बहन ने सबके सामने भाई का सिर ऊँचा कर दिया!
"जिस ननद ने सबके सामने कहा था— 'मेरे भाई का प्यार ही मेरे लिए सबसे बड़ा उपहार है'… उसी एक बात ने पूरे रिश्तेदारों की सोच बदल दी।"
रसोई में चूल्हे पर दाल चढ़ी हुई थी।
सीमा आटे की लोइयाँ बना रही थी, लेकिन उसके हाथ काँप रहे थे। बार-बार उसकी नज़र उस छोटे से डिब्बे पर जा रही थी, जिसमें उसने अपनी ननद के घर ले जाने के लिए एक साड़ी, बच्चों के दो जोड़ी कपड़े और एक चाँदी का सिक्का बड़े जतन से रख रखा था।
इतने में उसका पति मोहन अंदर आया।
धीरे से बोला,
"इतना मत सोचो सीमा... जितना हमारी हैसियत है, उतना ही ले जाएंगे।"
सीमा की आँखें भर आईं।
"अगर दीदी को बुरा लग गया तो?
अगर रिश्तेदारों ने ताने मार दिए तो?"
मोहन ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह भी जानता था कि गरीबी से बड़ा डर लोगों की बातें होती हैं।
तभी आँगन में बैठी मोहन की बूढ़ी माँ ने उनकी बातें सुन लीं।
उन्होंने अपनी अलमारी खोली और पुराने कपड़े में बंधी छोटी-सी पोटली निकाल लाई।
उसमें उनकी शादी के समय की एक सोने की छोटी अंगूठी रखी थी।
उन्होंने वह अंगूठी मोहन के हाथ पर रख दी।
"इसे बेच देना बेटा...
बहन का मान रह जाएगा।"
सीमा घबरा गई।
उसने तुरंत सास का हाथ पकड़ लिया।
"नहीं माँ जी।
यह बाबूजी की आख़िरी निशानी है।
इसे बेचकर खुशी नहीं मिलेगी, सिर्फ़ दर्द मिलेगा।"
माँ मुस्कुरा दीं।
"लेकिन बहू...
अगर भाई का सम्मान बच जाए तो?"
सीमा ने सिर हिलाया।
"सम्मान पैसे से नहीं, अपनेपन से मिलता है।"
इतने में दरवाज़े पर ढोलक की आवाज़ सुनाई दी।
मोहन की बहन सविता अपने परिवार के साथ निमंत्रण देने आई थी।
घर में आते ही उसने सबसे पहले अपनी भाभी के पैर छुए।
सीमा घबरा गई।
"अरे दीदी, ये क्या कर रही हैं?"
सविता बोली,
"जिसने मेरे माँ-बाप की सेवा की...
उसके पैर छूने से मेरा सम्मान बढ़ता है।"
सभी लोग भावुक हो गए।
कुछ देर बाद सविता ने चुपचाप एक लिफाफा सीमा की हथेली में रख दिया।
सीमा ने खोलकर देखा।
उसमें एक लाख रुपये थे।
वह तुरंत बोली,
"नहीं दीदी...
हम यह नहीं ले सकते।"
सविता मुस्कुराई।
"यह मदद नहीं है भाभी...
यह मेरा फर्ज़ है।
जब पिताजी महीनों अस्पताल में थे,
तब आपने अपने गहने बेच दिए थे।
आज अगर मैं आपके काम न आ सकी,
तो बेटी कहलाने का क्या हक़ है मुझे?"
सीमा की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने लिफाफा वापस कर दिया।
"दीदी...
हम अपनी क्षमता के अनुसार ही शादी का नेग लेकर आएंगे।
आपके प्यार से बढ़कर हमारे लिए कोई भेंट नहीं है।"
सविता ने बिना ज़ोर दिए लिफाफा वापस रख लिया।
वह समझ गई कि उसकी भाभी स्वाभिमानी है।
आख़िर वह शुभ दिन भी आ गया, जब भाई को बहन के घर नेग लेकर जाना था।
मोहन और सीमा साधारण कपड़ों में घर पहुँचे।
उनके हाथ में अपनी हैसियत के अनुसार लाया हुआ छोटा-सा शगुन था।
कुछ रिश्तेदार एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगे।
एक औरत फुसफुसाई,
"लगता है इस बार भी ज़्यादा कुछ नहीं लाए।"
दूसरी बोली,
"देखो... थाली कितनी छोटी है।"
सीमा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
लेकिन तभी सविता सबके सामने आ गई।
उसने सबसे पहले अपने भाई और भाभी की आरती उतारी।
फिर ऊँची आवाज़ में बोली,
"सुनिए सब लोग...
आज कोई भी पहले यह नहीं देखेगा कि मेरे भाई क्या लेकर आए हैं।
पहले मैं अपने भाई और भाभी के बारे में कुछ कहना चाहती हूँ।"
पूरा आँगन शांत हो गया।
सविता ने कहा,
"जब मेरे माता-पिता बीमार थे,
तब रिश्तेदार सिर्फ़ हाल पूछने आते थे।
लेकिन मेरे भाई और भाभी ने दिन-रात उनकी सेवा की।
आज जो भी मैं हूँ,
उन दोनों की वजह से हूँ।
इसलिए मेरे लिए भाई-भाभी का प्यार, उनका त्याग और उनका सम्मान ही दुनिया का सबसे अनमोल उपहार है।"
इतना कहकर उसने भाई के लाए हुए उपहारों की थाली अपने माथे से लगा ली।
फिर बोली,
"मेरे मायके से आया हुआ हर दाना मेरे लिए प्रसाद है।
जिसकी नज़र सिर्फ़ सामान पर जाती है, वह रिश्तों की दौलत कभी नहीं समझ सकता। मेरे लिए मेरे भाई का प्यार ही सबसे बड़ा उपहार है।"
पूरा आँगन तालियों से गूँज उठा।
जो लोग ताने मार रहे थे,
वे शर्म से सिर झुका चुके थे।
एक बुज़ुर्ग रिश्तेदार आगे आए।
उन्होंने मोहन के कंधे पर हाथ रखा।
"बेटा,
आज तुमने नहीं...
तुम्हारी बहन ने हम सबको रिश्तों की असली कीमत सिखा दी।"
सीमा की आँखों से आँसू बह निकले।
लेकिन इस बार उन आँसुओं में कोई डर नहीं था।
सिर्फ़ सम्मान था।
उसने मन ही मन भगवान का धन्यवाद किया और सोचा—
"जिस घर में भाई-बहन का प्यार सबसे बड़ी दौलत हो... उस पूरे परिवार का सम्मान सबसे अमीर होता है।"

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