रिश्तों की असली चमक सोने में नहीं, भरोसे में होती है
सुबह के सात बजे थे। पूरे घर में हलचल मची हुई थी। रसोई से बर्तनों की आवाज़ें आ रही थीं और आंगन में रिश्तेदारों के आने-जाने की तैयारियां चल रही थीं।
लेकिन घर की बड़ी बहू पूजा के चेहरे पर खुशी नहीं थी।
वह अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी थी और सामने रखे सूटकेस को देख रही थी।
उसकी आंखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
तभी उसकी देवरानी काव्या कमरे में आई।
"दीदी, आप अभी तक तैयार नहीं हुईं? मेहमान आने शुरू हो गए हैं।"
पूजा ने धीमी आवाज़ में कहा,
"मन नहीं कर रहा।"
काव्या हैरान रह गई।
"क्यों? आज तो आपकी और भैया की शादी की दसवीं सालगिरह है।"
पूजा हल्का सा मुस्कुराई लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द था।
"कुछ नहीं। बस ऐसे ही।"
काव्या समझ गई कि बात कुछ और है।
उसने पास आकर पूछा,
"दीदी, मुझे बताइए क्या हुआ है?"
पूजा कुछ पल चुप रही।
फिर उसने गहरी सांस ली और धीमे स्वर में कहा,
"काव्या, तुम्हें मम्मी जी की वो पुरानी सोने की चूड़ियां याद हैं न? वही, जो उन्हें उनकी सास यानी दादी जी ने मुंह दिखाई में दी थीं और जिन्हें वो अपनी सबसे कीमती निशानी मानती हैं।"
काव्या ने सिर हिलाया।
"हाँ दीदी, बिल्कुल याद हैं। मम्मी जी तो उन चूड़ियों का ज़िक्र करते हुए हमेशा भावुक हो जाती हैं। आखिर बात क्या है?"
पूजा की आंखें नम हो गईं।
"बस... उन्हीं चूड़ियों को लेकर मेरे मन में एक बात खटक रही है।"
पूजा की आवाज़ भर्रा गई।
"मम्मी जी ने हमेशा मुझसे कहा था कि एक दिन दादी जी की वो सोने की चूड़ियां मुझे देंगी क्योंकि मैं इस घर की बड़ी बहू हूं। उनका कहना था कि वो सिर्फ गहना नहीं, बल्कि इस परिवार की निशानी हैं।"
काव्या ध्यान से उसकी बात सुन रही थी।
"फिर क्या हुआ, दीदी?" उसने धीरे से पूछा।
पूजा ने एक गहरी सांस ली।
"दो दिन पहले मैं अलमारी साफ कर रही थी। तभी मेरी नजर उस डिब्बे पर गई जिसमें चूड़ियां रखी रहती थीं। लेकिन डिब्बा खाली था।"
"खाली?" काव्या के मुंह से अनायास निकला।
"हाँ," पूजा ने फीकी मुस्कान के साथ कहा, "पहले तो मुझे लगा शायद मम्मी जी ने कहीं और रख दी होंगी। मैंने इस बारे में ज्यादा नहीं सोचा।"
"फिर?"
"कल बुआ जी आई थीं। बातों-बातों में उन्होंने कहा कि मम्मी जी ने वो चूड़ियां तुम्हें दे दी हैं।"
यह सुनते ही काव्या कुछ पल के लिए चुप हो गई।
पूजा की आंखें नम हो गईं।
"सच कहूं काव्या, मुझे चूड़ियों का इतना दुख नहीं हुआ... दुख इस बात का हुआ कि मम्मी जी ने मुझे एक बार भी नहीं बताया। मुझे लगा शायद अब मैं उनके लिए उतनी महत्वपूर्ण नहीं रही।"
इतना कहकर पूजा की आंखों से आंसू निकल पड़े।
काव्या कुछ कहना चाहती थी लेकिन तभी उसका फोन बज गया।
उसने जल्दी से फोन उठाया और कमरे से बाहर चली गई।
पूजा को लगा कि शायद सचमुच वही बात है जिससे वह बचना चाह रही थी।
उसे लगा कि अब उसकी अहमियत कम हो रही है।
दस साल से वह इस घर को संभाल रही थी।
सास-ससुर की सेवा, रिश्तेदारों की देखभाल, बच्चों की जिम्मेदारी, घर का हर काम।
लेकिन अब शायद नई बहू सबकी पसंद बन गई थी।
अगले दो दिन पूजा का मन बुझा-बुझा रहा।
वह सब काम करती लेकिन पहले जैसी बात नहीं रही।
सास, शारदा देवी, कई बार पूछतीं,
"सब ठीक है न बहू?"
और पूजा हर बार यही कह देती,
"जी।"
आखिर सालगिरह का दिन आ गया।
घर फूलों से सजा हुआ था।
दोपहर में परिवार के सभी लोग इकट्ठा हुए।
तभी शारदा देवी ने सबको हॉल में बुलाया।
"मुझे एक जरूरी बात करनी है।"
सभी लोग बैठ गए।
पूजा भी चुपचाप एक कोने में बैठ गई।
शारदा देवी ने मुस्कुराते हुए कहा,
"आज मैं अपनी बड़ी बहू पूजा को एक खास उपहार देना चाहती हूं।"
इतना कहकर उन्होंने काव्या को आवाज़ दी।
"बेटा, वो डिब्बा लेकर आओ।"
काव्या अंदर गई और एक सुंदर लकड़ी का डिब्बा लेकर आई।
उसे देखकर पूजा का दिल तेजी से धड़कने लगा।
वह वही डिब्बा था जिसमें चूड़ियां रखी जाती थीं।
शारदा देवी ने डिब्बा खोला।
अंदर वही सोने की पुरानी चूड़ियां थीं।
लेकिन अब वे पहले से कहीं ज्यादा सुंदर लग रही थीं।
उन पर नई नक्काशी की गई थी और टूटी हुई जगहें बिल्कुल गायब थीं।
पूजा हैरान रह गई।
"ये...?"
शारदा देवी मुस्कुराईं।
"कुछ महीने पहले मैंने देखा कि चूड़ियां कई जगह से कमजोर हो गई थीं। मुझे डर था कि कहीं टूट न जाएं।"
उन्होंने काव्या की ओर देखा।
"तब मैंने इन्हें काव्या को दिया था।"
पूजा ने आश्चर्य से काव्या की तरफ देखा।
शारदा देवी बोलीं,
"काव्या के मामा ज्वेलरी डिजाइनर हैं। मैंने उससे कहा था कि चूड़ियों को ठीक करवा दो।"
काव्या हंस पड़ी।
"और मैंने सोचा था कि इसे सरप्राइज बनाएंगे।"
उसने आगे कहा,
"दीदी, पिछले दो हफ्तों से मैं इसी काम में लगी हुई थी। हर डिजाइन खुद चुनकर बनवाया है।"
पूजा की आंखें भर आईं।
"मतलब... चूड़ियां मुझे देने के लिए तैयार की जा रही थीं?"
"और किसके लिए?" काव्या मुस्कुराई।
"मम्मी जी तो रोज कहती थीं कि ये पूजा दीदी की अमानत हैं।"
पूजा को अपनी सोच पर शर्म आने लगी।
जिस लड़की को वह अपनी जगह लेने वाली समझ रही थी, वही उसके लिए मेहनत कर रही थी।
शारदा देवी ने चूड़ियां उठाईं और पूजा के हाथों में पहना दीं।
"बहू, रिश्ते भरोसे से चलते हैं। कई बार आधी बात सुनकर हम पूरी कहानी खुद बना लेते हैं।"
पूजा रो पड़ी।
उसने काव्या का हाथ पकड़ लिया।
"मुझे माफ़ कर दो, काव्या। मैंने बिना पूरी बात जाने अपने मन में कितनी गलतफहमियाँ पाल ली थीं। मैं सच जाने बिना ही दुखी होती रही।"
काव्या मुस्कुराई और बोली,
"तो फिर एक शर्त पर माफ़ी मिलेगी।"
"क्या?" पूजा ने पूछा।
"आज के बाद मुझे सिर्फ देवरानी नहीं, अपनी छोटी बहन मानोगी। क्योंकि बहनों के बीच गलतफहमियाँ हो सकती हैं, लेकिन दिलों में दूरियाँ नहीं होनी चाहिए।"
पूजा ने तुरंत उसे गले लगा लिया।
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
शाम को जब मेहमानों ने पूजा के हाथों में चमकती चूड़ियां देखीं तो सब उनकी तारीफ करने लगे।
एक रिश्तेदार ने पूछा,
"बहू, ये चूड़ियां इतनी सुंदर किसने बनवाईं?"
पूजा मुस्कुराई।
उसने गर्व से काव्या का हाथ पकड़कर अपने पास खड़ा किया और कहा,
"ये सिर्फ चूड़ियां नहीं हैं। इनमें मेरी छोटी बहन का प्यार और मेहनत छिपी है।"
काव्या की आंखें चमक उठीं।
दूर खड़ी शारदा देवी दोनों को देख रही थीं।
उनके चेहरे पर संतोष था।
उन्हें महसूस हो रहा था कि परिवार की सबसे बड़ी जीत संपत्ति बांटने में नहीं, बल्कि दिल जोड़ने में होती है।
उस दिन पूजा को सिर्फ चूड़ियां नहीं मिली थीं।
उसे एक ऐसा रिश्ता मिला था जो खून का नहीं था, लेकिन सगे रिश्तों से भी ज्यादा मजबूत था।
और उसे समझ आ गया था कि घर में किसी नए सदस्य के आने से किसी की जगह नहीं छिनती।
अगर दिल में अपनापन हो, तो परिवार में जगह कम नहीं पड़ती, बल्कि प्यार और बढ़ जाता है।

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