बाबूजी की पुरानी दुकान
"तुम समझ क्यों नहीं रहे हो, अमित? यह दुकान अब सिर्फ दीवारों और लकड़ी के पुराने काउंटर का ढेर है। इसे बेचकर हम नई जिंदगी शुरू कर सकते हैं।"
नेहा की आवाज़ में झुंझलाहट साफ दिखाई दे रही थी।
शाम के सात बजे थे।
बाजार की ज्यादातर दुकानें बंद हो चुकी थीं।
हल्की बारिश के बाद सड़क पर मिट्टी की सोंधी खुशबू फैली हुई थी।
अमित अपने पुश्तैनी घर के बरामदे में बैठा सामने खड़ी उस पुरानी किराना दुकान को देख रहा था, जिसके शटर पर अब जंग लगने लगी थी।
वह दुकान कभी पूरे इलाके की सबसे मशहूर दुकान हुआ करती थी।
लेकिन अब समय बदल चुका था।
बड़े-बड़े सुपरमार्केट खुल गए थे।
ऑनलाइन सामान घर तक पहुँचने लगा था।
और पिछले कई सालों से दुकान का कारोबार लगभग बंद हो चुका था।
"दिल्ली में फ्लैट बुक करने का यह सबसे अच्छा मौका है, अमित। बस बीस लाख रुपये की कमी है," नेहा ने समझाते हुए कहा।
"अगर हम यह पुरानी दुकान और पीछे की खाली जमीन बेच दें, तो न सिर्फ वह कमी पूरी हो जाएगी, बल्कि हमारी कई दूसरी परेशानियाँ भी खत्म हो जाएँगी। अपना घर होगा, भविष्य सुरक्षित होगा और हमें हर महीने किराए की चिंता भी नहीं करनी पड़ेगी।"
अमित ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसकी नजर दुकान के ऊपर लगे फीके पड़ चुके बोर्ड पर टिक गई।
उस पर आज भी बड़े अक्षरों में लिखा था—
"रामप्रसाद जनरल स्टोर"
यह उसके बाबूजी का नाम था।
अमित के पिता रामप्रसाद जी।
एक साधारण दुकानदार।
लेकिन असाधारण इंसान।
उसी समय आंगन में उसके बड़े भाई सुरेश आ गए।
उनके कपड़ों पर आटे की सफेद धूल लगी हुई थी।
वे पास की छोटी आटा चक्की में काम करते थे।
पचास साल की उम्र में भी उनके चेहरे पर संघर्ष की लकीरें साफ दिखती थीं।
"क्या सोच रहा है छोटू?" सुरेश ने मुस्कुराते हुए पूछा।
अमित ने नजरें झुका लीं।
उसे पता था कि अगर दुकान बेचने की बात खुली, तो भाई का दिल टूट जाएगा।
रात को खाना खाते समय नेहा ने बात छेड़ ही दी।
"भैया, आज एक प्रॉपर्टी डीलर आया था।"
सुरेश ने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा।
"क्यों?" सुरेश के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं।
नेहा ने एक पल रुककर कहा, "आज एक प्रॉपर्टी डीलर आया था... वह बाबूजी की पुरानी दुकान खरीदने का प्रस्ताव लेकर आया है।"
पूरा कमरा अचानक शांत हो गया।
सुरेश के हाथ में पकड़ी रोटी जैसे वहीं रुक गई।
"दुकान खरीदना चाहता है?" उन्होंने धीमे स्वर में पूछा।
"हाँ," नेहा बोली।
"और बहुत अच्छा पैसा दे रहा है।"
कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर सुरेश ने धीरे से पानी पिया और मुस्कुराने की कोशिश की।
"अच्छी बात है।"
लेकिन उनकी मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँच पाई।
अमित समझ गया कि भाई को चोट लगी है।
रात देर तक उसे नींद नहीं आई।
करीब बारह बजे वह घर से बाहर निकल आया।
बरसात रुक चुकी थी।
चांद बादलों के बीच छिपता-निकलता जा रहा था।
वह दुकान के सामने जाकर खड़ा हो गया।
उसे अचानक बचपन की एक घटना याद आ गई।
वह सातवीं कक्षा में पढ़ता था।
स्कूल की फीस जमा करने की आखिरी तारीख थी।
घर में पैसे नहीं थे।
उस दिन बाबूजी ने पूरी रात दुकान खोली थी।
सुबह चार बजे तक ग्राहकों को सामान बेचते रहे।
फिर भी पैसे पूरे नहीं हुए।
तब सुरेश भैया ने अपनी नई साइकिल बेच दी थी।
वही साइकिल जिसके लिए उन्होंने दो साल तक पैसे जोड़े थे।
उस दिन अमित की फीस भरी गई थी।
और वह पढ़ाई जारी रख पाया था।
अमित की आँखें भर आईं।
अगली सुबह वह दुकान का ताला खोलकर अंदर चला गया।
अंदर धूल जमी हुई थी।
पुराने लकड़ी के रैक खाली पड़े थे।
एक कोने में बाबूजी की पुरानी कुर्सी रखी थी।
कुर्सी के पास एक लोहे का संदूक रखा था।
अमित ने उत्सुकता से उसे खोला।
अंदर पुराने कागज, रसीदें और कुछ डायरियाँ रखी थीं।
उसने एक डायरी खोली।
पहले ही पन्ने पर बाबूजी की लिखावट थी—
"अगर मेरे बच्चे कभी इस दुकान को बेकार समझने लगें, तो उन्हें यह जरूर याद दिलाना कि यह दुकान सिर्फ कमाई का जरिया नहीं थी। इसी ने उनके सपनों को खाना खिलाया है।"
अमित का दिल जोर से धड़कने लगा।
उसने आगे पढ़ना शुरू किया।
डायरी के हर पन्ने में एक कहानी थी।
किसी गरीब परिवार को उधार दिया गया राशन।
किसी छात्र की फीस के लिए की गई मदद।
किसी बीमार पड़ोसी के इलाज में दिया गया पैसा।
और सबसे ज्यादा बार एक नाम लिखा था—
"सुरेश"
"आज सुरेश ने फिर अपनी जरूरत छोड़कर अमित की किताबें खरीदीं।"
"आज सुरेश कॉलेज नहीं गया ताकि दुकान संभाल सके और अमित को पढ़ने का समय मिल सके।"
"अगर कभी अमित बड़ा आदमी बने, तो उसे बताना कि उसकी सफलता में सबसे बड़ा हिस्सा उसके बड़े भाई का है।"
डायरी पढ़ते-पढ़ते अमित की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि वह जिस सफलता पर गर्व करता है, उसकी नींव कितने त्यागों पर खड़ी है।
शाम को प्रॉपर्टी डीलर फिर आया।
सभी लोग बैठक में बैठे थे।
डीलर ने मुस्कुराते हुए फाइल आगे बढ़ाई।
"बस एक साइन की देर है, अमित जी।"
नेहा भी उत्साहित थी।
सुरेश चुपचाप बैठे थे।
अमित ने फाइल खोली।
पेन हाथ में लिया।
कुछ पल तक कागज को देखता रहा।
फिर अचानक उसने फाइल बंद कर दी।
"माफ कीजिए। यह दुकान नहीं बिकेगी।"
डीलर चौंक गया।
"लेकिन क्यों?"
अमित खड़ा हो गया।
उसकी आँखों में नमी थी।
"क्योंकि यह दुकान घाटे का सौदा नहीं है।"
सब हैरानी से उसे देखने लगे।
अमित ने सुरेश की ओर देखा।
"जिस दुकान ने मेरी पढ़ाई का खर्च उठाया, जिस छत ने मेरे सपनों को टूटने नहीं दिया, और जिस काउंटर के पीछे खड़े होकर मेरे भाई ने अपने सपनों की कुर्बानी दी... उसे मैं पैसों के तराजू में नहीं तौल सकता। वह सिर्फ एक दुकान नहीं, हमारे परिवार के त्याग, संघर्ष और प्रेम की सबसे बड़ी निशानी है।"
सुरेश की आँखें भर आईं।
अमित ने अपनी आँखों के आँसू पोंछे और आत्मविश्वास से भरी आवाज़ में कहा,
"अगर यह दुकान आज बंद पड़ी है, तो इसका मतलब यह नहीं कि इसकी कहानी खत्म हो गई है। इसे बेचने की नहीं, फिर से खड़ा करने की जरूरत है।"
नेहा ने हैरानी से उसकी ओर देखा।
"लेकिन कैसे?" उसने धीमे स्वर में पूछा।
अमित के होंठों पर हल्की मुस्कान उभर आई।
"समय बदल गया है, नेहा... और हमें भी समय के साथ चलना होगा।"
वह कुछ पल रुका, फिर उत्साह से बोला,
"हम इस दुकान को पुराने तरीके से नहीं, नए तरीके से चलाएंगे। बाबूजी की ईमानदारी और भरोसे को आधुनिक सोच के साथ जोड़ेंगे। यह सिर्फ एक दुकान नहीं होगी, बल्कि हमारे परिवार की पहचान बनेगी।"
उसकी आँखों में एक नया सपना चमक रहा था, और पहली बार नेहा को लगा कि शायद यह पुरानी दुकान सचमुच एक नई शुरुआत बन सकती है।
"आज लोग शुद्ध सामान खोज रहे हैं। गाँव का घी, अचार, पापड़, मसाले... हम ऑनलाइन बेचेंगे।"
"मैं वेबसाइट बनाऊँगा।"
"नेहा मार्केटिंग संभालेगी।"
"और भैया पूरे काम के मालिक होंगे।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सुरेश रो पड़े।
उन्होंने अमित को गले लगा लिया।
"पगले... मालिक तो तू है।"
अमित ने सिर हिलाया।
"नहीं भैया। मालिक वह होता है जो बीज बोता है। मैं तो सिर्फ उस पेड़ का फल हूँ जिसे आपने और बाबूजी ने सींचा था।"
उस दिन कोई संपत्ति नहीं बिकी।
लेकिन एक परिवार फिर से जुड़ गया।
और कई बार रिश्तों की सबसे बड़ी कमाई बैंक खाते में नहीं, बल्कि उन लोगों की आँखों में दिखती है जिन्होंने हमारे लिए अपने सपने अधूरे छोड़ दिए होते हैं।

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