बहू का हक
"जिस दिन तीनों ननदों के दोबारा मायके आने की खबर मिली... उसी दिन बहू ने मन ही मन एक ऐसा फैसला लिया, जिसने पूरे परिवार को रिश्तों की असली मर्यादा समझा दी।"
मोबाइल की घंटी बजते ही राधिका ने फोन उठाया।
उधर उसकी सास खुशी से बोलीं, "राधिका, अगले हफ्ते तुम्हारी तीनों बड़ी ननदें आ रही हैं। साथ में तुम्हारी चचेरी ननद की शादी भी है, इसलिए घर में खूब रौनक रहेगी।"
इतना सुनते ही राधिका के चेहरे की मुस्कान पल भर में गायब हो गई।
उसकी आंखों के सामने एक साल पुराना वही दिन घूम गया, जब वह नई-नई दुल्हन बनकर इस घर में आई थी।
विदाई के बाद उसने अपने कमरे में रखा सारा सामान खोला ही था कि तीनों ननदें हंसते हुए अंदर आ गई थीं।
"अरे भाभी, नई दुल्हन का सामान तो पहले ननदें ही देखती हैं।"
यह कहते हुए उन्होंने एक-एक करके उसके सूट, साड़ियां, मेकअप और दूसरी चीजें निकालनी शुरू कर दीं।
राधिका को लगा कि शायद वे सिर्फ देख रही हैं।
लेकिन कुछ ही देर बाद एक बोली, "यह वाली साड़ी मुझे पसंद आ गई।"
दूसरी ने कहा, "यह मेकअप किट मैं ले जा रही हूं।"
तीसरी ने हंसते हुए कहा, "और यह वाला बैग मेरे काम आ जाएगा।"
राधिका कुछ समझ पाती, उससे पहले उसके कई नए सामान अलग-अलग ढेर में रख दिए गए।
सबसे ज्यादा दुख उसे तब हुआ, जब उसकी निजी चीजों तक बिना पूछे उठा ली गईं।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि नई बहू होने के नाते चुप रहे या अपने हक के लिए बोले।
वह पूरे समय बस खामोश खड़ी रही।
जाते-जाते तीनों ने उसके मायके से मिले गहनों में से भी अपनी-अपनी पसंद का एक-एक गहना ले लिया।
राधिका की आंखों में आंसू आ गए थे, लेकिन उसने किसी से कुछ नहीं कहा।
बाद में जब उसके पति और ससुर को यह बात पता चली, तो दोनों बहुत नाराज हुए।
उन्होंने साफ कहा, "किसी भी बहू या बेटी का सामान बिना पूछे लेना बिल्कुल गलत है।"
सास को भी अपनी बेटियों की हरकत अच्छी नहीं लगी, लेकिन मां होने के कारण कुछ दिनों बाद उनका गुस्सा शांत हो गया।
समय बीतता गया।
राधिका ने उस घटना को भुलाने की कोशिश की, लेकिन वह अपमान उसके दिल में कहीं न कहीं हमेशा बना रहा।
अब एक साल बाद तीनों ननदें फिर से घर आने वाली थीं।
इस बार राधिका ने चुप रहने के बजाय समझदारी से तैयारी की।
उसने अपने कमरे की अलमारी में सारा कीमती सामान व्यवस्थित रख दिया।
जेवर बैंक लॉकर में रख दिए।
जरूरी कागजात और निजी सामान लॉक कर दिए।
उसने अपने पति से भी साफ कह दिया, "मैं किसी से झगड़ा नहीं चाहती, लेकिन इस बार अगर किसी ने मेरी अनुमति के बिना मेरे सामान को हाथ लगाया, तो मैं मना जरूर करूंगी।"
पति मुस्कुराए।
"इस बार तुम्हें चुप रहने की जरूरत नहीं है। मैं भी तुम्हारे साथ हूं।"
कुछ दिनों बाद तीनों ननदें घर पहुंच गईं।
घर में शादी की तैयारियां शुरू हो गईं।
सब लोग हंसी-मजाक में लगे थे।
राधिका ने भी सभी का सम्मान से स्वागत किया।
नमस्ते की, चाय-नाश्ता कराया और जितनी जरूरत थी, उतनी ही बातचीत की।
तीनों ननदों को शायद उम्मीद थी कि इस बार भी पहले की तरह वे उसके कमरे में जाकर सामान देख लेंगी।
दोपहर में बड़ी ननद मुस्कुराते हुए बोली,
"चलो भाभी, इस बार क्या-क्या नया खरीदा है? अलमारी खोलो।"
राधिका ने मुस्कुराकर जवाब दिया,
"दीदी, अगर आपको कुछ देखना है तो मैं निकालकर दिखा देती हूं। लेकिन मेरी अलमारी और मेरा निजी सामान मैं बिना वजह किसी को नहीं खोलने देती।"
तीनों एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं।
मंझली ननद बोली,
"अरे, हम तो अपने ही हैं।"
राधिका ने बहुत शांत स्वर में कहा,
"अपने होने का मतलब यह नहीं कि बिना पूछे किसी की चीज़ ले ली जाए। पिछले साल जो हुआ था, उससे मुझे बहुत दुख हुआ था। इसलिए इस बार मैंने पहले ही अपनी सीमा तय कर ली है। उम्मीद है आप मेरी बात समझेंगी।"
इतने में उसके पति भी वहीं आ गए।
उन्होंने कहा,
"राधिका बिल्कुल सही कह रही है। हर इंसान की निजी चीज़ों का सम्मान होना चाहिए।"
ससुर ने भी बात सुन ली।
उन्होंने गंभीर आवाज़ में कहा,
"जिस बात पर पहले भी नाराज़गी हुई थी, वह दोबारा नहीं होनी चाहिए। घर का प्यार तभी बना रहता है, जब एक-दूसरे की मर्यादा का सम्मान किया जाए।"
तीनों ननदें चुप हो गईं।
उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि नई बहू की चुप्पी को उन्होंने उसकी मजबूरी समझ लिया था।
शाम को सबसे बड़ी ननद अकेले राधिका के कमरे में आई।
वह बोली,
"भाभी... पिछले साल हमने जो किया, वह मजाक नहीं था। सच कहूं तो हमें ऐसा नहीं करना चाहिए था। अगर तुम्हें बुरा लगा, तो हमें माफ कर दो।"
बाकी दोनों ननदें भी आ गईं।
उन्होंने भी अपनी गलती स्वीकार की।
राधिका ने कहा,
"मुझे किसी सामान का दुख उतना नहीं था, जितना इस बात का कि किसी ने मुझसे एक बार भी नहीं पूछा। सम्मान सबसे बड़ी चीज़ होती है।"
तीनों ने सिर झुका दिया।
अगले ही दिन उन्होंने राधिका को वे गहने वापस कर दिए जो उन्होंने पहले ले लिए थे।
साथ ही, जो सामान वापस किया जा सकता था, वह भी लौटा दिया और बाकी के बदले नए उपहार लाकर दिए।
राधिका ने मुस्कुराकर कहा,
"मुझे उपहारों से ज्यादा खुशी इस बात की है कि आज आपने मेरी भावना समझी।"
उस दिन के बाद घर का माहौल बदल गया।
तीनों ननदें जब भी मायके आतीं, पहले दरवाजा खटखटातीं, फिर पूछतीं,
"भाभी, अंदर आ जाएं?"
राधिका भी पूरे मन से उनका स्वागत करती।
रिश्तों में मिठास लौट आई, क्योंकि इस बार प्यार के साथ-साथ एक-दूसरे की मर्यादा और निजी सीमाओं का सम्मान भी जुड़ गया था।
सीख:
रिश्ते तभी मजबूत बनते हैं, जब प्यार के साथ विश्वास, सम्मान और एक-दूसरे की निजी सीमाओं का भी पूरा ध्यान रखा जाए। चुप रहना हमेशा अच्छा नहीं होता; कई बार शांत और सम्मानजनक तरीके से अपनी बात कहना ही रिश्तों को सही दिशा देता है।

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