जिस माँ ने तुम्हें जन्म दिया है, उसी के खिलाफ गवाही दोगे?
कई बार इंसान यह सोच लेता है कि बुज़ुर्ग माता-पिता अब कमजोर हो चुके हैं, इसलिए उनकी आवाज़ की कोई कीमत नहीं रही। उसे लगता है कि उम्र बढ़ने के साथ इंसान का अधिकार भी कम हो जाता है। लेकिन वह भूल जाता है कि जिसने पूरी जिंदगी संघर्ष करके घर बनाया हो, उसके आत्मसम्मान को कोई कागज़, कोई धोखा और कोई लालच नहीं खरीद सकता।
रामकली देवी की उम्र पचहत्तर साल थी। चेहरा झुर्रियों से भर चुका था, बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे, लेकिन उनकी आँखों में अब भी वही चमक थी जो कभी उनके पति हरिराम को पसंद थी।
गाँव के किनारे बना उनका बड़ा घर दूर से ही पहचान में आ जाता था। उस घर की हर ईंट में हरिराम और रामकली की मेहनत बसी हुई थी। खेतों में मजदूरी करके, दूसरों के घरों में काम करके और अपनी जरूरतें काट-काटकर उन्होंने वह घर बनाया था।
हरिराम को गुजरे हुए दस साल हो चुके थे।
अब घर में रामकली अपने बड़े बेटे सुरेश, बहू कमला और दो पोतों के साथ रहती थीं।
शुरुआत में सब ठीक था।
लेकिन जैसे-जैसे जमीनों की कीमत बढ़ने लगी, सुरेश की नीयत भी बदलने लगी।
एक दिन गाँव में खबर फैली कि शहर की एक बड़ी कंपनी उस इलाके में फैक्ट्री लगाने वाली है। जिन लोगों की जमीन सड़क के आसपास थी, उन्हें बहुत अच्छा पैसा मिलने वाला था।
रामकली का घर और दो बीघा जमीन भी उसी क्षेत्र में आती थी।
बस उसी दिन से सुरेश की आँखों में लालच उतर आया।
वह बार-बार माँ को समझाने लगा।
“अम्मा, एक बात कहूँ?”
“कह बेटा।”
“सोच रहा हूँ कि जमीन बेच दें।”
रामकली ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
“जमीन बेच दें? लेकिन क्यों?”
सुरेश तुरंत बोला,
“अम्मा, जमीन की कीमत बहुत बढ़ गई है। अभी बेचेंगे तो इतना पैसा मिलेगा कि हमारी पूरी जिंदगी बदल जाएगी। नया घर बन जाएगा, बच्चों की पढ़ाई हो जाएगी, और कोई चिंता भी नहीं रहेगी।”
रामकली कुछ क्षण चुप रहीं। फिर उन्होंने गहरी साँस लेते हुए कहा,
“बेटा, पैसा आज है तो कल नहीं भी रहेगा। लेकिन यह जमीन सिर्फ मिट्टी का टुकड़ा नहीं है। इसमें तेरे बाप की मेहनत, पसीना और यादें बसी हैं। यह उनकी आखिरी निशानी है।”
“लेकिन अम्मा...” सुरेश ने फिर समझाने की कोशिश की।
रामकली ने उसकी बात बीच में ही रोक दी।
“नहीं बेटा। मेरे रहते यह जमीन नहीं बिकेगी। जब तक मैं ज़िंदा हूँ, तेरे बाप की यह निशानी यहीं रहेगी।”
सुरेश चुप तो हो गया, लेकिन माँ की यह बात उसके मन में कहीं गहरे चुभ गई। उस दिन के बाद जमीन का लालच उसके दिल में धीरे-धीरे और बढ़ने लगा।
धीरे-धीरे उसने माँ से बात करना कम कर दिया।
बहू भी बदल गई।
जो बहू पहले उनके लिए चाय बनाकर लाती थी, अब खाना भी देर से देती थी।
कई बार रामकली बिना खाए ही सो जातीं।
लेकिन उन्होंने कभी शिकायत नहीं की।
एक दिन सुरेश शहर से कुछ कागज़ लेकर आया।
“अम्मा, ज़रा यहाँ हस्ताक्षर कर दीजिए।”
रामकली ने कागज़ों की ओर देखा और फिर बेटे की तरफ़।
“किस बात के कागज़ हैं ये?”
सुरेश ने सहज बनने की कोशिश की।
“कुछ नहीं अम्मा, सरकार की नई योजना आई है। उसी का फॉर्म है। अगर आप हस्ताक्षर कर देंगी तो थोड़ा फायदा मिल जाएगा।”
रामकली ने कागज़ हाथ में लेकर ध्यान से देखा। वह पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन जीवन के अनुभव ने उन्हें लोगों की नीयत पहचानना सिखा दिया था।
उन्होंने शांत स्वर में पूछा,
“जब मुझे पढ़ना नहीं आता, तो पहले यह बता कि इसमें लिखा क्या है?”
सुरेश एक पल के लिए झिझका, फिर बोला,
“अरे अम्मा, आप बेकार में चिंता कर रही हैं। बस औपचारिकता है, हस्ताक्षर कर दीजिए।”
रामकली ने तुरंत कागज़ वापस उसकी ओर बढ़ा दिए।
“नहीं बेटा। बिना समझे मैं किसी भी कागज़ पर अंगूठा या हस्ताक्षर नहीं करूँगी। पहले किसी भरोसेमंद आदमी से इसे पढ़वाऊँगी, उसके बाद ही कोई फैसला लूँगी।”
उनकी बात सुनकर सुरेश के चेहरे का रंग बदल गया। उसे एहसास हो गया कि उसकी चाल इतनी आसानी से सफल होने वाली नहीं थी।
सुरेश नाराज़ होकर चला गया।
इसके बाद उसने दूसरा रास्ता अपनाया।
कुछ हफ्तों बाद वह दो आदमियों को लेकर घर आया।
उनमें से एक वकील था।
दूसरा प्रॉपर्टी का दलाल।
सुरेश ने फाइल खोलकर कहा,
“अब जमीन बिक चुकी है।”
रामकली ने चौंककर उसकी ओर देखा।
“कैसे?”
वकील ने कागज़ आगे बढ़ाए।
“इन पर आपके अंगूठे के निशान हैं।”
रामकली ने जैसे ही कागज़ देखे, उनका दिल बैठ गया।
किसी पुराने दस्तावेज़ से उनका अंगूठा उठाकर नए कागज़ों पर लगा दिया गया था।
यह साफ जालसाजी थी।
“यह झूठ है!” उन्होंने गुस्से में कहा।
सुरेश हँस पड़ा।
“अब कुछ नहीं हो सकता।”
रामकली ने बेटे की आँखों में देखा।
उन्हें पहली बार लगा कि सामने उनका बेटा नहीं, कोई अजनबी खड़ा है।
उस रात उन्होंने एक पल भी नींद नहीं ली।
हरिराम की तस्वीर के सामने बैठी रहीं।
फिर उन्होंने मन ही मन फैसला कर लिया।
वह हार नहीं मानेंगी।
अगले दिन वह गाँव के पुराने स्कूल मास्टर रघुनाथ जी के पास पहुँचीं।
रघुनाथ जी ने सारे कागज़ देखे।
रघुनाथ जी ने गंभीर स्वर में कहा,
“रामकली, यह मामला बहुत गंभीर है। न्याय पाने के लिए तुम्हें अदालत का दरवाज़ा खटखटाना पड़ेगा।”
रामकली ने बिना एक पल गंवाए जवाब दिया,
“तो मैं अदालत जाऊँगी।”
रघुनाथ जी ने उनकी ओर देखते हुए पूछा,
“लेकिन वहाँ तुम्हारा अपना बेटा तुम्हारे खिलाफ खड़ा होगा। क्या तुम उसका सामना कर पाओगी?”
रामकली के चेहरे पर कोई झिझक नहीं थी।
“अगर सच मेरे साथ है, तो मुझे किसी का सामना करने से डर नहीं लगता।”
रघुनाथ जी ने फिर कहा,
“गाँव वाले तरह-तरह की बातें करेंगे। लोग तुम्हें ही दोष देने लगेंगे।”
रामकली ने गहरी साँस ली और दृढ़ आवाज़ में बोलीं,
“जब बेटा अपनी माँ के साथ धोखा करते समय समाज की परवाह नहीं कर सका, तो मैं न्याय माँगते समय लोगों की बातों से क्यों डरूँ? अब जो होगा, सच के रास्ते पर होगा।”
कुछ ही दिनों में मामला अदालत पहुँच गया।
पूरा गाँव इस खबर से हैरान था।
सुरेश को विश्वास था कि बूढ़ी माँ अदालत के चक्कर नहीं लगा पाएगी।
लेकिन हर सुनवाई पर रामकली समय से पहले पहुँच जातीं।
धीरे-धीरे सच सामने आने लगा।
हस्ताक्षर विशेषज्ञ बुलाए गए।
रिकॉर्ड जाँचे गए।
गवाहों के बयान लिए गए।
और फिर वह दिन आया जिसने पूरे मामले की दिशा बदल दी।
अदालत में एक बुज़ुर्ग बैंक कर्मचारी को बुलाया गया।
उसने रिकॉर्ड दिखाया कि जिस दिन कथित बिक्री हुई थी, उसी दिन रामकली अस्पताल में भर्ती थीं।
वह घर से बाहर निकली ही नहीं थीं।
पूरा कोर्टरूम सन्न रह गया।
जज ने सुरेश की ओर देखा।
“क्या कहना है तुम्हारे पास?”
सुरेश के पास कोई जवाब नहीं था।
उसका सिर झुक गया।
लेकिन असली झटका अभी बाकी था।
जाँच में पता चला कि उसने माँ के नाम पर कई और फर्जी दस्तावेज़ भी तैयार करवाए थे।
अब मामला सिर्फ जमीन का नहीं रहा था।
धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोप भी जुड़ गए थे।
आखिरी सुनवाई के दिन अदालत लोगों से भरी हुई थी।
जज ने फैसला पढ़ना शुरू किया।
“यह सिद्ध हो चुका है कि संपत्ति की बिक्री अवैध और फर्जी दस्तावेज़ों के आधार पर की गई। इसलिए यह सौदा तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाता है।”
रामकली ने आँखें बंद कर लीं।
मानो वर्षों का बोझ उतर गया हो।
लेकिन फैसला यहीं खत्म नहीं हुआ।
जज ने सुरेश की ओर देखते हुए कहा,
“जिस व्यक्ति ने अपनी ही माँ के साथ धोखा किया हो, वह समाज के लिए गलत उदाहरण है। कानून ऐसे अपराध को हल्के में नहीं ले सकता।”
सुरेश के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दे दिए गए।
कोर्ट से बाहर निकलते समय गाँव के लोग रामकली के पास आए।
कई लोगों की आँखें नम थीं।
एक महिला बोली,
“ताई, आपने बहुत हिम्मत दिखाई।”
रामकली मुस्कुराईं।
“हिम्मत तो हालात ने दे दी बेटी। अगर मैं चुप बैठ जाती, तो सच हार जाता और गलत जीत जाता। इसलिए अपने हक़ और अपने स्वाभिमान के लिए खड़ा होना पड़ा।”
उसी समय सुरेश रोता हुआ उनके पास आया।
वह उनके पैरों में गिर गया।
“अम्मा, मुझे माफ कर दो।”
रामकली काफी देर तक उसे देखती रहीं।
फिर बोलीं,
“माफी माँगने से पहले एक बार यह जरूर सोच लेना चाहिए था कि जिस माँ ने तुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिसने खुद ठोकरें खाकर तेरा रास्ता आसान बनाया, उसी माँ को गिराने की कोशिश तू कैसे कर सकता था?”
सुरेश फूट-फूटकर रोने लगा।
रामकली ने उसे उठाया जरूर, लेकिन इस बार उनके चेहरे पर पहले वाली ममता के साथ एक सीख भी थी।
उन्होंने कहा,
“बेटा, धन-दौलत खो जाने पर इंसान मेहनत करके उसे फिर से पा सकता है। लेकिन अगर चरित्र और इंसानियत खो जाए, तो दुनिया की सारी दौलत भी उसे सचमुच अमीर नहीं बना सकती।”
उस दिन गाँव के लोगों ने एक बात हमेशा के लिए याद रखी—
माँ बूढ़ी हो सकती है, कमजोर दिख सकती है, लेकिन उसके आत्मसम्मान को कभी कमजोर मत समझो। जिसने पूरी जिंदगी परिवार के लिए संघर्ष किया हो, उसके अधिकार छीनने वाला अंत में खुद ही सब कुछ खो देता है।

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