सपने कभी गरीब नहीं होते
"जिस बेटी से कहा गया था— 'गरीबों के बच्चों को इतने बड़े सपने नहीं देखने चाहिए'... उसी बेटी ने एक दिन ऐसा काम किया कि वही लोग सबसे पहले उसके सम्मान में खड़े हो गए।"
रीना स्कूल के दफ्तर के बाहर खड़ी थी। उसके हाथ काँप रहे थे। सामने कुर्सी पर बैठे प्रबंधक ने फाइल बंद करते हुए कहा, "देखिए बहन, नियम सबके लिए बराबर हैं। फीस कई महीनों से जमा नहीं हुई है।"
रीना ने अपनी साड़ी के पल्लू में बंधे कुछ नोट खोले और मेज पर रख दिए।
"सर, अभी मेरे पास बस इतने ही पैसे हैं। बाकी मैं मेहनत करके दे दूँगी। लेकिन मेरी बेटी को सबके सामने यह मत कहिए कि वह गरीब है। उसका मन टूट जाएगा।"
पास खड़ी तेरह साल की अनिका चुपचाप अपनी माँ को देख रही थी। उसकी आँखें भर आई थीं। उसे पहली बार समझ आया कि गरीबी सिर्फ पैसों की कमी नहीं होती, कई बार इंसान का सम्मान भी दाँव पर लग जाता है।
उसी समय स्कूल की प्रिंसिपल कविता शर्मा वहाँ पहुँचीं। उन्होंने पूरी बात सुनी। कुछ पल तक वे बिना कुछ बोले माँ-बेटी को देखती रहीं।
फिर उन्होंने अनिका से पूछा, "बेटा, बड़े होकर क्या बनना चाहती हो?"
अनिका ने बिना झिझक जवाब दिया, "मैं प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहती हूँ... ताकि किसी गरीब को सिर्फ पैसे की वजह से झुकना न पड़े।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
कुछ लोग हल्का-सा मुस्कुराए, लेकिन प्रिंसिपल कविता शर्मा की आँखों में अलग ही चमक थी।
उन्होंने धीरे से कहा, "आज से इस बच्ची का नाम कोई नहीं काटेगा। इसकी पढ़ाई जारी रहेगी।"
रीना की आँखों से आँसू बह निकले। उसने हाथ जोड़कर कहा, "मैडम, आपका यह एहसान मैं कभी नहीं भूलूँगी।"
कविता शर्मा मुस्कुराईं।
"इसे एहसान मत समझिए। अगर यह बच्ची मेहनत करेगी तो एक दिन यही हमारे स्कूल का नाम रोशन करेगी।"
उस दिन के बाद अनिका ने पढ़ाई को ही अपना लक्ष्य बना लिया।
घर पहुँचकर वह सबसे पहले माँ का काम बाँटती। पानी भरती, खाना बनाने में मदद करती, फिर देर रात तक पढ़ाई करती।
रीना दिन-भर सिलाई करती। कभी किसी की सलवार, कभी ब्लाउज, कभी स्कूल यूनिफॉर्म।
रात होते-होते उसकी आँखें थक जातीं, लेकिन बेटी को किताबों में डूबा देखकर सारी थकान भूल जाती।
मोहल्ले के कुछ लोग ताना मारते।
"इतनी पढ़ाई कराकर क्या होगा? आखिर शादी ही तो करनी है।"
कोई कहता, "गरीब घर की लड़कियाँ बड़े सपने देखें तो आखिर में निराश ही होती हैं।"
लेकिन रीना हर बार मुस्कुराकर सिर्फ इतना कहती—
"सपने कभी अमीरी-गरीबी नहीं देखते। उन्हें पूरा करने का हौसला और मेहनत ही इंसान की असली पहचान होती है।"
यह बात अनिका ने अपने दिल में हमेशा के लिए बसा ली।
समय बीतता गया।
दसवीं की परीक्षा में अनिका ने पूरे जिले में दूसरा स्थान प्राप्त किया।
स्कूल में सम्मान समारोह रखा गया।
जब मंच पर उसका नाम पुकारा गया तो वह सबसे पहले नीचे बैठी अपनी माँ के पास गई और उनके पैर छू लिए।
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
पत्रकारों ने पूछा, "तुम्हारी सफलता का सबसे बड़ा कारण क्या है?"
अनिका ने मुस्कुराकर कहा,
"मेरी माँ ने कभी मुझे गरीब महसूस नहीं होने दिया।"
यह वाक्य अगले दिन अखबार की सबसे बड़ी खबर बना।
लेकिन आगे की राह अभी आसान नहीं थी।
बारहवीं के बाद प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करनी थी।
कोचिंग की फीस बहुत अधिक थी।
रीना ने अपने पास बची आखिरी सोने की छोटी-सी अंगूठी भी बेच दी।
जब अनिका को यह बात पता चली तो उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।
उसने कहा,
"माँ, मेरी वजह से आपने अपनी आखिरी निशानी भी बेच दी।"
रीना ने बेटी का चेहरा अपने हाथों में लेकर कहा,
"बेटी, गहने फिर बन सकते हैं... लेकिन अगर सपने टूट जाएँ तो उन्हें जोड़ना बहुत मुश्किल होता है।"
उस दिन अनिका ने मन ही मन प्रण लिया कि अब वह पीछे मुड़कर नहीं देखेगी।
उसने दिन-रात एक कर दिए।
घंटों लाइब्रेरी में बैठती।
पुरानी किताबें खरीदकर पढ़ती।
इंटरनेट की मुफ्त सामग्री से नोट्स बनाती।
कई बार बिजली चली जाती तो सड़क किनारे लगी स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ती।
लोग उसे देखकर हैरान होते।
कुछ उसकी मेहनत की तारीफ करते, तो कुछ उसे पागल कहते।
लेकिन उसे अब किसी की बात से फर्क नहीं पड़ता था।
आखिर वह दिन भी आया जिसका इंतजार वर्षों से था।
संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ।
पूरे जिले में खुशी की लहर दौड़ गई।
अनिका ने शानदार रैंक के साथ परीक्षा पास कर ली थी।
रीना को पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ।
जब टीवी पर बेटी का नाम आया तो वह फूट-फूटकर रोने लगी।
मोहल्ले के वही लोग, जो कभी ताने देते थे, आज मिठाई लेकर सबसे पहले उसके घर पहुँचे।
कुछ महीनों बाद प्रशिक्षण पूरा हुआ।
अनिका अधिकारी बनकर अपने ही जिले में नियुक्त हुई।
कार्यालय के पहले दिन उसने सबसे पहले अपनी माँ को अपनी कुर्सी पर बैठाया।
रीना घबरा गई।
"बेटी, यह तेरी कुर्सी है। मैं कैसे बैठ सकती हूँ?"
अनिका मुस्कुराई।
""माँ, आज लोग मुझे इस कुर्सी पर बैठा देखकर सम्मान दे रहे हैं, लेकिन सच तो यह है कि इस मंज़िल तक मैं अकेले नहीं पहुँची। आपकी अनगिनत मेहनत, त्याग, अधूरी इच्छाएँ और बहाए गए आँसू मुझे यहाँ तक लेकर आए हैं। इसलिए इस कुर्सी पर बैठने का पहला अधिकार मेरा नहीं, आपका है। आइए माँ... आज इस पर सबसे पहले आप बैठें।"
कमरे में मौजूद सभी कर्मचारियों की आँखें नम हो गईं।
लेकिन कहानी का सबसे भावुक पल अभी बाकी था।
कुछ समय बाद अनिका ने अपने जिले के सभी सरकारी और निजी स्कूलों की बैठक बुलाई।
सभी प्रिंसिपल, शिक्षक और अधिकारी मौजूद थे।
मंच पर पहुँचकर उसने कहा,
"बच्चों की फीस जरूरी है, लेकिन उनका सम्मान उससे भी ज्यादा जरूरी है। किसी भी बच्चे को उसकी गरीबी के कारण पूरी क्लास के सामने अपमानित नहीं किया जाएगा। अगर किसी परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है तो पहले उसकी मदद का रास्ता खोजा जाएगा।"
पूरा सभागार तालियों से गूँज उठा।
उसी दिन उसने "उम्मीद शिक्षा सहायता योजना" शुरू की।
इस योजना के तहत जिले के जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई के लिए अलग कोष बनाया गया।
सैकड़ों लोगों ने आगे बढ़कर सहयोग किया।
कई बच्चों की छूटी हुई पढ़ाई फिर से शुरू हो गई।
कुछ महीनों बाद उसी स्कूल से निमंत्रण आया जहाँ कभी फीस न भर पाने की वजह से अनिका का नाम काटने की बात हुई थी।
स्कूल का वार्षिक समारोह था।
मुख्य अतिथि के रूप में अनिका को बुलाया गया।
मंच पर पहुँचते ही प्रिंसिपल कविता शर्मा ने मुस्कुराकर उसका स्वागत किया।
उन्होंने कहा,
"आज हमें गर्व है कि जिस बच्ची की पढ़ाई बचाने का फैसला हमने लिया था, वही आज हजारों बच्चों के भविष्य का सहारा बन गई है।"
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
अनिका ने मंच से उतरकर सबसे पहले अपनी माँ का हाथ पकड़ा और उन्हें मंच पर ले आई।
उसने माइक पर कहा,
"अगर आज कोई सम्मान मिलना चाहिए, तो वह मेरी माँ को मिलना चाहिए। इन्होंने भूखे रहकर मुझे पढ़ाया, कभी हार नहीं मानी और मुझे सिखाया कि इंसान की सबसे बड़ी दौलत उसका हौसला होता है।"
पूरा सभागार खड़ा हो गया।
हर व्यक्ति तालियाँ बजा रहा था।
रीना की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
उन्हें आज पहली बार लगा कि उनकी हर सिलाई, हर त्याग और हर अधूरी इच्छा ने सचमुच एक नया भविष्य सिल दिया है।
कार्यक्रम समाप्त होने से पहले अनिका ने एक और घोषणा की।
"आज से मेरी एक साल की पूरी तनख्वाह का हिस्सा उन बच्चियों की पढ़ाई के लिए जाएगा, जो सिर्फ पैसों की कमी की वजह से अपने सपने छोड़ने पर मजबूर हो जाती हैं।"
तालियों की आवाज़ देर तक गूँजती रही।
उस दिन हर किसी ने महसूस किया कि गरीबी इंसान की पहचान नहीं होती, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने सपनों को जिंदा रखना ही असली हिम्मत होती है।
रीना ने अपनी बेटी को गले लगाया और धीमे से कहा,
"आज तेरे पिता जहाँ भी होंगे, तुझ पर गर्व कर रहे होंगे।"
अनिका मुस्कुराई।
"माँ, मेरी सबसे बड़ी पहचान किसी पद से नहीं... आपकी बेटी कहलाने से है।"
उस क्षण वहाँ मौजूद हर व्यक्ति की आँखें नम थीं, क्योंकि सबने अपनी आँखों से देख लिया था कि जब एक माँ अपने सपनों से पहले अपने बच्चे के सपनों को रख देती है, तब किस्मत भी एक दिन उसके सामने सिर झुका देती है।

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