अनदेखी मेहनत
"अगर इस घर में मेरी मेहनत सिर्फ़ एक आदत बनकर रह गई है... तो शायद अब समय आ गया है कि आप लोग मेरी कमी भी महसूस करें।"
इतना कहकर नंदिता ने अपने हाथ से रसोई का एप्रन उतारा, कुर्सी की पीठ पर टाँगा और बिना किसी गुस्से के ड्रॉइंग रूम की तरफ़ बढ़ गई।
घर में बैठे सभी लोग उसकी ओर देखने लगे।
सास कमला देवी के हाथ में पूजा की माला थी, पति रोहित मोबाइल पर किसी ऑफिस मेल में व्यस्त था और ससुर गोविंद जी चुपचाप सामने रखे पानी के गिलास को देख रहे थे।
कुछ पल के लिए पूरे घर में ऐसी ख़ामोशी छा गई, जैसे किसी ने सारी आवाज़ें रोक दी हों।
कमला देवी ने सबसे पहले चुप्पी तोड़ी।
"बहू, ये क्या नया नाटक है? दो दिन से देख रही हूँ, तेरी बातें बदल गई हैं।"
नंदिता ने शांत स्वर में कहा, "माँ जी, नाटक नहीं... बस अब अपने मन की बात कह रही हूँ।"
रोहित ने बिना सिर उठाए कहा, "ऑफिस का बहुत तनाव है, घर में बहस मत शुरू करो।"
नंदिता हल्का-सा मुस्कुराई।
"यही तो बात है रोहित... घर में मेरी बातें हमेशा 'बहस' बन जाती हैं, लेकिन मेरी मेहनत कभी चर्चा का विषय नहीं बनती।"
रोहित ने पहली बार मोबाइल नीचे रखा।
"मतलब?"
"मतलब यह कि जिस दिन मैं इस घर में एक भी काम न करूँ... रसोई में चूल्हा न जलाऊँ, बाबूजी की दवा समय पर न दूँ, आपके कपड़े न समेटूँ, किसी की पसंद-नापसंद का ध्यान न रखूँ... उस दिन शायद आप सबको एहसास होगा कि मैं इस घर में सिर्फ़ काम करने वाली बहू नहीं हूँ। मैं भी इस परिवार का एक हिस्सा हूँ... जिसकी मौजूदगी और मेहनत की भी एक कीमत है।"
गोविंद जी ने धीरे से कहा, "बहू... बैठकर बात करो।"
नंदिता उनके सामने बैठ गई।
उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था, बस वर्षों की थकान थी।
उसने धीरे-धीरे कहना शुरू किया—
"जब मेरी शादी हुई थी, तब मैंने सोचा था कि यह घर मेरा भी होगा। मैं सबको अपना मानकर आई थी। माँ जी की पसंद सीखी, बाबूजी की दवाइयों का समय याद किया, रोहित की हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ध्यान रखा।"
"लेकिन इतने सालों में किसी ने मुझसे यह नहीं पूछा कि मैं कैसी हूँ।"
कमला देवी कुछ कहना चाहती थीं, मगर शब्द नहीं मिले।
नंदिता आगे बोली—
"अगर मैं बीमार पड़ जाऊँ तो भी सबसे पहला सवाल यही होता है—'खाना कौन बनाएगा?'"
रोहित के चेहरे का रंग बदलने लगा।
उसे याद आने लगा कि पिछले महीने तेज़ बुखार होने के बावजूद नंदिता रसोई में खड़ी थी और उसने सिर्फ़ इतना कहा था—
"दवा खा लेना... मुझे देर हो रही है।"
उस दिन उसने एक बार भी नहीं पूछा था कि उसकी तबीयत कैसी है।
गोविंद जी ने लंबी साँस ली।
उन्हें भी कई बातें याद आने लगीं।
जब-जब उनकी शुगर बढ़ी, नंदिता ही डॉक्टर के पास लेकर गई।
जब उनकी आँख का ऑपरेशन हुआ, तब पूरे पाँच दिन अस्पताल में वही रुकी थी।
रोहित सिर्फ़ शाम को मिलने आता था।
कमला देवी भी चुप थीं।
उन्हें अचानक याद आया कि पिछले साल उनके घुटनों का दर्द बढ़ गया था।
रात-रात भर नंदिता उनके पैरों पर तेल लगाती रही थी।
लेकिन ठीक होते ही उन्होंने फिर वही कहना शुरू कर दिया—
"बहू का काम ही तो है।"
उसी समय दरवाज़े की घंटी बजी।
पड़ोस की सुधा आंटी आईं।
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
"कमला जी, आपकी बहू घर पर है? मेरी तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है... सोचा उससे ब्लड प्रेशर मशीन ले लूँ।"
कमला देवी ने आश्चर्य से पूछा,
"तुम्हें कैसे पता कि मशीन है?"
सुधा आंटी बोलीं,
"अरे, पिछले महीने मेरे पति की तबीयत खराब हुई थी। रात को यही बहू दवा लेकर आई थी। उसी ने मशीन से बीपी भी चेक किया था।"
कमला देवी चौंक गईं।
उन्हें तो यह बात भी नहीं मालूम थी।
सुधा आंटी चली गईं।
घर में फिर सन्नाटा छा गया।
गोविंद जी ने पहली बार अपनी पत्नी की तरफ़ देखा।
"कमला... हमें शायद अपनी बहू को कभी समझने का समय ही नहीं मिला।"
कमला देवी ने कोई जवाब नहीं दिया।
इसी बीच रोहित का फोन बजा।
ऑफिस से कॉल था।
उसने फोन उठाया।
"रोहित, आज की प्रेज़ेंटेशन की सारी फाइलें कहाँ हैं?"
रोहित घबरा गया।
उसे याद आया कि सारी फाइलें उसने घर पर रखी थीं।
वह तुरंत कमरे में गया।
पूरा कमरा उलट-पुलट कर दिया।
फाइल कहीं नहीं मिली।
नंदिता धीरे से अंदर आई।
"नीली अलमारी की दूसरी दराज़... बाईं तरफ़।"
रोहित ने दराज़ खोली।
फाइल बिल्कुल वहीं रखी थी।
साथ में एक छोटा-सा नोट भी था—
"ज़रूरी कागज़ हमेशा एक ही जगह रखना... ढूँढ़ने में समय बचेगा।"
रोहित कुछ पल तक वह पर्ची देखता रहा।
उसे अचानक महसूस हुआ—
वह जिन छोटी-छोटी बातों को कभी महत्व नहीं देता था, वही उसकी ज़िंदगी को आसान बना रही थीं।
ऑफिस जाने से पहले उसने पहली बार कहा—
"थैंक यू..."
नंदिता मुस्कुरा दी।
"धन्यवाद रिश्तों को नहीं, आदतों को दिया जाता है। रिश्तों में साथ दिया जाता है।"
रोहित बिना कुछ बोले चला गया।
उस दिन ऑफिस में उसका मन बिल्कुल नहीं लगा।
हर थोड़ी देर बाद उसे घर की बातें याद आती रहीं।
शाम तक वह बेचैन हो चुका था।
दूसरी तरफ़ घर में गोविंद जी अपनी पुरानी लकड़ी की अलमारी खोल रहे थे।
कई पुराने कागज़ों के बीच उन्हें एक लिफ़ाफ़ा मिला।
उस पर उनके अपने ही हाथों की लिखावट थी—
"जिस दिन मुझे लगे कि मेरे बच्चे रिश्तों का अर्थ भूल रहे हैं... उस दिन यह पत्र ज़रूर पढ़ना।"
गोविंद जी ने काँपते हाथों से वह लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक पुराना पत्र रखा था।
उन्होंने पहला वाक्य पढ़ा...
और उनकी आँखें अचानक भर आईं।
पत्र में ऐसा क्या लिखा था, जिसने उनके मन की नींव तक हिला दी...
गोविंद जी ने काँपते हाथों से वह पुराना पत्र खोला।
कागज़ पीला पड़ चुका था, लेकिन उस पर लिखे शब्द आज भी उतने ही साफ़ थे।
उन्होंने पढ़ना शुरू किया—
"अगर कभी ऐसा लगे कि घर में किसी एक इंसान की मेहनत को लोग उसका फ़र्ज़ समझकर भूलने लगे हैं, तो समझ लेना कि घर धीरे-धीरे मकान बन रहा है। उस दिन किसी एक व्यक्ति को मत बदलना, पूरे परिवार को आईना दिखाना।"
गोविंद जी कुछ पल तक चुप बैठे रहे।
उनकी आँखों के सामने पिछले कई साल घूमने लगे।
उन्हें याद आया कि नंदिता इस घर में आई थी तो कितनी हँसमुख थी।
हर छोटी बात पर खिलखिलाकर हँसती थी।
हर त्योहार के लिए नई-नई सजावट करती थी।
हर जन्मदिन पर अपने हाथ से केक बनाती थी।
लेकिन पिछले दो-तीन सालों से उसकी हँसी कम होती चली गई।
वह काम तो पहले से भी ज़्यादा करती रही, मगर मुस्कुराना भूल गई।
गोविंद जी ने पत्र मोड़ा और बाहर आ गए।
कमला देवी मंदिर के सामने बैठी थीं।
उन्होंने धीरे से पूछा, "कमला, तुम्हें याद है... आख़िरी बार हमने अपनी बहू से सिर्फ़ उसका हाल कब पूछा था?"
कमला देवी ने बहुत सोचा।
लेकिन उन्हें कोई जवाब नहीं मिला।
उसी समय रोहित भी ऑफिस से लौट आया।
वह असामान्य रूप से शांत था।
उसने जूते उतारे और सीधे रसोई की ओर चला गया।
नंदिता रात का खाना बना रही थी।
रोहित कुछ देर तक उसे चुपचाप काम करते हुए देखता रहा।
फिर बोला, "तुम पूरे दिन थक नहीं जाती?"
नंदिता हल्का-सा मुस्कुराई।
"थक जाती हूँ।"
रोहित की आँखों में पछतावा उतर आया। उसने फिर पूछा, "फिर कभी बताया क्यों नहीं?"
नंदिता ने कुछ पल उसकी ओर देखा। उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं, सिर्फ़ दर्द था। "बताया था... लेकिन शायद किसी ने सुना नहीं।"
रोहित के पास कोई जवाब नहीं था।
उस रात खाने की मेज़ पर पहली बार सब लोग एक साथ बैठे।
लेकिन इस बार बातचीत सामान्य नहीं थी।
गोविंद जी ने अपनी जेब से वही पुराना पत्र निकाला।
उन्होंने पूरा पत्र सबको पढ़कर सुनाया।
घर में फिर सन्नाटा छा गया।
कमला देवी की आँखें झुक गईं।
रोहित का सिर भी नीचे था।
कुछ देर बाद कमला देवी धीरे से बोलीं,
"बहू... मुझे माफ़ कर दे।"
नंदिता ने तुरंत कहा,
"माँ जी, इतनी बड़ी बात मत कहिए।"
कमला देवी की आवाज़ भर्रा गई।
"नहीं बहू... आज कहना ज़रूरी है। मैंने हमेशा सोचा कि घर चलाना बहू की ज़िम्मेदारी है। लेकिन कभी यह नहीं सोचा कि बहू भी इंसान होती है। उसे भी आराम चाहिए, सम्मान चाहिए, अपनेपन के दो शब्द चाहिए।"
इतना कहते-कहते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
नंदिता तुरंत उनके पास गई और उनका हाथ पकड़ लिया।
"माँ जी, रिश्ते जीतने के लिए नहीं, निभाने के लिए होते हैं।"
अगले ही दिन घर का माहौल बदलने लगा।
रोहित ने रविवार की छुट्टी का इंतज़ार नहीं किया।
सुबह उठते ही उसने कहा,
"आज नाश्ता मैं बनाऊँगा।"
पहली रोटी गोल नहीं बनी।
दूसरी थोड़ी जल गई।
तीसरी ठीक बनी।
नंदिता हँस पड़ी।
रोहित भी हँसने लगा।
कमला देवी पहली बार उस हँसी में शामिल हुईं।
कुछ दिनों बाद गोविंद जी की तबीयत फिर थोड़ी बिगड़ गई।
डॉक्टर ने आराम की सलाह दी।
इस बार सिर्फ़ नंदिता ही नहीं, पूरा परिवार उनके साथ था।
रोहित दवा लाता।
कमला देवी समय पर खाना देतीं।
देवर डॉक्टर की पर्ची संभालता।
गोविंद जी मुस्कुराकर कहते,
"अब सच में लगता है कि मैं परिवार के बीच हूँ।"
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।
एक दिन रोहित के ऑफिस में 'परिवार और कार्य' विषय पर एक कार्यक्रम रखा गया।
हर कर्मचारी से कहा गया कि वह बताए कि उसे जीवन का सबसे बड़ा सबक किसने सिखाया।
जब रोहित का नाम पुकारा गया, तो वह मंच पर पहुँचा।
उसने माइक हाथ में लिया और कहा,
"मैंने हमेशा सोचा था कि कमाने वाला व्यक्ति ही घर की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी निभाता है। लेकिन मैं ग़लत था।"
पूरा हॉल शांत हो गया।
वह आगे बोला,
"घर चलाने वाला हर व्यक्ति बराबर सम्मान का हकदार होता है। मेरी पत्नी ने कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उसने सिर्फ़ इतना चाहा कि उसकी मेहनत को देखा जाए। मुझे यह समझने में सात साल लग गए।"
हॉल तालियों से गूँज उठा।
कार्यक्रम के बाद कई लोग रोहित के पास आए।
एक सहकर्मी बोला,
"आज घर जाकर सबसे पहले अपनी पत्नी को धन्यवाद कहूँगा।"
दूसरे ने कहा,
"मैंने कभी सोचा ही नहीं कि हम कितनी बातें सामान्य मान लेते हैं।"
रोहित मुस्कुरा दिया।
उसे लगा कि शायद उसकी गलती स्वीकार करने से किसी और का घर बेहतर हो जाए।
कुछ सप्ताह बाद नंदिता का जन्मदिन आया।
हर साल की तरह उसने खुद ही तैयारी शुरू कर दी।
लेकिन इस बार कमला देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"आज रसोई में नहीं जाना।"
नंदिता हैरान रह गई।
ड्रॉइंग रूम का दरवाज़ा खुला।
अंदर छोटी-सी सजावट थी।
गोविंद जी कुर्सी पर बैठे मुस्कुरा रहे थे।
रोहित के हाथ में केक था।
दीवार पर रंगीन कागज़ से लिखा था—
"इस घर की मुस्कान को जन्मदिन मुबारक।"
नंदिता की आँखें भर आईं।
उसने कभी कोई बड़ा उपहार नहीं माँगा था।
उसे सिर्फ़ यह एहसास चाहिए था कि उसकी मौजूदगी की कीमत है।
केक काटने के बाद गोविंद जी उठे।
उन्होंने सबके सामने कहा,
"घर की असली नींव ईंट नहीं होती... वह इंसान होता है जो बिना शोर किए सबको जोड़कर रखता है। और अगर उस इंसान का सम्मान नहीं किया, तो सबसे मज़बूत घर भी अंदर से खाली हो जाता है।"
कमला देवी ने सबके सामने नंदिता को गले लगा लिया।
उस दिन किसी ने तस्वीरें भी खींचीं।
लेकिन सबसे सुंदर तस्वीर किसी कैमरे में नहीं, सबके दिल में बनी।
कुछ महीनों बाद पड़ोस की सुधा आंटी अपने रिश्तेदारों के साथ घर आईं।
उन्होंने मुस्कुराकर कहा,
"कमला जी, पहले लोग आपके घर की तारीफ़ सजावट के लिए करते थे। अब लोग आपके परिवार की तारीफ़ व्यवहार के लिए करते हैं।"
कमला देवी ने गर्व से नंदिता की ओर देखा।
"यह बदलाव हमारी बहू ने नहीं... हमारी सोच ने किया है।"
नंदिता ने विनम्रता से कहा,
"सोच तभी बदलती है, जब कोई अपनी गलती मानने का साहस करे।"
गोविंद जी मुस्कुराए।
"और वही परिवार सबसे खुश रहता है, जहाँ माफ़ी माँगने वाला छोटा नहीं होता और माफ़ करने वाला बड़ा बनने की कोशिश नहीं करता।"
उस घर में अब भी वही लोग रहते थे।
वही दीवारें थीं।
वही रसोई थी।
लेकिन एक चीज़ बदल चुकी थी—
अब वहाँ काम बाँटे जाते थे, इंसान नहीं।
अब वहाँ ज़िम्मेदारियाँ साझा होती थीं, एहसान नहीं गिनाए जाते थे।
और सबसे बड़ी बात—
अब वहाँ "धन्यवाद" और "कैसी हो?" जैसे छोटे शब्द रोज़ सुनाई देते थे।
क्योंकि सच यही है—
जिस घर में किसी की मेहनत को आदत नहीं, सम्मान समझा जाता है... वहाँ रिश्ते कभी बूढ़े नहीं होते।

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