जब बहू ने सोच बदल दी
"शादी के पाँचवें दिन बहू ने पूरे घर की रसोई का सामान अपनी मर्ज़ी से बदलवा दिया... रिश्तेदारों ने कहा – 'अभी से घर पर कब्ज़ा करने लगी।' लेकिन ससुर जी ने जब असली वजह बताई, तो सबकी आँखें झुक गईं।"
घर के आँगन में बैठे रिश्तेदारों की बातें अचानक रुक गईं।
सभी की नज़र रसोई की ओर चली गई।
पुराने स्टील के डिब्बे हटाए जा रहे थे।
मसालों की जगह बदल रही थी।
भारी-भरकम डिब्बों की जगह छोटे-छोटे पारदर्शी डिब्बे रखे जा रहे थे।
गैस के पास एक छोटी-सी कुर्सी भी रखी जा चुकी थी।
इतने में बड़ी ताई जी ने भौंहें चढ़ाकर कहा,
"अरे, अभी पाँच दिन पहले ही तो इस घर में आई है... और रसोई का पूरा नक्शा बदल दिया।"
चाची ने भी बात बढ़ा दी।
"आज रसोई बदली है... कल पूरा घर बदल देगी।"
कुछ रिश्तेदार मुस्कुराने लगे।
कुछ ने धीरे-धीरे फुसफुसाना शुरू कर दिया।
मेरी पत्नी भी असमंजस में थीं।
उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि बहू को रोकें या पहले वजह पूछें।
बहू किसी से बहस नहीं कर रही थी।
वह मजदूरों के साथ मिलकर हर सामान बड़े ध्यान से सजा रही थी।
तभी मेरी पत्नी मेरे पास आईं।
"ज़रा चलिए... आपकी बहू ने तो बिना पूछे पूरा किचन बदलवा दिया।"
मैं रसोई तक गया।
बहू ने मुझे देखते ही हाथ जोड़ दिए।
"पापा जी... अगर आपको अच्छा न लगे तो सब पहले जैसा करवा देती हूँ।"
मैंने मुस्कुराकर पूछा,
"एक बात बताओ बेटा... ऐसा करने की वजह क्या है?"
उसने झिझकते हुए मेरी पत्नी की ओर देखा।
फिर धीमे स्वर में बोली,
"माँ जी रोज़ खाना बनाते समय बार-बार झुकती हैं।"
"भारी डिब्बे ऊपर रखे हैं, इसलिए उन्हें बार-बार स्टूल पर चढ़ना पड़ता है।"
"कल मैंने देखा था कि उनका पैर फिसलते-फिसलते बचा।"
"रात को उनके घुटनों में दर्द भी था।"
"मैं पेशे से इंटीरियर डिज़ाइनर हूँ।"
"हमें सिखाया जाता है कि घर सिर्फ सुंदर नहीं, रहने वालों के लिए आरामदायक भी होना चाहिए।"
"इसलिए मैंने सोचा कि रसोई ऐसी हो जहाँ माँ जी को कम मेहनत करनी पड़े।"
पूरा आँगन एकदम शांत हो गया।
बहू आगे बोली,
"ऊपर वाले डिब्बों में अब हल्का सामान रखा है।"
"रोज़ इस्तेमाल होने वाला सामान नीचे है।"
"यह छोटी कुर्सी इसलिए रखी है ताकि माँ जी खड़े-खड़े थक जाएँ तो बैठकर सब्ज़ी काट सकें।"
"और ये पारदर्शी डिब्बे इसलिए हैं ताकि बिना खोले ही पता चल जाए कि क्या खत्म होने वाला है।"
मेरी पत्नी की आँखें भर आईं।
उन्हें याद आया कि घुटनों के दर्द की बात उन्होंने किसी से नहीं कही थी।
सिर्फ एक दिन दर्द से कराह उठी थीं।
और उस एक बात को नई बहू ने चुपचाप याद रख लिया।
इतने में ताई जी बोलीं,
"लेकिन बिना पूछे करना ठीक तो नहीं था।"
मैंने पहली बार सबकी ओर देखकर कहा,
"अगर यह बदलाव अपने आराम के लिए होता तो शायद मैं भी नाराज़ होता।"
"यह बदलाव अपनी सहूलियत के लिए नहीं, इस घर की गृहलक्ष्मी की तकलीफ़ कम करने के लिए किया गया है। मेरी पत्नी वर्षों से इस रसोई में खड़ी होकर काम कर रही हैं। अगर मेरी बहू ने उनका दर्द समझ लिया, तो मैं उसे रोकूँ या उसका धन्यवाद करूँ?"
सभी चुप थे।
मैंने आगे कहा,
"हम लोग सालों से इस रसोई में रह रहे थे।"
"किसी ने यह नहीं देखा कि रोज़ खाना बनाने वाली औरत को कितनी परेशानी होती है।"
"जिस लड़की को इस घर में आए पाँच दिन हुए हैं, उसने यह बात देख ली।"
"कब्ज़ा घर पर नहीं किया जाता..."
"कब्ज़ा तो दिल पर किया जाता है।"
"और आज इसने हम सबका दिल जीत लिया है।"
रिश्तेदारों के पास कोई जवाब नहीं था।
ताई जी धीरे-धीरे रसोई में गईं।
उन्होंने एक डिब्बा उठाया।
फिर मुस्कुराकर बोलीं,
"सच में... अब तो बिना झुके ही सब मिल जा रहा है।"
चाची ने भी कुर्सी पर बैठकर सब्ज़ी काटकर देखी।
वह हँसते हुए बोलीं,
"अरे, यह तो हमने कभी सोचा ही नहीं था।"
मेरी पत्नी बहू के पास आईं।
उन्होंने उसका हाथ पकड़कर कहा,
"बेटा... तुमने रसोई नहीं बदली..."
"तुमने मेरी रोज़ की तकलीफ़ कम कर दी।"
बहू की आँखों से आँसू निकल पड़े।
वह बोली,
"माँ जी... मेरी माँ कहती हैं कि जिस घर की रसोई संभालने वाली औरत खुश रहती है, उस घर में बरकत अपने आप आती है।"
मैंने मुस्कुराकर कहा,
"आज इस घर में सिर्फ सामान की जगह नहीं बदली..."
"सोच की जगह भी बदल गई है।"
उस दिन के बाद जब भी कोई नया मेहमान हमारे घर आता और रसोई की तारीफ़ करता, मेरी पत्नी गर्व से कहतीं,
"यह सब मेरी बहू की समझदारी है।"
और हर बार मैं मन ही मन यही सोचता—
घर पर अधिकार जताने वाले लोग बदलाव अपने लिए करते हैं, लेकिन घर को अपना मानने वाले बदलाव पूरे परिवार की भलाई के लिए करते हैं।

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