पिता का अनमोल प्यार
"जिस पिता के लिए बेटा सिर्फ एक गर्म स्वेटर खरीदना चाहता था... उसी एक पल ने पूरे परिवार को एहसास करा दिया कि माता-पिता की जरूरतें कभी बोझ नहीं होतीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती हैं।"
राहुल अपनी तनख्वाह का हिसाब लगा रहा था। महीने का आखिरी सप्ताह चल रहा था। घर का किराया, बच्चों की स्कूल फीस, राशन और बिजली का बिल—हर खर्च सामने रखा था। जेब में बहुत कम पैसे बचे थे।
इतने में उसने मोबाइल पर मौसम की खबर देखी। अगले कई दिनों तक कड़ाके की ठंड पड़ने वाली थी।
उसे अचानक अपने पिता का चेहरा याद आया।
गाँव से कुछ महीने पहले ही वह उन्हें अपने साथ शहर लेकर आया था। उम्र पचहत्तर साल पार कर चुकी थी। घुटनों में दर्द रहता था और ठंडी हवा उन्हें जल्दी लग जाती थी।
राहुल ने मन ही मन सोचा, "आज पिताजी के लिए एक अच्छा ऊनी स्वेटर और गर्म कंबल ले आता हूँ। पिछले साल भी उन्होंने पुराने कपड़ों में ही सर्दी निकाल दी थी।"
तभी उसकी पत्नी पूजा कमरे में आ गई।
उसने मुस्कुराते हुए पूछा, "क्या सोच रहे हो?"
राहुल बोला, "ऑफिस से लौटते समय पिताजी के लिए गर्म स्वेटर और एक कंबल खरीद लाऊँगा।"
पूजा का चेहरा उतर गया।
"अभी तो बेटे के जूते लेने हैं। मेरी भी स्वेटर लेने की बात कई दिनों से चल रही है। हर बार हमारे लिए पैसे कम पड़ जाते हैं, लेकिन पिताजी के लिए तुरंत इंतजाम हो जाता है।"
राहुल ने शांत स्वर में कहा, "ऐसी बात नहीं है। तुम दोनों की जरूरतें भी पूरी होंगी। लेकिन पिताजी कभी अपने लिए कुछ नहीं कहते। कई दिनों से देख रहा हूँ, रात में खांसते रहते हैं।"
पूजा बोली, "इतनी भी ठंड नहीं है। कुछ दिन और रुक जाओ। अगले महीने खरीद लेना।"
राहुल चुप हो गया।
उसे पत्नी की बात बुरी लगी, लेकिन बहस करने से उसने खुद को रोक लिया।
उसे बचपन की एक घटना याद आने लगी।
एक बार स्कूल में वार्षिक समारोह था। सभी बच्चों को नया ब्लेजर पहनकर आना था।
घर की आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी।
राहुल ने जिद पकड़ ली थी।
पिता ने बिना कुछ कहे अपना नया कोट वापस दुकान पर बेच दिया और उसी पैसे से बेटे का ब्लेजर खरीद दिया।
जब राहुल ने पूछा था, "आप अपना कोट क्यों नहीं पहन रहे?"
तो पिता हँसकर बोले थे, "मुझे पुराना ही अच्छा लगता है।"
बहुत साल बाद राहुल को पता चला था कि उस सर्दी पिता पूरे मौसम बिना गर्म कोट के रहे थे।
याद आते ही उसकी आँखें भर आईं।
उसने तय कर लिया कि चाहे कुछ भी हो, आज पिता के लिए गर्म कपड़े जरूर खरीदेगा।
ऑफिस में अचानक जरूरी काम आ गया।
देर हो गई।
बाजार बंद होने लगा था।
राहुल खाली हाथ घर लौट आया।
उस रात उसने देखा कि पिता चुपचाप पुराने कंबल में बैठे थे।
कमरे की खिड़की से ठंडी हवा अंदर आ रही थी।
राहुल ने खिड़की बंद की।
पिता मुस्कुराकर बोले, "बेटा, मेरी चिंता मत किया कर। मैं ठीक हूँ।"
राहुल कुछ नहीं बोला।
उसे सारी रात बेचैनी रही।
अगले दिन वह जल्दी ऑफिस के लिए निकला।
रास्ते में लोगों की भीड़ लगी हुई थी।
पता चला कि फुटपाथ पर रहने वाले एक बुजुर्ग की ठंड लगने से मौत हो गई।
भीड़ में खड़े लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे।
"बेचारे के पास पहनने के लिए गर्म कपड़े भी नहीं थे।"
"उम्र ज्यादा थी, ठंड सहन नहीं कर पाए।"
राहुल का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
उसे उस बुजुर्ग की जगह अपने पिता दिखाई देने लगे।
उसने उसी समय ऑफिस जाना छोड़ दिया।
सीधे कपड़ों की दुकान पहुँच गया।
अपनी जेब में जितने पैसे थे, उनसे सबसे अच्छा ऊनी स्वेटर, गर्म शॉल, टोपी और मोजे खरीद लिए।
दुकानदार ने सामान पैक किया।
राहुल बिना देर किए घर पहुँचा।
पिता आँगन में धूप सेंक रहे थे।
राहुल उनके पास गया।
धीरे से स्वेटर पहनाया।
फिर अपने हाथों से शॉल ओढ़ा दी।
टोपी भी पहना दी।
पिता हैरानी से उसे देखते रहे।
उनकी आँखें भर आईं।
उन्होंने राहुल का हाथ पकड़ लिया।
बोले, "इतना खर्च क्यों कर दिया बेटा?"
राहुल मुस्कुराया।
"जब मैं छोटा था, आपने कभी खर्च नहीं गिना। आज मेरी बारी है।"
पिता कुछ पल चुप रहे।
फिर अंदर गए।
अपनी पुरानी लोहे की पेटी खोलकर एक लिफाफा लेकर आए।
राहुल के हाथ में रख दिया।
"यह क्या है पिताजी?"
"खोलकर देख।"
राहुल ने लिफाफा खोला।
उसमें दस हजार रुपये थे।
वह चौंक गया।
"इतने पैसे?"
पिता मुस्कुराए।
"पेंशन से हर महीने थोड़ा-थोड़ा बचाता रहा हूँ। सोच रहा था कि पोती की पढ़ाई और बहू के लिए अच्छे गर्म कपड़े ले लेना।"
राहुल की आँखों से आँसू बह निकले।
"पिताजी, आपने बताया क्यों नहीं?"
पिता हँस दिए।
"बाप अगर अपने बच्चों के लिए बचत न करे, तो फिर कौन करेगा?"
इतने में पूजा भी वहाँ आ गई।
उसने सारी बातें सुन ली थीं।
उसका सिर शर्म से झुक गया।
उसे अपनी कही हुई हर बात याद आने लगी।
वह धीरे-धीरे पिता के पास पहुँची।
उनके चरणों में बैठ गई।
रोते हुए बोली, "पिताजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं आपकी जरूरत समझ ही नहीं पाई।"
पिता ने तुरंत उसे उठाया।
उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, "बेटी, गलती वहीं होती है जहाँ अपनापन होता है। तुम मेरी बहू नहीं, बेटी हो।"
पूजा की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे।
उसने उसी दिन फैसला किया कि घर में सबसे पहले माता-पिता की जरूरतों का ध्यान रखा जाएगा।
उस दिन घर में कोई बड़ा उपदेश नहीं दिया गया।
सिर्फ एक गर्म शॉल, एक पिता का निस्वार्थ प्रेम और एक बहू का बदला हुआ मन पूरे परिवार को जीवन का सबसे बड़ा संस्कार सिखा गया।
सीख:
माता-पिता अपनी जरूरतों को हमेशा छोटा मान लेते हैं, लेकिन उनके त्याग का सम्मान करना हर संतान का सबसे बड़ा कर्तव्य है।

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