बहू ने बेटे का हाथ नहीं छोड़ा
"सीमा, अब ज़िद छोड़ दो।"
सास की आवाज़ पूरे कमरे में गूंज रही थी।
"तुम अभी जवान हो। तुम्हारी पूरी जिंदगी पड़ी है। इस बच्चे को लेकर कब तक संघर्ष करोगी?"
सीमा चुपचाप खड़ी रही।
उसकी गोद में तीन साल का बेटा आरव था।
आरव जन्म से ही सुन नहीं सकता था।
डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि उसकी सुनने की क्षमता बहुत कम है।
यह बात सुनते ही परिवार के कई लोगों ने दूरी बना ली थी।
कुछ लोग दया दिखाते थे।
कुछ लोग ताने मारते थे।
और कुछ लोग सलाह देने के नाम पर जख्म दे जाते थे।
"ऐसे बच्चे का भविष्य क्या होगा?"
"इसे किसी विशेष संस्था में छोड़ दो।"
"तुम दूसरी शादी कर लो।"
"अपनी जिंदगी बर्बाद मत करो।"
सीमा हर बात सुनती थी।
लेकिन उस दिन उसने पहली बार सबके सामने जवाब दिया।
"मेरा बेटा कोई बोझ नहीं है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सीमा ने आगे कहा—
"भगवान ने उसे मेरे भरोसे भेजा है। मैं उसका साथ कभी नहीं छोड़ूंगी।"
उसकी आँखों में आँसू थे।
लेकिन आवाज़ बिल्कुल मजबूत थी।
उस दिन के बाद सीमा ने फैसला कर लिया।
वह किसी पर निर्भर नहीं रहेगी।
वह अपने बेटे का भविष्य खुद बनाएगी।
अगले ही सप्ताह वह किराए के एक छोटे से कमरे में रहने लगी।
कमरे में एक पुराना पंखा था।
बरसात में छत टपकती थी।
गर्मी में कमरा तंदूर जैसा हो जाता था।
लेकिन सीमा के हौसले कभी नहीं टूटे।
सुबह वह लोगों के घरों में खाना बनाने जाती।
दोपहर में एक दुकान पर हिसाब-किताब का काम करती।
और रात को घर आकर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती।
दिन में चौदह-पंद्रह घंटे काम करना उसकी आदत बन गया था।
उधर आरव बड़ा हो रहा था।
दुनिया उसके लिए अलग थी।
वह आवाज़ें नहीं सुन सकता था।
लेकिन उसकी आँखें बहुत कुछ समझ लेती थीं।
सीमा ने सांकेतिक भाषा सीखनी शुरू की।
फिर उसने आरव को भी सिखाई।
दोनों घंटों बैठकर हाथों के इशारों से बातें करते।
धीरे-धीरे उनका रिश्ता और गहरा होता गया।
जब आरव स्कूल गया तो नई मुश्किलें शुरू हुईं।
कुछ बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते थे।
कई बार शिक्षक भी उसे समझ नहीं पाते थे।
एक दिन वह रोते हुए घर आया।
"माँ, मैं दूसरों जैसा क्यों नहीं हूँ?"
आरव ने उदास होकर पूछा।
यह सवाल सुनकर सीमा का दिल टूट गया।
लेकिन उसने खुद को संभाला।
उसने बेटे का चेहरा अपने हाथों में लिया।
फिर मुस्कुराकर बोली—
"तुम दूसरों जैसे नहीं हो, इसलिए खास हो।"
"हर इंसान की ताकत अलग होती है।"
"तुम्हारी ताकत तुम्हारा दिमाग और तुम्हारी मेहनत है।"
उस दिन के बाद आरव बदल गया।
उसने पढ़ाई पर पूरा ध्यान देना शुरू कर दिया।
उसे कंप्यूटर में बहुत रुचि थी।
घंटों बैठकर वह नई-नई चीजें सीखता।
पुराने कंप्यूटर पर अभ्यास करता।
इंटरनेट कैफे में जाकर वीडियो देखता।
कई बार बिजली चली जाती।
तो वह मोमबत्ती की रोशनी में किताबें पढ़ता।
सीमा उसे देखकर खुश होती।
उसे लगता था कि उसका बेटा एक दिन जरूर कुछ बड़ा करेगा।
समय उड़ता चला गया।
दसवीं का परिणाम आया।
पूरे जिले में आरव का नाम पहले स्थान पर था।
स्कूल में मिठाइयाँ बंटी।
अखबारों में उसकी तस्वीर छपी।
लोग हैरान थे।
जिस बच्चे को कभी कमजोर समझा गया था, वही सबको पीछे छोड़ चुका था।
सीमा उस दिन देर तक रोती रही।
लेकिन यह आँसू खुशी के थे।
बारहवीं में भी आरव ने शानदार सफलता हासिल की।
फिर उसे एक बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश मिल गया।
छात्रवृत्ति भी मिल गई।
सीमा ने भगवान का धन्यवाद किया।
कॉलेज में आरव की प्रतिभा और निखर गई।
उसने कई तकनीकी प्रतियोगिताएँ जीतीं।
उसके बनाए प्रोजेक्ट राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचे।
धीरे-धीरे बड़ी कंपनियों का ध्यान उसकी ओर जाने लगा।
अंतिम वर्ष में उसे एक प्रसिद्ध टेक कंपनी से नौकरी का प्रस्ताव मिला।
वेतन इतना था कि सीमा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।
जिस दिन नियुक्ति पत्र आया, आरव सबसे पहले अपनी माँ के पास गया।
उसने कागज़ सीमा के हाथ में रख दिया।
सीमा उसे पढ़ नहीं पाई।
उसकी आँखों में आँसू भर आए थे।
आरव ने इशारों में कहा—
"माँ, आपकी मेहनत जीत गई।"
सीमा फूट-फूटकर रो पड़ी।
साल बीतते गए।
आरव ने नौकरी में भी तेजी से सफलता हासिल की।
उसकी मेहनत, ईमानदारी और प्रतिभा ने उसे कंपनी के सबसे महत्वपूर्ण लोगों में शामिल कर दिया।
एक दिन उसे अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट का नेतृत्व सौंपा गया।
उस उपलब्धि के सम्मान में कंपनी ने एक बड़ा समारोह आयोजित किया।
हॉल लोगों से भरा हुआ था।
मंच पर आरव को बुलाया गया।
तालियों की गड़गड़ाहट गूंज रही थी।
फिर आरव ने माइक लिया।
उसने कहा—
"आज लोग मेरी सफलता देख रहे हैं।"
"लेकिन मेरी असली सफलता मेरी माँ हैं।"
पूरा हॉल शांत हो गया।
आरव ने आगे कहा—
"जब दुनिया ने मुझे कमजोर कहा, तब उन्होंने मुझ पर विश्वास किया।"
"जब लोगों ने मुझे बोझ कहा, तब उन्होंने मुझे अपना गर्व कहा।"
"अगर मेरी माँ हार मान लेतीं, तो मैं आज यहाँ नहीं होता।"
इतना कहते ही वह मंच से नीचे उतरा।
उसने अपनी माँ का हाथ पकड़ा।
और उन्हें मंच पर ले आया।
पूरा हॉल खड़ा हो गया।
हर तरफ तालियाँ बज रही थीं।
सीमा की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
उसे अपने संघर्ष के सारे दिन याद आ रहे थे।
टपकती छत वाला कमरा।
भूखे पेट गुजारी रातें।
लोगों के ताने।
और बेटे के लिए किया गया हर त्याग।
आज सब कुछ सफल हो चुका था।
उस दिन सीमा ने महसूस किया कि सच्ची जीत पैसे से नहीं मिलती।
सच्ची जीत तब मिलती है जब इंसान मुश्किलों के सामने झुकने से इनकार कर देता है।
और उस माँ ने, जिसने कभी अपने बेटे का हाथ नहीं छोड़ा था, आखिरकार पूरी दुनिया को दिखा दिया कि प्यार, विश्वास और मेहनत से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।

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