बहू भी किसी की बेटी है

 

Emotional Indian family reunion as a daughter lovingly embraces her mother while both families come together with forgiveness, respect, and happiness in a beautiful traditional home.


"समधन जी, आपकी बहू हमारी बेटी भी है... उसे उसके मायके आने से रोकने का हक आपको किसने दिया?"


फ़ोन की दूसरी तरफ कुछ पल के लिए बिल्कुल सन्नाटा छा गया।


शारदा देवी के हाथ हल्के-हल्के काँप रहे थे। उन्होंने ज़िंदगी में कभी किसी से ऊँची आवाज़ में बात नहीं की थी। रिश्तों को निभाना, बड़ों का सम्मान करना और हर बात प्यार से समझाना ही उनका स्वभाव था। लेकिन आज बात उनके स्वाभिमान की नहीं, उनकी बेटी पूजा की थी। उस बेटी की, जिसे उन्होंने अपनी गोद में खिलाकर बड़ा किया था और जिसकी हँसी से कभी पूरा घर गूँजता था।


उधर फ़ोन पर बैठी कमला देवी भी कुछ पल तक चुप रहीं। शायद उन्हें उम्मीद नहीं थी कि हमेशा झुककर बात करने वाली उनकी समधन आज इतने आत्मविश्वास के साथ जवाब देंगी।


शारदा देवी ने गहरी साँस ली और धीमे स्वर में बोलीं, "समधन जी, मैं झगड़ा करने के लिए फ़ोन नहीं कर रही। मैं तो बस अपनी बेटी से मिलने की इजाज़त माँग रही हूँ।"


कमला देवी की आवाज़ फिर सुनाई दी।


"समधन जी, अब आपकी बेटी हमारे घर की बहू है। शादी के बाद बार-बार मायके जाना अच्छी बात नहीं होती। बहू का पहला फ़र्ज़ अपने ससुराल की ज़िम्मेदारियाँ निभाना है। अगर हर थोड़े दिन में मायके जाती रहेगी, तो इस घर में उसका मन कैसे लगेगा?"


शारदा देवी की आँखों के सामने पूजा का बचपन घूम गया।


वही नन्ही-सी बच्ची, जो स्कूल से लौटते ही दौड़कर उनकी गोद में चढ़ जाती थी।


"माँ, आज मुझे पूरे नंबर मिले।"


"माँ, देखो मैंने आपकी पसंद की खीर बनानी सीख ली।"


"माँ, मैं कहीं भी चली जाऊँ, आपको कभी नहीं भूलूँगी।"


हर याद उनके दिल को भीतर तक भिगो रही थी।


उन्होंने अपने आँसू रोकते हुए कहा, "समधन जी, मैं उसे हमेशा के लिए नहीं बुला रही। शादी को लगभग दो साल होने वाले हैं। एक बार भी वह अपने मायके नहीं आई। क्या इतना भी हक नहीं बचा उसका?"


कमला देवी ने बिना रुके जवाब दिया,


"बहू का असली घर उसका ससुराल होता है। मायके का मोह जितनी जल्दी छूट जाए, उतना अच्छा होता है।"


शारदा देवी अब समझ चुकी थीं कि यह सिर्फ उनकी बेटी की बात नहीं थी। यह उस सोच की बात थी जिसमें बहू को इंसान नहीं, सिर्फ ज़िम्मेदारियों का दूसरा नाम समझ लिया जाता है।


उन्होंने शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा,


"अगर यही आपकी सोच है, तो आपको अपने बेटे की शादी किसी ऐसी लड़की से करनी चाहिए थी जिसका कोई मायका ही न होता। तब कोई माँ अपनी बेटी को याद नहीं करती, कोई पिता उसकी राह नहीं देखता, कोई भाई राखी पर बहन का इंतज़ार नहीं करता।"


उधर अचानक खामोशी छा गई।



इधर शारदा देवी के घर में भी सन्नाटा था।


उनके पति हरिराम जी बरामदे में बैठे पुराने फोटो एल्बम के पन्ने पलट रहे थे।


एक तस्वीर पर उनकी नज़र ठहर गई।


छोटी-सी पूजा उनके कंधों पर बैठी खिलखिला रही थी।


उन्होंने तस्वीर को हाथ से सहलाया और धीरे से बोले,


"देखो शारदा... हमारी बिटिया कितनी जल्दी बड़ी हो गई।"


शारदा देवी की आँखें भर आईं।


"बड़ी तो हो गई... लेकिन पता नहीं खुश भी है या नहीं।"


हरिराम जी ने उनकी तरफ देखा।


हरिराम जी ने पत्नी की ओर देखते हुए पूछा,

"क्या आज हमारी बिटिया से बात हुई?"


शारदा देवी ने नम आँखों से कहा,

"हाँ... लेकिन वही कह रही थी कि घर में बहुत काम है।"


हरिराम जी हल्की मुस्कान के साथ बोले,


"तुम्हें नहीं लगता, वह हमसे कुछ छिपा रही है?"


शारदा देवी ने सिर झुका लिया।


उन्हें भी यही महसूस होता था।


हर बार पूजा वीडियो कॉल पर मुस्कुराती जरूर थी, लेकिन उसकी आँखों की चमक पहले जैसी नहीं रही थी।


वह पहले की तरह खुलकर बातें भी नहीं करती थी।


कई बार ऐसा लगता जैसे कोई उसके पास ही बैठा हो और वह सोच-समझकर शब्द चुन रही हो।


उसी समय दरवाज़े पर पड़ोस की विमला चाची आ गईं।


"अरे बहन, क्या बात है? आजकल बड़ी उदास दिखाई देती हो।"


शारदा देवी ने मुस्कुराने की कोशिश की।


"कुछ नहीं चाची... बस पूजा की याद आ रही थी।"


विमला चाची ने लंबी साँस भरी।


"याद तो आएगी ही। बेटी चाहे कितनी भी बड़ी हो जाए, माँ का दिल तो उसके लिए हमेशा धड़कता रहता है।"


इतना सुनते ही शारदा देवी की आँखों से आँसू निकल पड़े।


उन्होंने पहली बार किसी से अपना दर्द बाँटा।


"चाची... दो साल हो गए। मेरी बेटी एक दिन के लिए भी घर नहीं आई।"


विमला चाची चौंक गईं।


"क्या? दो साल?"


शारदा देवी ने भारी मन से सिर झुकाते हुए कहा,

"हाँ चाची। हर बार कोई न कोई बहाना बना दिया जाता है। कभी कहते हैं कि घर में मेहमान आने वाले हैं, कभी बोलते हैं कि काम बहुत ज़्यादा है। कभी किसी की तबीयत खराब होने का बहाना बना देते हैं, तो कभी कहते हैं कि अभी समय ठीक नहीं है। ऐसे करते-करते पूरे दो साल बीत गए, लेकिन मेरी बेटी एक दिन के लिए भी अपने मायके नहीं आ सकी।"


विमला चाची कुछ देर तक चुप रहीं।


फिर बोलीं,


"बहन, बहाने कभी खत्म नहीं होते। अगर रिश्तों में अपनापन हो, तो बेटी को भेजने का रास्ता भी निकल ही आता है।"


शारदा देवी ने आँसू पोंछे।


शारदा देवी ने धीमे स्वर में कहा, "इसीलिए आज मैंने पहली बार अपनी समधन से साफ़-साफ़ बात की है।"


विमला चाची ने हैरानी से पूछा, "फिर क्या बोलीं आपकी समधन?"


शारदा देवी ने पूरी बातचीत बता दी।


विमला चाची ने गुस्से में कहा,


"बहू कोई नौकरानी नहीं होती कि उसे उसके माँ-बाप से मिलने का भी अधिकार न मिले।"



उधर ससुराल में, पूजा अपने कमरे में अलमारी ठीक कर रही थी।


उसकी नज़र एक छोटे-से डिब्बे पर पड़ी।


उसने धीरे से डिब्बा खोला।


अंदर बचपन की एक राखी, स्कूल का पहचान पत्र और माँ की लिखी एक छोटी-सी चिट्ठी रखी थी।


चिट्ठी में सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी—


"बेटी, जहाँ भी रहना, हमेशा खुश रहना। अगर कभी मन भारी हो जाए, तो समझ लेना कि तुम्हारी माँ की दुआएँ हमेशा तुम्हारे साथ हैं।"


वह चिट्ठी पढ़ते ही पूजा की आँखों से आँसू टपकने लगे।


उसी समय कमरे का दरवाज़ा खुला...



कमरे का दरवाज़ा खुलते ही पूजा ने जल्दी से अपनी आँखें पोंछ लीं और माँ की चिट्ठी वापस उसी डिब्बे में रख दी।


सामने उसकी ननद रिया खड़ी थी।


"भाभी, मम्मी बुला रही हैं। चाय तैयार हो गई क्या?"


पूजा ने हल्की मुस्कान लाने की कोशिश की।


"हाँ, अभी लेकर आती हूँ।"


उसने आँसू छिपाने के लिए एक बार फिर शीशे में खुद को देखा। चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों की लालिमा बता रही थी कि वह अभी रोकर उठी है।


रसोई में पहुँचते ही कमला देवी ने तेज़ आवाज़ में कहा,


"पूजा, तुम्हें कितनी देर लगती है? घर में इतने लोग हैं। हर काम समय पर होना चाहिए।"


"जी मम्मी जी..."


पूजा ने सिर झुकाकर जवाब दिया।


वह बिना कुछ कहे सबके लिए चाय बनाने लगी।


घर में ससुर दीनानाथ जी, देवर रोहित, ननद रिया और पति अमित बैठे थे।


सबके सामने पूजा हमेशा मुस्कुराकर रहती थी।


उसने कभी किसी से शिकायत नहीं की।


लेकिन उसके मन में एक ही इच्छा थी—एक बार अपने माँ-पापा को गले लगा सके।



उसी शाम पूजा का मोबाइल बजा।


स्क्रीन पर लिखा था—"माँ"।


पूजा का चेहरा खिल उठा।


वह जल्दी से बालकनी में चली गई।


"हाँ माँ..."


उधर से शारदा देवी की प्यार भरी आवाज़ आई।


"कैसी है मेरी बिटिया?"


पूजा ने अपने आँसू छिपाते हुए मुस्कुराने की कोशिश की और बोली, "मैं ठीक हूँ, माँ।"


शारदा देवी ने बेटी की आवाज़ में छिपा दर्द महसूस कर लिया। उन्होंने चिंता भरे स्वर में फिर पूछा, "सच बता, पूजा... तू खुश तो है न? कोई बात है तो अपनी माँ से मत छिपा।"


पूजा कुछ पल चुप रही।


उसकी आँखें भर आईं।


लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभाल लिया।


"हाँ माँ... मैं बिल्कुल ठीक हूँ।"


एक माँ बेटी की आवाज़ पहचान लेती है।


शारदा देवी समझ गईं कि पूजा रो रही है।


"बेटी... रो रही है क्या?"


पूजा ने जल्दी से अपने आँसू पोंछे और मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली, "नहीं माँ... मैं क्यों रोऊँगी? मैं बिल्कुल ठीक हूँ।"


शारदा देवी की आँखें भी भर आईं। उन्होंने धीमे लेकिन विश्वास भरे स्वर में कहा, "मुझसे झूठ मत बोल, पूजा। तू मेरी बेटी है। तेरी आवाज़ सुनकर ही समझ जाती हूँ कि तेरे दिल में क्या चल रहा है।"


अब पूजा खुद को रोक नहीं सकी।


उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।


"माँ... आपकी बहुत याद आती है।"


शारदा देवी भी रो पड़ीं।


"तो आ जा बेटी... बस कुछ दिन के लिए आ जा।"


पूजा ने इधर-उधर देखा।


फिर धीरे से बोली,


"माँ... मैं चाहकर भी नहीं आ सकती।"


शारदा देवी का दिल धक से रह गया।

"क्यों बेटी? क्या बात है? कोई परेशानी है क्या?"


पूजा कुछ पल चुप रही। उसकी आँखें भर आईं। उसने काँपती आवाज़ में जवाब दिया,

"मम्मी जी को मेरा मायके जाना अच्छा नहीं लगता।"


यह सुनते ही शारदा देवी की आँखों से आँसू छलक पड़े।

"लेकिन बेटी, शादी को इतना समय हो गया। क्या तुझे कुछ दिनों के लिए भी आने नहीं देते?"


पूजा ने अपने आँसू रोकते हुए कहा,

"माँ... आप मेरी चिंता मत कीजिए। मैं ठीक हूँ।"


शारदा देवी समझ गईं कि उनकी बेटी अपने मन की बात छिपा रही है।


उन्होंने फिर प्यार से कहा,


"बेटी, माँ से अपना दर्द मत छिपा। अगर कोई बात है तो मुझे बता।"


पूजा ने गहरी साँस ली और खुद को संभालते हुए बोली,


पूजा: "माँ... रहने दीजिए। मैं सच में ठीक हूँ।"


इतना कहकर उसने जल्दी से फ़ोन काट दिया।


उसे डर था कि कहीं कोई उसकी बातें सुन न ले।



उसी समय अमित ऑफिस से लौट रहा था।


वह सीढ़ियाँ चढ़ते हुए बालकनी के पास से गुज़रा था।


उसने पूजा की आख़िरी बात सुन ली थी—


"मैं चाहकर भी नहीं आ सकती।"


अमित कुछ पल वहीं रुक गया।


पहली बार उसके मन में सवाल उठा—


"क्या सचमुच पूजा इतने दिनों से अपने मायके नहीं गई?"


उसने याद करने की कोशिश की।


शादी के बाद हर बार जब पूजा ने मायके जाने की बात की, उसकी माँ ने कोई न कोई वजह बता दी।


कभी बोलीं—


"अगले महीने जाना।"


कभी—


"अभी रिश्तेदार आने वाले हैं।"


कभी—


"त्योहार के बाद चली जाना।"


और फिर बात वहीं खत्म हो जाती।


अमित ने कभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया।


उसे लगता था, सब ठीक होगा।


लेकिन आज पहली बार उसे एहसास हुआ कि शायद सब ठीक नहीं है।



रात को खाना खाते समय अमित ने सहजता से पूछा,


"माँ, पूजा काफी समय से मायके नहीं गई है न?"


कमला देवी ने बिना उसकी ओर देखे कहा,


"तो क्या हुआ?"


अमित ने शांत स्वर में जवाब दिया,

"बस ऐसे ही पूछ रहा था।"


"बहू अगर हर महीने मायके जाने लगे तो घर कौन संभालेगा?"


अमित ने धीरे से कहा,


"लेकिन शादी को तो लगभग दो साल होने वाले हैं।"


कमला देवी ने थाली रखते हुए कहा,


"तुम्हें इन बातों में पड़ने की ज़रूरत नहीं है। घर कैसे चलता है, मुझे पता है।"


पूजा चुपचाप खाना परोसती रही।


वह चाहकर भी कुछ नहीं बोली।


उसे डर था कि कहीं उसकी वजह से घर में झगड़ा न हो जाए।



उस रात अमित को देर तक नींद नहीं आई।


उसे शादी का वह दिन याद आने लगा...


जब विदाई के समय शारदा देवी ने उसका हाथ पकड़कर कहा था—


"बेटा... मेरी बेटी बहुत सीधी है। कभी उसकी आँखों में आँसू मत आने देना।"


तब उसने मुस्कुराकर वादा किया था—


"माँ जी, आज से पूजा सिर्फ आपकी नहीं, मेरी भी ज़िम्मेदारी है।"


आज वही वादा उसे भीतर से कचोट रहा था।


क्या वह सच में अपना वादा निभा पाया?



अगले दिन अमित ऑफिस पहुँचा।


लेकिन उसका मन काम में नहीं लग रहा था।


लंच ब्रेक में उसका दोस्त संदीप उसके पास आया।


"क्या बात है? आज बहुत परेशान लग रहे हो।"


अमित ने पूरी बात बता दी।


संदीप कुछ देर चुप रहा।


फिर बोला,


"यार, मेरी पत्नी हर तीन-चार महीने में अपने मायके जाती है। इससे हमारा रिश्ता कभी कमज़ोर नहीं हुआ।"


अमित ने पूछा,


"लेकिन अगर घर वाले मना करें तो?"


संदीप मुस्कुराया।


"माँ-बाप बेटी को जन्म से पालते हैं। शादी के बाद उनसे मिलने का हक कौन छीन सकता है?"


यह बात अमित के दिल में उतर गई।


उसे पहली बार महसूस हुआ कि गलती सिर्फ उसकी माँ की नहीं, उसकी भी है।


क्योंकि उसने कभी अपनी पत्नी से खुलकर पूछा ही नहीं—


"तुम खुश हो या नहीं?"



उधर शारदा देवी ने भी मन ही मन एक निर्णय ले लिया था।


उन्होंने हरिराम जी से कहा,


"अब मैं अपनी बेटी से मिलने खुद जाऊँगी। चाहे कोई कुछ भी कहे।"


हरिराम जी ने उनकी ओर देखा।


"अगर वहाँ तुम्हारा अपमान हुआ तो?"


शारदा देवी ने दृढ़ आवाज़ में कहा,


"अपमान से बड़ा दर्द अपनी बेटी की तड़प देखना होता है।"


हरिराम जी ने बिना कुछ कहे अलमारी खोली।


उन्होंने एक साड़ी का डिब्बा, पूजा की पसंद की मिठाई और बचपन की उसकी पसंदीदा चूड़ियाँ एक बैग में रख दीं।


फिर मुस्कुराकर बोले,


"चलो... अपनी बेटी से मिलने चलते हैं।"


शारदा देवी की आँखें भर आईं।


उन्हें विश्वास था—


अब जो होगा, सच सामने आकर रहेगा।



शारदा देवी ने बैग का ज़िप एक बार फिर जाँच लिया। उसमें पूजा की पसंद की घर की बनी मठरी, बेसन के लड्डू, उसकी बचपन की पसंदीदा इमली की टॉफियाँ, एक नई साड़ी और चूड़ियों का छोटा-सा डिब्बा रखा था।


हरिराम जी ने बैग उठाया और मुस्कुराकर बोले,


"चलो, आज अपनी बेटी को बिना बताए खुश कर देते हैं।"


दोनों के चेहरे पर खुशी थी, लेकिन दिल में एक अनजाना डर भी था।


पूरे रास्ते शारदा देवी यही सोचती रहीं कि पता नहीं पूजा उन्हें देखकर कितनी खुश होगी।


लगभग दो घंटे बाद वे पूजा के ससुराल पहुँच गए।


दरवाज़े की घंटी बजी।


अंदर से रिया ने दरवाज़ा खोला।


सामने शारदा देवी और हरिराम जी को देखकर वह थोड़ी हैरान रह गई।


"अरे... आप लोग?"


"बेटी, पूजा घर पर है न?" शारदा देवी ने मुस्कुराते हुए पूछा।


"जी... है। आइए।"


रिया ने उन्हें अंदर बैठाया।


कमला देवी बैठक में आईं। चेहरे पर मुस्कान तो थी, लेकिन वह सिर्फ औपचारिक थी।


"अरे समधी जी, समधन जी! आने की खबर तो दे देते।"


हरिराम जी ने सहज स्वर में कहा,


"सोचा, बेटी से मिलने के लिए भी क्या पहले अनुमति लेनी पड़ेगी?"


कमला देवी हल्का-सा मुस्कुराईं, लेकिन उस मुस्कान में अपनापन नहीं था।


उन्होंने ऊँची आवाज़ में पुकारा,


"पूजा... देखो कौन आया है!"


रसोई में काम कर रही पूजा ने जैसे ही आवाज़ सुनी, वह दौड़ती हुई बाहर आई।


सामने अपने माँ-पापा को देखकर वह कुछ पल के लिए वहीं रुक गई।


अगले ही पल वह माँ से लिपट गई।


"माँ..."


बस इतना ही कह पाई।


उसकी रुलाई फूट पड़ी।


शारदा देवी ने बेटी को कसकर सीने से लगा लिया।


दो साल का दर्द दोनों की आँखों से आँसुओं की तरह बह रहा था।


हरिराम जी ने बेटी के सिर पर हाथ रखा।


"कैसी है मेरी गुड़िया?"


पूजा ने आँसू पोंछते हुए मुस्कुराने की कोशिश की।


"मैं ठीक हूँ पापा।"


लेकिन पिता की नज़र बेटी के चेहरे पर पड़ चुकी थी।


पहले की चंचल पूजा अब बहुत दुबली लग रही थी।


चेहरे की चमक जैसे कहीं खो गई थी।


आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे।


हरिराम जी का दिल बैठ गया।


उन्होंने कुछ नहीं कहा।


बस बेटी के सिर पर हाथ फेरते रहे।


कमला देवी बोलीं,


"अरे पूजा, पहले पानी लेकर आओ। मेहमान आए हैं।"


यह सुनते ही शारदा देवी का चेहरा हल्का-सा उतर गया।


उन्होंने सोचा—


"मेहमान? क्या बेटी के माँ-बाप अपनी ही बेटी के घर मेहमान हो जाते हैं?"


पूजा जल्दी से पानी और चाय बनाने चली गई।


रसोई में उसके हाथ काँप रहे थे।


वह बार-बार आँसू पोंछ रही थी।


इतने में अमित भी ऑफिस से लौट आया।


बैठक में अपने सास-ससुर को देखकर उसने तुरंत उनके पैर छुए।


"नमस्ते माँ जी... नमस्ते पापा जी।"


हरिराम जी ने उसके सिर पर हाथ रखा।


"खुश रहो बेटा।"


अमित ने मुस्कुराकर कहा,


"आप लोगों ने आने की खबर क्यों नहीं दी? मैं छुट्टी ले लेता।"


शारदा देवी ने पहली बार उसके चेहरे की तरफ ध्यान से देखा।


उन्हें लगा, अमित के व्यवहार में कोई बनावट नहीं थी।


वह सचमुच उनका सम्मान करता है।


कुछ देर तक सामान्य बातें होती रहीं।


फिर शारदा देवी ने धीरे से कहा,


"समधन जी, अगर आप अनुमति दें तो हम पूजा को कुछ दिनों के लिए अपने साथ ले जाना चाहते हैं।"


कमला देवी का चेहरा तुरंत बदल गया।


"अभी? यह कैसे हो सकता है?"


हरिराम जी ने शांत स्वर में पूछा,

"क्यों समधन जी? ऐसी क्या बात है?"


कमला देवी ने सख्त लहजे में कहा,

"घर का इतना सारा काम कौन करेगा? अगले हफ्ते हमारे यहाँ रिश्तेदार आने वाले हैं। उनकी तैयारी भी करनी है। ऐसे समय में बहू घर छोड़कर कैसे जा सकती है?"


हरिराम जी ने शांत स्वर में कहा,


"काम तो जीवनभर रहेगा समधन जी। बेटी अपने माँ-बाप से मिलने सालों में एक बार ही तो जा रही है।"


कमला देवी ने सख्त आवाज़ में कहा,


"हमारे घर की बहुएँ ऐसे बार-बार मायके नहीं जातीं।"


बैठक में अचानक सन्नाटा छा गया।


अमित चुपचाप सब सुन रहा था।


उसे पिछली रात संदीप की बातें याद आ रही थीं।


उसने पहली बार अपनी माँ से कहा,


"माँ... अगर पूजा कुछ दिनों के लिए मायके चली जाएगी तो इसमें गलत क्या है?"


कमला देवी ने हैरानी से बेटे की ओर देखा।


"तुम भी अब इन्हीं की तरफ़दारी करोगे?"


अमित ने शांत स्वर में जवाब दिया,


"मैं किसी की तरफ़दारी नहीं कर रहा। मैं सिर्फ़ सही बात कह रहा हूँ।"


कमला देवी का स्वर और तेज़ हो गया।


"शादी के बाद लड़की का घर उसका ससुराल होता है।"


तभी शारदा देवी ने धीरे लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा,


"ससुराल उसका घर ज़रूर होता है, लेकिन मायका कभी पराया नहीं होता। जिस घर में उसने चलना सीखा, बोलना सीखा, जहाँ उसके माँ-बाप आज भी उसका इंतज़ार करते हैं, वह घर उससे कैसे छिन सकता है?"


कमला देवी कुछ कहने ही वाली थीं कि तभी दीनानाथ जी, जो अब तक चुपचाप बैठे थे, पहली बार बोले—


"कमला... शायद समधन जी गलत नहीं कह रहीं।"


पूरा कमरा एकदम शांत हो गया।


कमला देवी ने आश्चर्य से अपने पति की ओर देखा।


उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि आज उनके पति ने पहली बार इस विषय पर उनके सामने अलग राय रखी है।


यहीं से उस घर में वर्षों से चली आ रही सोच बदलने की शुरुआत होने वाली थी...



दीनानाथ जी के इतना कहते ही पूरे कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।


कमला देवी ने हैरानी से अपने पति की ओर देखा।


"आप... आप भी यही कह रहे हैं?"


दीनानाथ जी ने गहरी साँस ली और कुर्सी से उठकर खिड़की के पास चले गए। कुछ क्षण तक बाहर देखते रहे, जैसे बीते हुए सालों की कोई तस्वीर उनकी आँखों के सामने घूम रही हो।


फिर धीरे-धीरे बोले,


"कमला, शायद आज समय आ गया है कि मैं तुम्हें एक ऐसी बात बताऊँ, जो मैंने कभी किसी से नहीं कही।"


सभी की नज़रें उनकी ओर टिक गईं।


उन्होंने कहना शुरू किया—


"जब मेरी छोटी बहन सरोज की शादी हुई थी, तब उसके ससुराल वालों की सोच भी बिल्कुल ऐसी ही थी। वे कहते थे कि शादी के बाद लड़की का मायके से कोई लेना-देना नहीं रहता।"


दीनानाथ जी की आवाज़ भर्रा गई।


"हम हर त्योहार पर उसे बुलाते थे, लेकिन हर बार कोई न कोई बहाना बना दिया जाता था। कभी कहा जाता—बहू के बिना घर नहीं चलेगा, कभी कहा जाता—अभी समय ठीक नहीं है।"


उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं।


"एक दिन मुझे खबर मिली कि मेरी माँ बहुत बीमार हैं। उन्होंने आख़िरी बार सिर्फ एक बात कही थी—'मुझे मेरी बेटी सरोज से मिला दो।'"


कमरे में बैठे सभी लोग चुप थे।


दीनानाथ जी की आँखों से आँसू बह निकले।


"लेकिन... सरोज नहीं आ सकी। उसके ससुराल वालों ने उसे आने नहीं दिया।"


उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा,


"मेरी माँ अपनी बेटी का इंतज़ार करते-करते इस दुनिया से चली गईं।"


शारदा देवी की आँखें भी भर आईं।


पूजा ने पहली बार अपने ससुर को इस तरह टूटते हुए देखा था।


दीनानाथ जी ने कमला देवी की तरफ देखा।


"कमला... उस दिन मैंने मन ही मन कसम खाई थी कि अगर कभी मेरे घर बहू आएगी, तो उसे उसकी माँ से कभी दूर नहीं करूँगा।"


उन्होंने सिर झुका लिया।


"लेकिन मैं अपनी ही कसम भूल गया।"


कमला देवी के चेहरे का रंग उड़ चुका था।


उन्हें याद आने लगा कि कितनी बार पूजा ने मायके जाने की इच्छा जताई थी और हर बार उन्होंने ही मना किया था।


उन्हें यह भी याद आया कि पिछले साल रक्षाबंधन पर पूजा अपने भाई से मिलने जाना चाहती थी।


उन्होंने साफ़ कह दिया था—


"बहुएँ हर त्योहार पर मायके नहीं जातीं।"


उस दिन पूजा चुपचाप अपने कमरे में जाकर रोई थी।


आज वही दृश्य कमला देवी की आँखों के सामने घूम रहा था।


उनके भीतर अपराधबोध का तूफ़ान उठने लगा।


उसी समय अमित ने धीरे से कहा,


"माँ... अगर आज पापा अपनी बहन का दर्द नहीं बताते, तो शायद हम सब अपनी गलती कभी समझ ही नहीं पाते।"


कमला देवी की आँखों से भी आँसू निकल पड़े।


वह धीरे-धीरे पूजा के पास आईं।


पूजा घबरा गई।


उसे लगा शायद फिर कोई डाँट पड़ेगी।


लेकिन अगले ही पल कमला देवी ने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया।


उनकी आवाज़ काँप रही थी।


"पूजा... मुझे माफ़ कर दे बेटा।"


पूजा ने हैरानी से उनकी ओर देखा।


"मम्मी जी..."


कमला देवी की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने पूजा का हाथ पकड़कर कहा,

"मैंने हमेशा तुझे बहू समझा... बेटी नहीं। मैं यह भूल गई कि जिस तरह मुझे अपनी बेटी रिया से प्यार है, उसी तरह तेरी माँ भी तुझे याद करती होंगी।"


पूजा की आँखों से आँसू बहने लगे।


कमला देवी ने उसे गले लगा लिया।


पूरा कमरा भावुक हो उठा।


शारदा देवी भी अपने आँसू नहीं रोक सकीं।


कुछ देर बाद कमला देवी शारदा देवी के सामने आकर खड़ी हो गईं।


उन्होंने दोनों हाथ जोड़ लिए।


"समधन जी... मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने आपके दिल का दर्द कभी समझने की कोशिश ही नहीं की।"


शारदा देवी ने तुरंत उनके हाथ पकड़ लिए।


"नहीं समधन जी... हाथ जोड़कर मुझे शर्मिंदा मत कीजिए। रिश्ते माफ़ी से नहीं, अपनापन से मज़बूत होते हैं।"


कमला देवी फूट-फूटकर रो पड़ीं।


उन्होंने कहा,


"आज से पूजा जब चाहे अपने मायके जाएगी। उसे किसी से इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं होगी।"


पूजा ने अपनी माँ की तरफ देखा।


दोनों की आँखों में इस बार दर्द नहीं, सुकून था।


हरिराम जी ने मुस्कुराते हुए कहा,


"आज हमारी बेटी सच में दो घरों की हो गई है... किसी एक घर की नहीं।"


अमित ने पूजा का हाथ थाम लिया।


"चलो पूजा... इस बार तुम अपने माँ-पापा के साथ जितने दिन चाहो रहना। और हाँ, मैं खुद तुम्हें छोड़ने भी आऊँगा और लेने भी।"


पूजा मुस्कुरा दी।


करीब दो साल बाद उसके चेहरे पर वैसी ही मुस्कान लौटी थी, जैसी उसकी विदाई से पहले हुआ करती थी।


लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई...


जब पूजा अपने मायके पहुँची, तब वहाँ उसका एक ऐसा स्वागत हुआ जिसने पूरे मोहल्ले की सोच बदल दी।



पूजा जैसे ही अपने मायके के दरवाज़े पर पहुँची, उसकी धड़कन तेज़ हो गई।


यही वह आँगन था जहाँ उसने बचपन में दौड़ना सीखा था। यही वह चौखट थी, जहाँ से दुल्हन बनकर विदा हुई थी। लगभग दो साल बाद वह फिर उसी घर के सामने खड़ी थी।


शारदा देवी ने पूजा की आरती उतारी।


उनकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे, लेकिन इस बार ये आँसू दर्द के नहीं, खुशी के थे।


हरिराम जी मुस्कुराते हुए बोले,


"आ जा बेटी... यह घर आज फिर से पूरा हो गया।"


पूजा ने झुककर घर की चौखट को छुआ और अंदर कदम रखा।


घर की हर चीज़ उसे अपने बचपन की याद दिला रही थी। दीवार पर टंगी उसकी स्कूल की तस्वीर, आँगन का पुराना झूला, वह नीम का पेड़, जिसके नीचे बैठकर वह घंटों पढ़ाई किया करती थी।


उसने चारों तरफ नज़र दौड़ाई और भावुक होकर बोली,


"माँ... आपने मेरा कमरा बिल्कुल वैसा ही रखा है?"


शारदा देवी मुस्कुराईं।


"माँ का घर कभी बेटी का कमरा नहीं बदलता। उसे हमेशा उम्मीद रहती है कि उसकी बेटी किसी दिन दरवाज़ा खोलकर कहेगी—'माँ, मैं आ गई।'"


यह सुनते ही पूजा फिर माँ के गले लग गई।



पूजा के मायके आने की खबर पूरे मोहल्ले में फैल गई।


पड़ोस की विमला चाची मिठाई लेकर आ गईं।


"लो भई, हमारी बेटी घर लौट आई।"


एक-एक करके पड़ोसी आने लगे।


सब पूजा से मिलकर खुश थे।


लेकिन कुछ लोग धीरे-धीरे आपस में बातें भी कर रहे थे।


"इतने साल बाद आई है?"


"हाँ, सुना है ससुराल वाले भेजते ही नहीं थे।"


इतने में शारदा देवी ने सबके सामने मुस्कुराकर कहा,


"अब ऐसी कोई बात नहीं है। दोनों परिवार मिलकर अपनी गलती समझ चुके हैं। रिश्ते जीत गए हैं, अहंकार हार गया है।"


उसी समय बाहर एक कार आकर रुकी।


सबकी नज़र उधर गई।


कार से अमित, कमला देवी और दीनानाथ जी उतरे।


उन्हें देखकर सब हैरान रह गए।


कमला देवी के हाथ में फलों और मिठाइयों की टोकरी थी।


उन्होंने घर में प्रवेश करते ही शारदा देवी से कहा,


"समधन जी... आज हम अपनी बेटी से मिलने आए हैं।"


उन्होंने जानबूझकर 'बहू' नहीं, 'बेटी' कहा।


यह सुनते ही शारदा देवी की आँखें भर आईं।


कमला देवी पूजा के पास गईं और बोलीं,


"बेटा, जितने दिन मन करे यहाँ रहो। लेकिन एक बात याद रखना... वहाँ भी एक माँ तुम्हारा इंतज़ार करेगी।"


पूजा मुस्कुरा दी।


उसने आगे बढ़कर अपनी सास को गले लगा लिया।



दीनानाथ जी ने हरिराम जी का हाथ पकड़कर कहा,


"समधी जी, आज मैं एक वादा करने आया हूँ।"


हरिराम जी ने आश्चर्य से पूछा,

"कैसा वादा, समधी जी?"


दीनानाथ जी भावुक होकर बोले,

"अब से पूजा के मायके आने के लिए किसी इजाज़त की ज़रूरत नहीं होगी। यह उसका घर था, है और हमेशा रहेगा।"


हरिराम जी की आँखों में खुशी छलक आई।


उन्होंने कहा,


"और हमारे घर के दरवाज़े भी आपके लिए हमेशा खुले रहेंगे। अब हम सिर्फ समधी नहीं, एक परिवार हैं।"



कुछ दिन बाद पूजा वापस अपने ससुराल लौटी।


लेकिन इस बार उसके चेहरे पर उदासी नहीं थी।


कमला देवी ने घर पहुँचते ही कहा,


"पूजा, पहले अपनी माँ को फ़ोन कर लो। उन्हें बता दो कि तुम आराम से पहुँच गई हो।"


पूजा ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।


कमला देवी मुस्कुराईं।


"अब समझ गई हूँ... बेटी चाहे जहाँ रहे, माँ का दिल तब तक शांत नहीं होता, जब तक उसकी आवाज़ सुन न ले।"


पूजा ने तुरंत अपनी माँ को फ़ोन लगाया।


"माँ, मैं ठीक से पहुँच गई।"


उधर से शारदा देवी की हँसी सुनाई दी।


"खुश रह मेरी बच्ची।"


पूजा ने फ़ोन रखा तो उसकी आँखों में संतोष था।


उसे लगा कि अब सचमुच उसके दो घर हैं।



समय बीतता गया।


कुछ महीनों बाद रक्षाबंधन आया।


इस बार कमला देवी ने खुद पूजा से कहा,


"बेटा, अपने भाई के लिए राखी खरीद ली क्या? अगर नहीं, तो चलो मैं तुम्हें बाज़ार ले चलती हूँ।"


पूजा की आँखें खुशी से चमक उठीं।


उसने मन ही मन सोचा—


"काश हर सास यह समझ जाए कि बहू का मायका उसका अतीत नहीं, उसकी पहचान होता है।"


कहानी की सीख:

बेटी की शादी उसका मायका छीनने के लिए नहीं होती, बल्कि उसके परिवार को बड़ा करने के लिए होती है।


जिस घर में बहू को उसके माँ-बाप से मिलने का अधिकार नहीं मिलता, वहाँ रिश्ते धीरे-धीरे बोझ बन जाते हैं।


लेकिन जहाँ बहू को बेटी का सम्मान मिलता है, वहाँ घर नहीं, परिवार बसते हैं।


अगर आपको लगता है कि शादी के बाद भी हर बेटी का अपने मायके पर उतना ही हक है जितना पहले था, तो अपनी राय ज़रूर लिखिए। क्योंकि बेटी कभी पराई नहीं होती, वह सिर्फ़ दो परिवारों के प्यार को जोड़ने वाली सबसे खूबसूरत कड़ी बन जाती है।



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