जिसने मेरी चुप्पी में सम्मान देख लिया
"जिस लड़की को अपने ही घर में हर दिन तानों का सामना करना पड़ता था... एक अनजान इंसान ने उसकी चुप्पी में छिपा सम्मान पहचान लिया।"
पूजा की उम्र छत्तीस वर्ष थी। उसके चेहरे पर बनावटी मुस्कान रहती थी, लेकिन आँखों में हमेशा एक अधूरापन दिखाई देता था।
जब वह सोलह साल की थी, तभी एक सड़क दुर्घटना में उसके माता-पिता का निधन हो गया था। तीनों बड़े भाइयों ने उसे अपने पास रख लिया। शुरू-शुरू में सबने बहुत प्यार दिया, लेकिन समय के साथ घर में बहुएँ आ गईं और माहौल बदलने लगा।
भाइयों का प्यार कम नहीं हुआ, मगर घर की बागडोर अब भाभियों के हाथ में थी। पूजा का हर काम उनकी मर्जी से होता।
पूजा का रंग साँवला था और वह साधारण रूप-रंग वाली लड़की थी। यही बात उसे सबसे ज़्यादा सुननी पड़ती।
"इतनी बड़ी हो गई... अब कौन करेगा इससे शादी?"
"दर्पण देखकर भी इसे शर्म नहीं आती।"
"भगवान ने रंग तो थोड़ा अच्छा दे दिया होता।"
ऐसे ताने अब उसके जीवन का हिस्सा बन चुके थे।
पूजा पास के एक स्कूल में पढ़ाती थी। तनख्वाह बहुत ज़्यादा नहीं थी, लेकिन अपने छोटे-मोटे खर्च खुद उठा लेती थी। घर का लगभग सारा काम भी वही करती थी। सुबह से रात तक रसोई, सफाई, बच्चों की देखभाल और फिर स्कूल।
कभी किसी ने उससे यह नहीं पूछा कि वह थकती भी है या नहीं।
रिश्ते भी कई बार आए, लेकिन हर बार कोई न कोई कमी निकालकर बात खत्म हो गई। कहीं रंग आड़े आया, कहीं दहेज, तो कहीं उम्र।
धीरे-धीरे पूजा ने भी उम्मीद करना छोड़ दिया।
एक दिन स्कूल की प्रधानाचार्या ने उसे अपने कमरे में बुलाया।
"पूजा, तुमसे कोई मिलने आया है।"
वह हैरान हो गई।
कमरे में एक शांत स्वभाव के व्यक्ति बैठे थे। उम्र करीब बयालीस वर्ष होगी।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा,
"मेरा नाम निखिल है। मैं सरकारी बैंक में शाखा प्रबंधक हूँ।"
पूजा कुछ समझ नहीं पाई।
प्रधानाचार्या ने बताया कि निखिल की पत्नी का तीन साल पहले बीमारी से निधन हो चुका था। उनकी सात साल की बेटी थी।
निखिल ने कहा,
"मैं कई महीनों से आपको स्कूल आते-जाते देखता रहा हूँ। आपके व्यवहार के बारे में भी लोगों से सुना। मुझे दिखावा पसंद नहीं। मुझे एक ऐसी साथी चाहिए जो रिश्तों की कीमत समझती हो।"
पूजा चुप रही।
निखिल ने आगे कहा,
"अगर आपको लगे कि मैं आपके योग्य हूँ, तभी आगे बात होगी। कोई जल्दी नहीं है।"
इतना सम्मान शायद पहली बार किसी ने उसे दिया था।
कुछ दिनों बाद निखिल अपने बड़े भाई और भाभी के साथ पूजा के घर आए।
तीनों भाभियाँ आज पहली बार बहुत मीठा व्यवहार कर रही थीं।
"अरे पूजा... ज़रा अच्छी साड़ी पहनकर आना।"
"मुस्कुराना भी... ऐसे उदास मत दिखना।"
पूजा सब समझ रही थी।
चाय बनाकर वह ट्रे लेकर आई।
जैसे ही उसने कप रखा, छोटी भाभी बोली,
"देखना... कहीं चाय फीकी न हो।"
निखिल ने कप उठाया।
एक घूँट पीकर मुस्कुराए।
"बहुत बढ़िया चाय है।"
भाभियों के चेहरे उतर गए।
तभी बड़े भाई का बेटा दौड़ता हुआ आया।
"बुआ... मेरी स्कूल की ड्रेस कहाँ है? आपने अभी तक प्रेस नहीं की?"
पूजा कुछ बोलती, उससे पहले बड़ी भाभी बोली,
"अरे, अभी कर देगी। इसे तो सारे घर का काम करना ही पड़ता है।"
निखिल ने पहली बार पूरे घर को ध्यान से देखा।
उन्होंने धीरे से पूछा,
"पूजा जी, क्या आप रोज़ स्कूल के बाद भी इतना काम करती हैं?"
पूजा ने सिर झुका लिया।
"घर है... करना तो पड़ता है।"
निखिल ने बिना किसी गुस्से के कहा,
"काम करना गलत नहीं है। लेकिन किसी एक इंसान पर पूरा घर छोड़ देना भी ठीक नहीं।"
कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
बात आगे बढ़ी।
निखिल ने साफ शब्दों में कहा,
"अगर पूजा इस रिश्ते के लिए तैयार हैं, तो मेरी एक ही शर्त है।"
सबने उत्सुकता से उनकी ओर देखा।
"शादी के बाद इन्हें कभी यह महसूस नहीं होना चाहिए कि ये किसी पर बोझ हैं।"
भाभियाँ बनावटी मुस्कान देती रहीं।
रिश्ता तय हो गया।
अगले पंद्रह दिनों बाद विवाह था।
इन दिनों पहली बार पूजा के साथ अच्छा व्यवहार होने लगा।
उसे आराम करने को कहा जाता।
उसकी पसंद का खाना बनने लगा।
लेकिन पूजा समझ रही थी कि यह बदलाव हमेशा के लिए नहीं है।
विवाह का दिन भी आ गया।
सभी रस्में पूरी हुईं।
विदाई के समय तीनों भाई रो पड़े।
पूजा भी खुद को रोक नहीं पाई।
तभी निखिल ने भाइयों से कहा,
"मैं आपकी बहन को अपने घर ले जा रहा हूँ, लेकिन उसका रिश्ता आपसे कभी नहीं टूटेगा। जब चाहे मिलने आएँ।"
भाभियाँ चुप थीं।
ससुराल पहुँचते ही सात साल की नन्ही आर्या धीरे-धीरे उसके पास आई।
उसने डरते-डरते पूछा,
"क्या मैं आपको मम्मा कह सकती हूँ?"
पूजा की आँखें भर आईं।
उसने बच्ची को गले लगा लिया।
उस दिन पहली बार उसे लगा कि किसी ने उसे सिर्फ ज़िम्मेदारी नहीं, अपना परिवार भी दिया है।
दिन बीतते गए।
आर्या और पूजा के बीच ऐसा रिश्ता बना कि लोग हैरान रह जाते।
एक वर्ष बाद स्कूल में "मातृ सम्मान समारोह" आयोजित हुआ।
बच्चों को अपनी माँ के बारे में बोलना था।
आर्या मंच पर पहुँची।
उसने कहा,
"मेरी मम्मा ने मुझे जन्म नहीं दिया, लेकिन जीना सिखाया है। उन्होंने कभी मुझे यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं अधूरी हूँ।"
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
पीछे बैठी पूजा की आँखों से आँसू बह निकले।
कार्यक्रम के बाद निखिल ने मुस्कुराकर कहा,
"उस दिन मैंने तुम्हारी चुप्पी में जो सम्मान देखा था, आज पूरी दुनिया उसे देख रही है।"
उसी समय पूजा के तीनों भाई भी वहाँ पहुँचे थे।
उन्होंने अपनी बहन को सम्मान पाते देखा तो गर्व से उनकी आँखें भर आईं।
बड़ी भाभी धीरे से उसके पास आई।
"पूजा... अगर कभी हमने तुम्हारा दिल दुखाया हो तो हमें माफ़ कर देना।"
पूजा मुस्कुराई।
"कुछ रिश्ते माफी से नहीं, बदलते व्यवहार से सँवरते हैं।"
भाभियों ने सिर झुका लिया।
घर लौटते समय आर्या ने पूजा का हाथ कसकर पकड़ लिया।
"मम्मा... आप हमेशा मेरे साथ रहेंगी ना?"
पूजा ने मुस्कुराकर कहा,
"जब रिश्ते दिल से बनते हैं, तब साथ निभाने के लिए किसी वादे की ज़रूरत नहीं पड़ती।"
उसकी यह बात सुनकर निखिल की आँखों में संतोष झलक उठा।
जिस लड़की को कभी अपने ही घर में सम्मान नहीं मिला था, वही आज किसी की सबसे बड़ी ताकत, किसी की आदर्श पत्नी और किसी मासूम की सबसे प्यारी माँ बन चुकी थी।
सीख:
इंसान की खूबसूरती उसके चेहरे से नहीं, उसके व्यवहार और संस्कारों से पहचानी जाती है। जो लोग दूसरों का सम्मान करना जानते हैं, उन्हें जीवन एक दिन ऐसा सम्मान ज़रूर लौटाता है जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होती।

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