elderly Indian mother hands an old locker key to her emotional daughter-in-law as the family watches in shock inside a traditional village home.


"जिस दिन अम्मा जी ने तिजोरी की पुरानी चाबी नीलम की हथेली पर रखी, पूरे घर में ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे किसी ने वर्षों से चली आ रही परंपरा को एक ही पल में चुनौती दे दी हो।"


नीलम घबरा गई। उसने तुरंत चाबी वापस बढ़ाते हुए कहा, "अम्मा जी, यह आप क्या कर रही हैं? इसे अपने पास रखिए।"


बरामदे में बैठे बड़े बेटे महेश के हाथ से चाय का कप लगभग छूट गया। मँझले बेटे सुरेश ने चौंककर माँ की तरफ देखा। उनकी पत्नियाँ रेखा और कविता एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं।


अम्मा जी ने शांत स्वर में कहा, "रख ले बहू। आज नहीं समझेगा कोई, लेकिन एक दिन सब समझ जाएँगे।"


नीलम इस घर की सबसे छोटी बहू थी। उसका पति दीपक सबसे छोटा बेटा था और गाँव में ही रहकर खेती-बाड़ी संभालता था। बड़े दोनों बेटे शहर में नौकरी करते थे और साल में दो-तीन बार ही घर आते थे।


कुछ वर्ष पहले तक यह घर हँसी-खुशी से भरा रहता था। त्योहारों पर बच्चों की आवाज़ें गूँजती थीं। लेकिन समय के साथ सबकी अपनी-अपनी दुनिया बन गई।


महेश जब भी आता, मोबाइल और दफ़्तर की बातों में उलझा रहता।


"माँ, शहर की ज़िंदगी बहुत कठिन है," वह कहता, "छुट्टी मिलना आसान नहीं होता।"


सुरेश भी अपनी मजबूरियाँ गिना देता।


"बच्चों की पढ़ाई, बैंक की नौकरी, ज़िम्मेदारियाँ... सब कुछ अकेले संभालना पड़ता है।"


अम्मा जी हर बार मुस्कुरा देतीं।


"ठीक है बेटा, अपना ध्यान रखना।"


लेकिन फोन कटने के बाद बरामदे की खाली चारपाई बहुत देर तक उन्हें देखती रहती।


इसी बीच घर की सारी ज़िम्मेदारियाँ धीरे-धीरे नीलम के हिस्से में आ गईं।


ससुर जी की दवाइयाँ, खेत से आने वाले मज़दूरों का हिसाब, दूध वाले का भुगतान, अम्मा जी का ब्लड प्रेशर जाँचना, दीपक के साथ खेती की चिंता—वह बिना शिकायत सब करती रहती।


कई बार दीपक कहता, "थक जाती होगी?"


नीलम हँस देती।


"घर अपने लोगों का हो तो काम बोझ नहीं लगता।"


एक दिन अचानक ससुर जी की तबीयत इतनी बिगड़ गई


रात को तेज़ साँस फूलने लगी। दीपक उन्हें अस्पताल लेकर भागा। नीलम ने पीछे से कपड़े, रिपोर्ट और पैसे संभाले।


महेश को फोन किया गया।


"भैया, पिताजी की हालत ठीक नहीं है।"


उधर से जवाब आया, "मीटिंग में हूँ दीपक। टिकट देखता हूँ।"


सुरेश ने कहा, "कल तक पहुँचने की कोशिश करता हूँ।"


लेकिन अगले तीन दिन तक कोई नहीं आया।


अस्पताल के गलियारे में नीलम रात-रात भर बैठी रही। कभी ससुर जी के माथे पर कपड़ा रखती, कभी अम्मा जी को पानी पिलाती।


अम्मा जी कई बार उसे देखतीं और सोचतीं—


जिस लड़की को इस घर में दुल्हन बनाकर लाए थे, वह कब इस घर की बेटी बन गई, पता ही नहीं चला।


काफी इलाज के बाद ससुर जी घर लौट आए, लेकिन अब पहले जैसे नहीं रहे थे।


चलने में सहारा चाहिए होता।


खाना खिलाना पड़ता।


दवाइयों का समय याद रखना पड़ता।


एक दिन उन्होंने नीलम का हाथ पकड़कर कहा,


"बहू... तूने बेटों की कमी महसूस नहीं होने दी।"


नीलम की आँखें भर आईं।


"बाबूजी, ऐसा मत कहिए। सब अपने हैं।"


उन्होंने धीमे से कहा,


"अपने वही होते हैं जो कठिन समय में पास खड़े रहते हैं।"


कुछ महीनों बाद ससुर जी इस दुनिया से चले गए।


घर में शोक की लहर दौड़ गई।


तेरहवीं तक रिश्तेदारों का आना-जाना लगा रहा।


महेश और सुरेश परिवार सहित आ गए थे।


लोग दोनों बेटों की तरफ देखकर कहते,


"अब माँ का ध्यान रखना।"


दोनों सिर हिला देते।


लेकिन तेरहवीं के बाद जब लौटने की बात शुरू हुई तो चर्चा का विषय बदल गया।


रेखा ने धीरे से कहा,


"माँ अकेली कैसे रहेंगी? कोई व्यवस्था कर लेनी चाहिए।"


कविता बोली,


"और ज़मीन-जायदाद का भी कुछ निर्णय हो जाए तो आगे परेशानी नहीं होगी।"


महेश ने हामी भर दी।


"हाँ माँ, अभी सब साफ़-साफ़ तय कर दीजिए। बाद में बच्चों में विवाद अच्छा नहीं लगता।"


अम्मा जी सब सुनती रहीं।


उन्होंने उसी समय कोई जवाब नहीं दिया।


दो दिन बाद उन्होंने सबको बरामदे में बुलाया।


उनके सामने पुरानी फाइल रखी थी।


उन्होंने कहा,


"मैंने सोच-समझकर फैसला किया है।"


महेश और सुरेश उत्सुक हो गए।


अम्मा जी ने कागज़ खोल दिए।


मकान का अधिकार नीलम और दीपक के संयुक्त नाम पर था।


खेती की ज़मीन का बड़ा हिस्सा दीपक को दिया गया था, क्योंकि वर्षों से वही उसे संभाल रहा था।


कुछ ज़मीन महेश और सुरेश के नाम भी थी।


साथ ही बैंक की जमा राशि तीनों बेटों में बराबर बाँटी गई थी।


सबसे अलग एक शर्त भी लिखी थी—


"मेरे जीवनकाल में मेरी देखभाल की ज़िम्मेदारी तीनों बेटों की होगी। जो अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हटेगा, उसका हिस्सा वृद्धाश्रम और गाँव के विद्यालय को दान कर दिया जाएगा।"


महेश अवाक रह गया।


"माँ! यह कैसी शर्त है?"


सुरेश ने भी असंतोष जताया।


"क्या आपको हम पर भरोसा नहीं?"


अम्मा जी ने पहली बार कठोर स्वर में कहा,


"भरोसा शब्दों से नहीं, व्यवहार से बनता है।"


उन्होंने आगे कहा,


"मैंने कभी तुमसे धन नहीं माँगा। मुझे साथ चाहिए था। बीमारी में एक गिलास पानी देने वाला चाहिए था। त्योहार पर दो दिन बैठकर बातें करने वाला चाहिए था।"


बरामदे में सन्नाटा छा गया।


"दीपक और नीलम ने यह घर केवल संभाला नहीं, जिया है। इसलिए उन्हें ज़िम्मेदारी के अनुसार अधिकार मिला है। लेकिन मैं किसी से अन्याय नहीं कर रही। तुम्हारा हिस्सा भी रखा है, ताकि तुम्हें यह महसूस न हो कि माँ ने तुम्हें छोड़ा है।"


महेश की आँखें झुक गईं।


उसे याद आया कि पिछली बार माँ का जन्मदिन भी वह भूल गया था।


सुरेश को याद आया कि महीनों से उसने माँ से हालचाल तक नहीं पूछा था।


नीलम घबराकर बोली,


"अम्मा जी, मुझे इतना सब नहीं चाहिए। लोग क्या कहेंगे?"


अम्मा जी ने उसका हाथ थाम लिया।


"लोगों ने मेरी रातें नहीं देखीं बहू। उन्होंने तेरी सेवा भी नहीं देखी। इसलिए फैसला भी मैं ही करूँगी।"


रेखा और कविता की आँखों में भी नमी उतर आई।


शायद पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि रिश्ते केवल अधिकार माँगने से नहीं निभते।


उस रात महेश अम्मा जी के पास जाकर बैठा।


"माँ... हमसे गलती हुई क्या?"


अम्मा जी ने उसके सिर पर हाथ फेर दिया।


"गलती हर इंसान से होती है बेटा। लेकिन सबसे बड़ी गलती तब होती है जब इंसान उसे मानने से इनकार कर दे।"


सुरेश भी पास आ गया।


"क्या अब भी सब ठीक हो सकता है?"


अम्मा जी की आँखों में हल्की चमक लौट आई।


"रिश्ते मिट्टी की तरह होते हैं। सूख जाएँ तो पानी देना पड़ता है। टूट जाएँ तो मेहनत लगती है। लेकिन अगर मन से चाहो, तो फिर से आकार ले लेते हैं।"


कुछ दिनों बाद जब दोनों बेटे शहर लौटे, तो इस बार उन्होंने जाते-जाते सिर्फ माँ के पैर नहीं छुए।


उन्होंने यह वादा भी किया कि हर महीने कुछ दिन गाँव आकर माँ के साथ बिताएँगे।


बरामदे की वही पुरानी चारपाई अब पहले जैसी सूनी नहीं लगती थी।


नीलम आँगन में तुलसी को पानी दे रही थी। अम्मा जी पास बैठी पोते को खिलाती हुई मुस्कुरा रही थीं।


उन्होंने आसमान की तरफ देखा और मन ही मन कहा,


"घर दीवारों से नहीं टिकता। घर उन लोगों से टिकता है जो बिना हिसाब लगाए एक-दूसरे का हाथ थाम लेते हैं।"


और उन्हें यक़ीन हो गया था कि असली वारिस वह नहीं होता जो सबसे पहले अपना हिस्सा माँगे, बल्कि वह होता है जो सबसे पहले अपनी ज़िम्मेदारी निभाए।



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