चालीस साल बाद मिली दीदी

 

An emotional reunion between an elderly Indian brother and sister after forty years apart, embracing each other with tears in their eyes at the entrance of a traditional family home. Family members stand nearby watching the heartfelt moment, while a small temple with their parents' photographs glows softly in the background.


"माँ, उस बूढ़ी औरत को घर के अंदर मत आने देना... लोग क्या कहेंगे?"


यह सुनते ही रेखा के कदम दरवाज़े पर ही रुक गए।


उसके हाथ में पुराना कपड़े का थैला था, बालों में सफेदी उतर आई थी और पैरों में टूटी हुई चप्पलें थीं। चेहरे पर थकान थी, लेकिन आँखों में एक उम्मीद अब भी बाकी थी।


उसने धीरे से पूछा, "बेटा... क्या यही विजय का घर है?"


दरवाज़े पर खड़ी महिला, जो विजय की पत्नी पूजा थी, असमंजस में पड़ गई। उसने सामने खड़ी उस बूढ़ी औरत को ऊपर से नीचे तक देखा।


"जी... लेकिन आप कौन हैं?"


रेखा ने काँपते हाथों से अपने थैले से एक पुरानी तस्वीर निकाली।


तस्वीर में दो छोटे बच्चे थे।


एक आठ साल का लड़का, जिसके हाथ में पतंग थी।


और उसके बगल में एक बारह साल की लड़की, जिसने उसे पीछे से पकड़ रखा था।


रेखा की आँखें भर आईं।


"ये... मेरा छोटा भाई विजय है।"


पूजा चौंक गई।


"क्या कह रही हैं आप? विजय जी तो कहते हैं कि उनकी कोई बहन नहीं है।"


रेखा मुस्कुरा दी।


"उन्हें यही बताया गया था।"


इतने में अंदर से विजय बाहर आया।


साठ वर्ष का विजय, जो अभी-अभी दुकान से लौटा था, दरवाज़े पर खड़ी महिला को देखकर रुक गया।


"जी, कहिए?"


रेखा ने तस्वीर उसकी ओर बढ़ा दी।


"पहचानते हो?"


विजय ने तस्वीर हाथ में ली।


पहले उसने सामान्य नज़र से देखा।


फिर अचानक उसकी साँसें तेज हो गईं।


उसने तस्वीर को आँखों के बिल्कुल पास ले जाकर देखा।


पतंग...


फटी हुई आधी कमीज़...


और पीछे खड़ी लड़की के माथे का छोटा सा तिल...


उसके हाथ काँपने लगे।


"ये... ये फोटो तुम्हारे पास कैसे आई?"


रेखा के होंठ काँपे।


"क्योंकि उस लड़की का नाम रेखा था..."


"...और वो मैं हूँ।"


विजय के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


उसके हाथ से तस्वीर लगभग गिर ही गई।


"न... नहीं... मेरी दीदी तो..."


उसकी आवाज़ गले में अटक गई।


"...दीदी तो मेले में खो गई थीं।"


रेखा की आँखों से आँसू बह निकले।


"हाँ, खो गई थी। लेकिन मरी नहीं थी, विजय।"


पूरा घर सन्न रह गया।


पूजा ने अविश्वास से पति को देखा।


"ये क्या कह रही हैं?"


विजय दीवार का सहारा लेकर बैठ गया।


साल था 1978।


गाँव के पास लगने वाले बड़े मेले में विजय अपनी बड़ी बहन रेखा का हाथ पकड़े घूम रहा था।


रेखा बारह साल की थी और विजय आठ साल का।


दोनों ने गुब्बारे खरीदे थे।


जलेबी खाई थी।


और विजय ज़िद कर रहा था कि उसे लकड़ी वाली तलवार चाहिए।


तभी अचानक भगदड़ मच गई।


किसी ने चिल्लाकर कहा, "भागो... हाथी बेकाबू हो गया!"


लोग इधर-उधर भागने लगे।


रेखा ने विजय का हाथ कसकर पकड़ लिया।


लेकिन भीड़ बहुत तेज थी।


एक धक्का लगा।


फिर दूसरा।


और तीसरे धक्के के बाद विजय का हाथ छूट गया।


"विजय!"


"दीदी!"


दोनों चीखते रहे।


लेकिन शोर इतना था कि उनकी आवाज़ें भीड़ में खो गईं।


विजय अपने माता-पिता के पास पहुँच गया।


लेकिन रेखा नहीं मिली।


तीन महीने तक तलाश चली।


अख़बारों में खबरें छपीं।


मंदिरों में घोषणा हुई।


लेकिन रेखा का कोई पता नहीं चला।


धीरे-धीरे सबने मान लिया कि वो शायद अब इस दुनिया में नहीं रही।


लेकिन सच कुछ और था।


भगदड़ के बाद बेहोश रेखा को एक निःसंतान दंपत्ति ने अस्पताल पहुँचाया था।


होश आने पर उसे अपना नाम याद था।


लेकिन उसे अपने गाँव का पूरा पता याद नहीं था।


उस समय न मोबाइल थे, न इंटरनेट।


बहुत कोशिशों के बाद भी उसका परिवार नहीं मिला।


उस दंपत्ति ने उसे अपनी बेटी बनाकर पाल लिया।


समय बीतता गया।


रेखा की शादी हुई।


एक बेटी हुई।


फिर पति का देहांत हो गया।


कुछ वर्षों बाद बेटी भी बीमारी से चल बसी।


अब उसके पास सिर्फ एक पुराना बक्सा था।


और उसी बक्से में रखी थी वह तस्वीर।


जिसके पीछे उसकी माँ की लिखावट थी—


"मेरे विजय और रेखा।"


दो महीने पहले बक्सा साफ करते समय वह तस्वीर फिर उसके हाथ लगी।


और उसके भीतर दबा हुआ दर्द जाग उठा।


उसने तय किया—


मरने से पहले एक बार अपने भाई को ढूँढ़ेगी।


वो पुराने गाँव गई।


वहाँ पता चला कि विजय अब शहर में रहता है।


और आज...


चालीस साल बाद...


वो उसके दरवाज़े पर खड़ी थी।


विजय फूट-फूटकर रो पड़ा।


"दीदी..."


रेखा ने काँपते हाथ उसके सिर पर रख दिए।


"मेरा छोटा विजय..."


विजय उसके पैरों में बैठ गया।


"दीदी, मैं रोज़ सोचता था... अगर उस दिन तुम्हारा हाथ और ज़ोर से पकड़ा होता तो?"


रेखा रोते हुए बोली,


"और मैं सोचती थी... अगर तुझे अपनी तरफ़ खींच लेती तो?"


दोनों रो रहे थे।


पूजा की आँखें भी भर आईं।


उसने आगे बढ़कर रेखा के पैर छुए।


"दीदी... घर के अंदर आइए। देर हो गई, लेकिन मायका आपका ही है।"


रेखा फूट पड़ी।


"किसी ने मुझे इतने सालों बाद 'दीदी' कहा है।"


अंदर बैठक में विजय ने पुराना एल्बम निकाला।


दोनों भाई-बहन पुरानी तस्वीरों का एल्बम खोले बैठे थे। हर तस्वीर के साथ यादों का एक नया दरवाज़ा खुलता जा रहा था।


विजय मुस्कुराते हुए बोला, "याद है दीदी, तुम शाम को मुझे पढ़ाने बैठती थीं और मैं हर पाँच मिनट बाद कोई न कोई बहाना बनाकर उठ जाता था?"


रेखा की आँखों में बचपन उतर आया। वह हल्के से हँस पड़ी, "हाँ, और जैसे ही मैं पानी लेने रसोई में जाती, तू किताब बंद करके पतंग लेकर छत पर भाग जाता था। फिर मासूम सा चेहरा बनाकर कहता— 'दीदी, बस पाँच मिनट उड़ाई थी।'"


विजय ने आँसू पोंछते हुए कहा, "याद है माँ की बनाई हुई खीर? मैं अपनी कटोरी जल्दी-जल्दी खत्म करके आधी तेरी भी खा जाता था।"


रेखा ने प्यार से उसके सिर पर हल्की चपत लगाई, "और बाद में सारा दोष मेरे सिर मढ़ देता था। माँ डाँटती मुझे थीं और शरारतें तू करता था।"


दोनों कुछ पल चुप हो गए। फिर विजय धीमी आवाज़ में बोला, "और बाबूजी का वो डाँटना... बाहर से कितने सख्त लगते थे, लेकिन रात को चुपके से हमारे लिए गुड़ और मूँगफली ले आते थे।"


रेखा की आँखों से आँसू बह निकले। उसने काँपते हाथों से एक तस्वीर को सहलाया और कहा, "समय कितना बदल गया, विजय... लेकिन कुछ यादें कभी बूढ़ी नहीं होतीं।"


विजय ने अपनी बहन का हाथ थाम लिया। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे और फिर हँसते-हँसते रो पड़े— जैसे पचास साल का बिछोह उन आँसुओं के साथ धीरे-धीरे पिघल रहा हो।

शाम को विजय अपने बच्चों और पोतों को लेकर माता-पिता की तस्वीर के सामने खड़ा हो गया। उसकी आँखें बार-बार भर आ रही थीं।


"ये मेरी दीदी हैं," उसने गर्व से कहा।


"जिन्हें मैंने खो दिया था... और भगवान ने मुझे वापस दे दिया।"


रेखा तस्वीर के सामने बैठ गई।


"माँ... बाबूजी... मैं आ गई हूँ। आने में बहुत देर हो गई। मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं रास्ता नहीं भूलना चाहती थी, लेकिन किस्मत मुझे आप सबसे बहुत दूर ले गई थी।"


उसने काँपते हाथों से दीपक जलाया।


आँसू लगातार बह रहे थे।


विजय ने उसका हाथ पकड़ लिया।


"नहीं दीदी। रास्ता नहीं भूली थीं। किस्मत ने देर कर दी थी।"


उस रात रेखा को नींद नहीं आ रही थी।


विजय उसके कमरे में आया।


"क्या हुआ?"


रेखा धीमे से बोली,


"डर लग रहा है... कहीं सुबह उठूँ और पता चले ये सब सपना था।"


विजय मुस्कुराया।


"नहीं दीदी, यह सपना नहीं है। सपनों में अदरक वाली चाय की ऐसी महक नहीं होती, जो सीधे बचपन की दहलीज़ तक ले जाए।"


रेखा ने हैरानी से उसकी ओर देखा, "चाय?"


विजय हल्का-सा मुस्कुराया और बोला, "हाँ दीदी... अभी बनाकर लाया हूँ। बिल्कुल वैसी ही अदरक वाली चाय, जैसी माँ सर्द सुबहों में अपने हाथों से बनाया करती थीं। एक घूँट पीते ही लगेगा, जैसे माँ यहीं कहीं रसोई में खड़ी मुस्कुरा रही हों।"


रेखा ने कप हाथ में लिया।


एक घूँट पिया।


और उसकी आँखें भर आईं।


"विजय..."


"हाँ दीदी?"


"क्या मैं अब कभी-कभी यहाँ आ सकती हूँ?"


विजय ने उसका हाथ अपने सिर पर रख लिया।


"ये घर सिर्फ़ मेरा नहीं है, दीदी... यह आपका भी उतना ही है। और सुनो..."


रेखा ने आँसू पोंछते हुए उसकी ओर देखा, "क्या?"


विजय ने उसका हाथ अपने दोनों हाथों में कसकर थाम लिया और भर्राई आवाज़ में कहा,


"अगर इस बार ज़िंदगी के किसी मेले में फिर कभी भीड़ हुई न... तो मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ूँगा।"


रेखा की आँखों में आँसू छलक आए। वह हल्का-सा मुस्कुराई और बोली,


"और इस बार मैं भी तेरा हाथ इतनी मज़बूती से पकड़ूँगी कि कोई भीड़, कोई दूरी और कोई वक़्त हमें एक-दूसरे से जुदा नहीं कर पाएगा।"


विजय हँसते-हँसते रो पड़ा।


"अब बिछड़ना नहीं है, दीदी... इस जन्म में तो बिल्कुल नहीं।"


सुबह जब सूरज की पहली किरण आँगन में उतरी, तो ऐसा लगा जैसे बरसों से बंद पड़ा कोई दरवाज़ा खुल गया हो।


कुछ रिश्ते समय से हार जाते हैं।


कुछ दूरी से टूट जाते हैं।


लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें न भीड़ मिटा पाती है, न हालात, न सालों की खामोशी।


वो बस इंतज़ार करते हैं।


किसी एक दस्तक का।


किसी एक पहचान की।


किसी एक आवाज़ का—


"दीदी..."


या


"विजय..."


और फिर एक अधूरी ज़िंदगी पूरी हो जाती है।


यह कहानी उन सभी लोगों को समर्पित है जिन्होंने कभी किसी अपने को खोया है, और फिर भी उम्मीद का दीपक बुझने नहीं दिया। क्योंकि कभी-कभी ईश्वर देर ज़रूर करते हैं, लेकिन रिश्तों का हिसाब अधूरा नहीं छोड़ते।



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