दहेज के लालच में खोया दूल्हा
“कई बार इंसान यह सोच लेता है कि पैसे की ताकत से हर रिश्ता खरीदा जा सकता है। उसे लगता है कि जिसके पास धन है, वही दूसरों की किस्मत का फैसला कर सकता है। लेकिन समय जब न्याय करता है, तब पता चलता है कि सम्मान और आत्मसम्मान की कीमत किसी दौलत से नहीं चुकाई जा सकती...”
नेहा अपने कमरे में बैठी कुछ फाइलें देख रही थी। तभी उसके पिता महेश बाबू कमरे में आए और उसके सामने कुर्सी पर बैठ गए।
“बेटी, एक बात कहूँ?”
नेहा मुस्कुराई।
“जी पापा, कहिए।”
महेश बाबू ने गहरी सांस ली।
“तुम अब अट्ठाईस साल की हो गई हो। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा घर भी बस जाए।”
नेहा ने फाइल बंद कर दी।
“पापा, फिर वही बात?”
“बेटा, मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ। हर पिता चाहता है कि उसकी बेटी को एक अच्छा जीवनसाथी मिले।”
नेहा धीरे से बोली,
“मुझे शादी से कोई परेशानी नहीं है पापा। लेकिन मैं ऐसे घर में नहीं जाऊँगी जहाँ मुझे बहू नहीं, एटीएम समझा जाए।”
महेश बाबू चुप हो गए।
उन्हें पता था कि नेहा ऐसा क्यों कह रही है।
एक साल पहले उसका रिश्ता तय हुआ था।
लड़के वालों ने पहले कहा था कि उन्हें कुछ नहीं चाहिए।
लेकिन सगाई के बाद उन्होंने कार, सोना और नकद पैसों की मांग शुरू कर दी थी।
तब नेहा ने खुद वह रिश्ता तोड़ दिया था।
महेश बाबू बोले,
“सभी लोग ऐसे नहीं होते बेटा।”
“मुझे पता है पापा। इसलिए मैं इंतजार कर रही हूँ।”
महेश बाबू कुछ नहीं बोले।
उनकी पत्नी का कई साल पहले निधन हो चुका था।
उन्होंने ही दोनों बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा किया था।
बेटा राहुल अपनी नौकरी के कारण दूसरे शहर में रहता था।
घर में सिर्फ महेश बाबू और नेहा ही रहते थे।
इधर कई महीनों से महेश बाबू की तबीयत भी ठीक नहीं रहती थी।
उन्हें अपनी बेटी की चिंता खाए जा रही थी।
कुछ दिनों बाद उनके पुराने मित्र सुरेश जी उनसे मिलने आए।
बातों-बातों में उन्होंने एक लड़के का जिक्र किया।
“महेश, मेरे पड़ोस में एक परिवार रहता है। लड़का बैंक में अधिकारी है। परिवार भी अच्छा है। चाहो तो बात चला दूँ।”
महेश बाबू की आँखों में उम्मीद चमक उठी।
उन्होंने तुरंत हामी भर दी।
लड़के का नाम विकास था।
शुरुआती बातचीत बहुत अच्छी रही।
विकास के पिता हरिशंकर जी और माँ कमला देवी बेहद सादगी से बात करते थे।
उन्होंने बार-बार कहा,
“हमें कुछ नहीं चाहिए। बस अच्छे संस्कारों वाली लड़की चाहिए।”
यह सुनकर महेश बाबू की चिंता काफी कम हो गई।
नेहा ने भी विकास से बात की।
विकास समझदार और विनम्र लगा।
कुछ मुलाकातों के बाद दोनों परिवारों ने शादी तय कर दी।
घर में खुशियों का माहौल था।
लेकिन किसी को यह पता नहीं था कि विकास के ताऊजी रघुवीर इस रिश्ते से बिल्कुल खुश नहीं थे।
रघुवीर स्वभाव से बहुत लालची इंसान था। उसके लिए हर रिश्ते की कीमत पैसों से तय होती थी। जब उसे पता चला कि नेहा सरकारी नौकरी करती है और उसके पिता ने जीवन भर मेहनत करके अच्छी-खासी संपत्ति बनाई है, तो उसके मन में लालच जाग उठा।
एक दिन वह विकास के पिता हरिशंकर जी के पास बैठा और बोला,
“भाई साहब, आप भी कमाल करते हैं। लड़की सरकारी नौकरी करती है, उसके पिता ने पूरी जिंदगी कमाया है, और आप बिना कुछ लिए शादी करने जा रहे हैं?”
हरिशंकर जी ने उसकी बात सुनते ही नाराज होकर कहा,
“रघुवीर, यह शादी है, कोई सौदा नहीं। हमें लड़की के संस्कार और उसका स्वभाव चाहिए, उसका पैसा नहीं।”
लेकिन रघुवीर कहाँ मानने वाला था। उसने बात वहीं खत्म नहीं की। उसके मन में लालच इस कदर भर चुका था कि वह किसी भी तरह इस रिश्ते से फायदा उठाना चाहता था। धीरे-धीरे उसने विकास के मन में भी लालच के बीज बोने शुरू कर दिए। उसे विश्वास था कि अगर सही समय पर दबाव बनाया जाए, तो लड़की वाले मजबूरी में उनकी हर मांग मान लेंगे।
वह लगातार विकास के कान भरता रहा।
धीरे-धीरे विकास भी लालच में आ गया।
रघुवीर ने चालाकी से मुस्कुराते हुए कहा,
“देखो विकास, अभी किसी तरह की मांग मत रखना। शादी वाले दिन, जब बारात दरवाजे पर पहुँच जाए और सारी रस्में शुरू हो जाएँ, तब अपनी शर्त सामने रखना। उस समय लड़की वालों के लिए मना करना आसान नहीं होगा। अपनी इज्जत और समाज के डर से वे तुम्हारी हर बात मानने को मजबूर हो जाएँगे।”
विकास कुछ पल के लिए चुप हो गया।
उसे यह बात सही नहीं लग रही थी। उसके मन में हल्का-सा संकोच भी था। लेकिन रघुवीर लगातार उसे लालच भरी बातें समझाता रहा।
“अरे, ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता। लड़की सरकारी नौकरी करती है और उसके पिता ने भी काफी पैसा जोड़ा होगा। अगर अभी फायदा नहीं उठाया, तो बाद में पछताना पड़ेगा।”
विकास पहले हिचकिचाया, लेकिन धीरे-धीरे लालच उसके विवेक पर हावी होने लगा। आखिरकार उसने भी रघुवीर की बात मान ली और शादी के दिन अपनी मांग रखने की योजना बना ली।
उधर महेश बाबू अपनी हैसियत से बढ़कर शादी की तैयारियाँ कर रहे थे।
उन्होंने अपनी जमा-पूँजी तक निकाल ली।
बस यही चाहते थे कि बेटी खुशी से विदा हो जाए।
आखिर वह दिन आ गया।
पूरा विवाह स्थल मेहमानों से भरा हुआ था।
सभी रस्में खुशी-खुशी चल रही थीं।
नेहा दुल्हन बनकर तैयार बैठी थी।
तभी मंडप में अचानक हलचल मच गई।
विकास ने महेश बाबू को अलग बुलाया।
“अंकल जी, एक छोटी सी बात करनी थी।”
महेश बाबू मुस्कुराए।
“हाँ बेटा, कहो।”
विकास ने महेश बाबू को एक तरफ बुलाया और धीमी आवाज में कहा,
“अंकल जी, मैंने अब तक आपसे कोई मांग नहीं रखी, लेकिन आज मेरी एक छोटी-सी इच्छा है।”
महेश बाबू मुस्कुराते हुए बोले,
“अरे बेटा, बताओ। अगर मेरी सामर्थ्य में होगा तो जरूर पूरा करूँगा।”
विकास ने अपने दोस्तों की ओर देखते हुए कहा,
“मेरे सभी दोस्त अच्छी गाड़ियों में घूमते हैं। मैं भी चाहता हूँ कि शादी के बाद मेरी एक नई कार हो। और हाँ, अगर आप पंद्रह लाख रुपये की व्यवस्था भी कर दें तो भविष्य में कोई परेशानी नहीं होगी।”
विकास की बात सुनते ही महेश बाबू के चेहरे का रंग उड़ गया। उन्हें लगा मानो किसी ने उनके पैरों तले की जमीन खींच ली हो। उनकी आँखों की चमक पल भर में गायब हो गई।
काँपती हुई आवाज में वे बोले,
“बेटा... लेकिन तुम लोगों ने तो पहले ही कहा था कि तुम्हें दहेज में कुछ नहीं चाहिए।”
विकास बेपरवाही से मुस्कुराया और बोला,
“अंकल जी, समय के साथ ज़रूरतें बदल जाती हैं। आखिर समाज में हमारी भी एक प्रतिष्ठा है।”
यह सुनकर महेश बाबू पूरी तरह स्तब्ध रह गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस अचानक आई मुसीबत का सामना कैसे करें। उनकी निगाहें झुक गईं और माथे पर चिंता की गहरी लकीरें उभर आईं।
इसी बीच नेहा वहाँ पहुँच गई।
उसने सारी बातें सुन ली थीं।
उसका खून खौल उठा।
उसे अपने पिता का झुका हुआ सिर दिखाई दे रहा था।
विकास अपने दोस्तों के बीच खड़ा मुस्कुरा रहा था।
उसे पूरा भरोसा था कि लड़की वाले मजबूर होकर उसकी मांग मान लेंगे।
लेकिन अगले ही पल कुछ ऐसा हुआ जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
नेहा सबके सामने जाकर खड़ी हो गई।
उसने माइक हाथ में लिया।
पूरा हॉल शांत हो गया।
नेहा ने ऊँची आवाज में कहा,
“सभी लोग ध्यान से सुनिए।”
सबकी नजरें उसकी तरफ उठ गईं।
“यह शादी नहीं होगी।”
पूरा हॉल सन्न रह गया।
विकास चौंक गया।
“तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या?”
नेहा ने सबके सामने दृढ़ आवाज़ में कहा,
“दिमाग मेरा नहीं, तुम्हारा खराब हो गया है, विकास। जो इंसान शादी जैसे पवित्र रिश्ते को सौदा समझता हो, जो लड़की और उसके परिवार की मजबूरी का फायदा उठाकर पैसे मांगता हो, उससे मैं कभी शादी नहीं कर सकती। मेरे लिए आत्मसम्मान किसी भी रिश्ते से बड़ा है।”
विकास का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा।
वह ऊँची आवाज़ में बोला,
“नेहा, तुम्हें अंदाज़ा भी है कि तुम क्या कर रही हो? इतनी बड़ी बारात के सामने मेरी बेइज्जती कर रही हो!”
नेहा बिना डरे उसकी आँखों में देखते हुए बोली,
“हाँ, मुझे अच्छी तरह पता है कि मैं क्या कर रही हूँ। मैं अपने पिता के सम्मान की रक्षा कर रही हूँ। मैं उस लालच के सामने झुकने से इंकार कर रही हूँ, जो शादी के नाम पर दहेज मांगता है। अगर सच बोलना और अन्याय के खिलाफ खड़ा होना बेइज्जती है, तो मुझे ऐसी बेइज्जती मंजूर है।”
नेहा की बात सुनकर वहाँ मौजूद लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
कमला देवी घबराकर आगे बढ़ीं और रोते हुए बोलीं,
“बेटी, यह तुम क्या कर रही हो? छोटी-सी बात के लिए इतना बड़ा फैसला मत लो। शादी-ब्याह में ऐसी बातें हो जाती हैं।”
नेहा ने शांत लेकिन कठोर स्वर में कहा,
“आंटी, दहेज मांगना कोई छोटी बात नहीं होती। यह एक लड़की के सम्मान और उसके परिवार की मेहनत का अपमान है। जिस रिश्ते की शुरुआत लालच से हो, उसका अंत कभी सुखद नहीं हो सकता।”
लेकिन हरिशंकर जी का सिर शर्म से झुक गया।
उन्हें पहली बार अपने बेटे की सच्चाई समझ आई।
महेश बाबू की आँखों से आँसू बह रहे थे।
उन्होंने काँपती आवाज में कहा,
“बेटी, अब लोग क्या कहेंगे?”
नेहा ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“पापा, लोग दो दिन बातें करेंगे। लेकिन अगर आज मैं लालचियों के घर चली गई, तो जिंदगी भर रोऊँगी।”
इतने में भीड़ में से एक आवाज आई।
“नेहा बिल्कुल सही कह रही है।”
सबने मुड़कर देखा।
वह आदित्य था।
आदित्य महेश बाबू के पड़ोसी का बेटा था।
वह बचपन से नेहा को जानता था।
विदेश से पढ़ाई पूरी करके कुछ ही दिन पहले लौटा था।
आदित्य आगे बढ़ा और बोला,
“अंकल जी, अगर आपको और नेहा को मंजूर हो, तो मैं इस रिश्ते के लिए तैयार हूँ।”
सभी लोग स्तब्ध रह गए।
महेश बाबू ने आश्चर्य से पूछा,
“बेटा, तुम यह क्या कह रहे हो?”
आदित्य मुस्कुराया।
“मैं किसी एहसान की बात नहीं कर रहा। मैं नेहा का सम्मान करता हूँ। और जिस लड़की ने अपने पिता के सम्मान के लिए इतना बड़ा फैसला लिया हो, वह किसी भी घर की शान बन सकती है।”
नेहा हैरानी से उसे देखती रह गई।
आदित्य की माँ भी आगे आईं।
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
“भाई साहब, हमें आपकी दौलत नहीं चाहिए, न कोई दहेज और न ही कोई कीमती सामान। हमें तो बस ऐसी संस्कारी, स्वाभिमानी और समझदार बेटी चाहिए, जो हमारे घर को अपने प्यार और सम्मान से घर बना दे। और आज नेहा ने साबित कर दिया है कि वह ऐसी ही बेटी है।”
महेश बाबू की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।
उन्होंने हाथ जोड़ दिए।
लेकिन आदित्य की माँ ने तुरंत उनके हाथ पकड़ लिए।
“रिश्ते बराबरी से बनते हैं, हाथ जोड़कर नहीं।”
कुछ देर बाद पंडित जी ने फिर से मंत्र पढ़ने शुरू किए।
वहीं उसी मंडप में नेहा और आदित्य के फेरे हुए।
पूरा माहौल खुशी से भर गया।
जो लोग कुछ देर पहले दुखी थे, अब मुस्कुरा रहे थे।
उधर विकास और रघुवीर शर्म से सिर झुकाए खड़े थे।
उनकी लालच ने उन्हें समाज के सामने छोटा कर दिया था।
बाराती भी उनकी आलोचना कर रहे थे।
कई लोग कह रहे थे,
“जिस लड़की को पाने के लिए लोग तरसते हैं, उसे इन्होंने पैसों के लालच में खो दिया।”
उस दिन एक बात सबने अपनी आँखों से देख ली।
रिश्ते पैसे से नहीं, सम्मान से बनते हैं।
और जहाँ आत्मसम्मान की रक्षा की जाती है, वहाँ भगवान भी नए रास्ते खोल देता है।
कहानी की सीख:
दहेज लेकर बनने वाला रिश्ता कभी सच्चा नहीं होता। जो परिवार आपकी इज्जत और व्यक्तित्व को महत्व दे, वही वास्तव में आपका अपना परिवार बनने के योग्य होता है।

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