अपना घर, अपना सम्मान
सुबह के आठ बजे थे। रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी। सीमा बालकनी में खड़ी कपड़े सुखा रही थी, जबकि उसके पति निखिल लैपटॉप पर नौकरी के लिए आवेदन भेज रहे थे।
पिछले छह महीने से निखिल की नौकरी छूट चुकी थी। बचत लगभग खत्म हो चुकी थी और किराए के मकान का बोझ दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था।
तभी सीमा का फोन बजा।
"हैलो दीदी!"
दूसरी तरफ उसकी बड़ी बहन सुजाता थी।
"सीमा, मैंने और तुम्हारे जीजाजी ने सोच लिया है। जब तक निखिल को नई नौकरी नहीं मिल जाती, तुम लोग हमारे साथ आकर रहो। इतना बड़ा घर है, खाली ही पड़ा रहता है।"
सीमा की आंखें चमक उठीं।
"सच दीदी?"
"हाँ, बिल्कुल। परिवार ऐसे समय में ही काम आता है।"
शाम को सीमा ने उत्साहित होकर यह बात निखिल को बताई।
लेकिन निखिल उतना खुश नहीं दिखा।
"सीमा, मुश्किल समय में अपनों का सहारा लेना गलत नहीं है," निखिल ने शांत स्वर में कहा, "लेकिन किसी के घर कुछ दिन मेहमान बनकर रहना और लंबे समय तक वहीं रहना, दोनों अलग बातें हैं।"
सीमा ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, "आप भी ना, हर बात को लेकर बेवजह चिंता करने लगते हो। वो मेरी सगी दीदी हैं, कोई पराए थोड़ी हैं।"
निखिल ने उसकी तरफ देखते हुए कहा, "मुझे पता है कि वो तुम्हारी दीदी हैं और दिल से हमारी मदद करना चाहती हैं। लेकिन फिर भी सच यही है कि अपना घर, अपना होता है और दूसरे का घर, चाहे कितना भी अपना क्यों न लगे, आखिर दूसरे का ही होता है।"
सीमा ने उसकी बात को हँसी में टाल दिया। उसे पूरा विश्वास था कि अपनी बहन के घर में उसे कभी किसी तरह की परेशानी महसूस नहीं होगी।
कुछ दिनों बाद वे अपना सामान लेकर सुजाता और उसके पति राघव के बड़े बंगले में शिफ्ट हो गए।
शुरुआत बहुत अच्छी रही।
सुजाता हर सुबह पूछती, "नाश्ते में क्या खाओगे?"
राघव हँसते हुए कहते, "निखिल, नौकरी की चिंता छोड़ो। आराम से तैयारी करो।"
बच्चे भी खुश थे।
सीमा को लगने लगा कि निखिल बेकार में चिंतित था।
लेकिन धीरे-धीरे चीजें बदलने लगीं।
एक दिन निखिल इंटरव्यू की तैयारी कर रहा था।
तभी राघव आए।
"यार निखिल, अगर बुरा न मानो तो अपना सामान स्टडी रूम से हटा लो। आज मेरे कुछ बिजनेस क्लाइंट आने वाले हैं।"
"जी, बिल्कुल।"
निखिल ने मुस्कुराकर सामान हटा लिया।
लेकिन उसके बाद उसे अपने कमरे के एक छोटे कोने में बैठकर काम करना पड़ा।
फिर एक दिन सीमा ने सोचा कि वह सबके लिए अपने हाथों से खीर बनाएगी।
वह रसोई में गई।
लेकिन सुजाता ने कहा,
"अरे रहने दो। मैंने डाइट चार्ट के हिसाब से खाना बनवाया है। आज मीठा नहीं बनेगा।"
सीमा चुप हो गई।
धीरे-धीरे उसे महसूस होने लगा कि घर में हर फैसला पहले से तय होता है।
वह बस एक मेहमान थी।
एक शाम बिजली का बिल आया।
राघव ने हँसते हुए कहा,
"लगता है इस बार एसी कुछ ज्यादा ही चला है।"
बात मजाक में कही गई थी, लेकिन निखिल को अच्छा नहीं लगा।
उसने कुछ नहीं कहा।
समय बीतता गया।
एक दिन निखिल को आखिरकार नौकरी मिल गई।
वह बहुत खुश था।
लेकिन उसने अभी यह बात किसी को नहीं बताई।
उसी शाम एक घटना हुई।
सीमा का बेटा विवान खेलते-खेलते ड्राइंग रूम में रखे महंगे शोपीस से टकरा गया।
शोपीस नीचे गिरकर टूट गया।
आवाज़ सुनकर सुजाता दौड़ी आई।
"हे भगवान! यह क्या कर दिया?"
सीमा घबरा गई।
"दीदी, बच्चा है। गलती से हो गया।"
सुजाता ने गहरी सांस ली।
फिर बोली,
"सीमा, हर बार बच्चा है कहकर बात खत्म नहीं हो सकती। यह शोपीस बहुत महंगा था।"
इतने में राघव भी आ गए।
उन्होंने टूटे हुए टुकड़ों को देखा और कहा,
"कोई बात नहीं, हो जाता है।"
लेकिन उनके चेहरे पर परेशानी साफ दिखाई दे रही थी।
उस रात सीमा सो नहीं पाई।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि वह अब इस घर का हिस्सा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी बन चुकी है।
अगली सुबह उसने निखिल से कहा,
"तुम सही थे।"
निखिल ने आश्चर्य से पूछा,
"किस बारे में?"
"दूसरे के घर में ज्यादा दिन रहने के बारे में।"
निखिल मुस्कुराया।
"कोई बात नहीं। समझने में समय लगता है।"
फिर उसने एक खुशखबरी दी।
"मुझे नौकरी मिल गई है।"
सीमा खुशी से उछल पड़ी।
"सच?"
"हाँ। और मैंने एक छोटा सा फ्लैट भी देख लिया है।"
दो दिन बाद उन्होंने जाने का फैसला कर लिया।
जब सामान बाहर रखा जा रहा था, तब सुजाता भावुक हो गई।
"इतनी जल्दी क्यों जा रहे हो?"
सीमा ने प्यार से उसका हाथ पकड़ा।
"दीदी, पौधा चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, उसे बढ़ने के लिए अपनी मिट्टी चाहिए होती है।"
सुजाता की आंखें भर आईं।
वह समझ गई थी।
कुछ घंटे बाद वे अपने नए फ्लैट में पहुँचे।
फ्लैट छोटा था।
दीवारों पर पुराना पेंट था।
रसोई भी बहुत साधारण थी।
लेकिन जैसे ही सीमा ने दरवाजा बंद किया, उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।
उसने खुद चाय बनाई।
दो कप लेकर फर्श पर बैठ गई।
निखिल भी उसके पास बैठ गया।
"कैसा लग रहा है?" उसने पूछा।
सीमा ने चारों तरफ देखा।
फिर उसने पूरे घर पर एक नज़र डाली। दीवारों का उखड़ा हुआ पेंट, पुराना पंखा और फर्श पर बिछी साधारण चटाई देखकर उसके होंठों पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई।
निखिल ने चाय का कप उठाते हुए पूछा,
"कैसा लग रहा है? यहाँ तो न बड़ी-बड़ी सुविधाएँ हैं, न आलीशान कमरे।"
सीमा ने गहरी साँस ली, जैसे बरसों बाद मन को सच्ची शांति मिली हो। फिर मुस्कुराकर बोली,
"सुविधाएँ इंसान को आराम दे सकती हैं, लेकिन सुकून नहीं। वहाँ हर चीज़ थी, बस अपनापन और आज़ादी नहीं थी। यहाँ भले ही सुविधाएँ कम हैं, लेकिन यह घर हमारा है। यहाँ किसी के सामने झिझककर जीना नहीं पड़ता। सच कहूँ, इतने दिनों बाद आज मुझे अपने घर जैसा महसूस हो रहा है।"
निखिल हँस पड़ा।
उसी समय विवान दौड़ते हुए आया और बोला,
"मम्मी, यह पूरा घर हमारा है ना?"
सीमा ने उसे गले लगा लिया।
"हाँ बेटा, पूरा हमारा।"
उसकी आंखों में खुशी के आँसू थे।
उस दिन उसे एहसास हुआ कि घर बड़ा होने से खुशियाँ बड़ी नहीं होतीं।
अपना छोटा सा आशियाना, जहाँ इंसान बिना डर के हँस सके, बिना झिझक के जी सके और बिना हिसाब दिए साँस ले सके, वही असली घर होता है।
दूसरों की छत के नीचे मिलने वाली सुविधाएँ कुछ समय के लिए अच्छी लग सकती हैं, लेकिन अपने घर का सम्मान और स्वतंत्रता उनसे कहीं अधिक कीमती होती है।
क्योंकि स्वाभिमान के साथ खाया गया सूखा निवाला भी, अपमान के साथ मिले शाही भोज से कहीं ज्यादा स्वाद देता है।

Post a Comment