बूढ़े पिता का सम्मान
सुबह के लगभग पाँच बजे थे।
सर्दियों की हल्की ठंड पूरे घर में फैली हुई थी।
85 वर्षीय रामप्रसाद जी की आँख अचानक खुल गई।
उन्होंने घड़ी की तरफ देखा और फिर घबराकर बिस्तर की ओर नजर डाली।
उनका दिल बैठ गया।
बिस्तर फिर से गीला हो चुका था।
कुछ पल के लिए वे चुप बैठे रहे।
आँखों में शर्म और बेबसी साफ दिखाई दे रही थी।
कुछ महीने पहले तक वे बिल्कुल स्वस्थ थे।
लेकिन उम्र बढ़ने और बीमारी की वजह से अब कभी-कभी उनसे यह गलती हो जाती थी।
हर बार उन्हें ऐसा लगता था जैसे वे अपने ही घर में बोझ बन गए हों।
कल ही तो उनकी बहू रश्मि ने नई चादर बिछाई थी।
उसे बहुत गुस्सा आया था जब पिछली बार ऐसा हुआ था।
वह अपने पति अमित से कह रही थी,
"मैं भी इंसान हूँ। हर बार मैं ही क्यों साफ करूँ? कब तक चलेगा यह सब?"
रामप्रसाद जी ने वह बात सुन ली थी।
तब से उनका मन और भी टूट गया था।
उन्होंने धीरे-धीरे उठकर चादर समेटी।
कमजोर शरीर काँप रहा था।
घुटनों में दर्द था।
फिर भी वे किसी तरह चादर उठाकर बाथरूम तक ले गए।
नल खोलकर चादर धोने लगे।
उनकी साँसें तेज चलने लगीं।
हाथों में ताकत नहीं बची थी।
लेकिन मन में सिर्फ एक ही डर था—
"कहीं बहू देख न ले।"
उन्होंने पूरी ताकत लगाकर चादर धोनी शुरू की।
तभी अचानक चक्कर आ गया।
उनका संतुलन बिगड़ा और वे बाथरूम की दीवार पकड़कर बैठ गए।
साँसें बुरी तरह फूल रही थीं।
उसी समय घर का मुख्य दरवाजा खुला।
अमित और रश्मि अंदर आए।
दोनों किसी रिश्तेदार के यहाँ से लौटे थे।
रश्मि की नजर सबसे पहले बाथरूम की तरफ गई।
वह दौड़कर वहाँ पहुँची।
रामप्रसाद जी को उस हालत में देखकर वह चौंक गई।
रामप्रसाद जी घबराकर बोले,
"बहू... माफ कर देना... मैंने सब साफ कर दिया है... अब नहीं होगा..."
उनकी आवाज काँप रही थी।
अमित भी वहाँ पहुँच गया।
उसने अपने पिता को सहारा देकर उठाया और कुर्सी पर बैठाया।
रामप्रसाद जी बार-बार एक ही बात कह रहे थे,
"बेटा, नाराज़ मत होना।"
अमित की आँखें भर आईं।
उसने अपने पिता के काँपते हाथ पकड़ लिए।
फिर बोला,
"पापा, आप मुझसे माफी क्यों मांग रहे हैं?"
रामप्रसाद जी कुछ नहीं बोले।
बस सिर झुका लिया।
तभी रश्मि बोली,
"लेकिन अमित, यह रोज-रोज की परेशानी भी तो है।"
अमित ने शांत स्वर में उसकी तरफ देखा।
फिर बोला,
"रश्मि, क्या तुम्हें याद है जब हमारा बेटा छोटा था?"
"दिन में कई बार कपड़े गंदे कर देता था।"
"हमने कभी उससे शिकायत की थी?"
रश्मि चुप हो गई।
अमित आगे बोला,
"जब मैं छोटा था, तब पापा दिनभर नौकरी करते थे।"
"रात में मेरी तबीयत खराब हो जाती थी तो पूरी रात जागते रहते थे।"
"मैंने कितनी बार बिस्तर गंदा किया होगा।"
"क्या उन्होंने कभी मुझे बोझ कहा?"
"क्या उन्होंने कभी मुझसे माफी माँगने को कहा?"
रश्मि के पास कोई जवाब नहीं था।
अमित की आवाज भर्रा गई।
"जिस पिता ने मेरी हर गंदगी साफ की..."
"आज अगर उनकी बीमारी की वजह से मुझे उनकी मदद करनी पड़े तो क्या यह मेरा फर्ज नहीं है?"
घर में सन्नाटा छा गया।
रामप्रसाद जी की आँखों से आँसू बहने लगे।
अमित तुरंत अंदर गया।
नई चादर लेकर आया।
बिस्तर साफ किया।
फिर अपने पिता को सहारा देकर कमरे में ले गया।
उनके कपड़े बदले।
गर्म पानी लाकर उनके हाथ-पैर धुलवाए।
फिर रसोई में जाकर चाय बनाई।
साथ में दलिया भी तैयार किया।
रामप्रसाद जी हैरानी से सब देख रहे थे।
अमित उनके सामने बैठकर अपने हाथों से उन्हें चाय पिलाने लगा।
रामप्रसाद जी का गला भर आया।
उन्होंने काँपते हाथ बेटे के सिर पर रख दिए।
"खुश रहो बेटा..."
बस इतना ही कह पाए।
उसी समय रश्मि धीरे-धीरे कमरे में आई।
उसकी आँखें लाल थीं।
वह रामप्रसाद जी के पास बैठ गई।
फिर उनके पैर पकड़कर रोने लगी।
"पिताजी, मुझे माफ कर दीजिए।"
"मैं आपकी तकलीफ समझ नहीं पाई।"
रामप्रसाद जी ने तुरंत उसे उठाया।
"नहीं बहू, गलती मेरी है।"
रश्मि और जोर से रो पड़ी।
"नहीं पिताजी, गलती मेरी थी।"
उस दिन के बाद घर का माहौल बदल गया।
रश्मि ने कभी शिकायत नहीं की।
वह समय पर दवाइयाँ देती।
उनके खाने का ध्यान रखती।
डॉक्टर के पास लेकर जाती।
और सबसे बड़ी बात—
अब वह उन्हें बोझ नहीं, परिवार का सबसे कीमती सदस्य मानती थी।
एक शाम रामप्रसाद जी बरामदे में बैठे थे।
सामने उनकी दिवंगत पत्नी शारदा जी की तस्वीर लगी थी।
उन्होंने तस्वीर की तरफ देखा।
होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
फिर मन ही मन बोले,
"देखो शारदा, तुम हमेशा चिंता करती थीं कि मेरे बाद तुम्हारा ख्याल कौन रखेगा।"
"आज तुम्हारा बेटा वही कर रहा है जो हमने उसे सिखाया था।"
"संस्कार कभी बेकार नहीं जाते।"
उनकी आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।
और उस दिन पूरे घर को समझ आ गया कि—
बूढ़े माँ-बाप बोझ नहीं होते।
वे वही जड़ें होते हैं जिनकी वजह से परिवार का पेड़ खड़ा रहता है।
जिस दिन हम उनकी सेवा करना सीख लेते हैं, उसी दिन इंसानियत की असली परीक्षा पास कर लेते हैं।

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