सिलाई मशीन की विरासत

 

Emotional Indian family scene showing a daughter-in-law respectfully holding a vintage sewing machine while her mother-in-law blesses her inside a warm and welcoming home.


"जिस दिन रचना ने सास के पुराने सिलाई मशीन को घर से हटाने की बात कही, उसी दिन उसे यह अंदाज़ा भी नहीं था कि वह किसी लोहे की मशीन नहीं, इस घर की सबसे अनमोल याद को कबाड़ समझ रही है।"


रचना की शादी को अभी ढाई महीने ही हुए थे। नए घर में सबका व्यवहार उसके प्रति अच्छा था। सास शारदा देवी शांत स्वभाव की थीं, ससुर गोपाल जी हँसमुख इंसान थे और पति अमन एक निजी कंपनी में इंजीनियर थे।


रचना पढ़ी-लिखी और आधुनिक सोच वाली लड़की थी। उसे घर को सलीके से सजाना बहुत पसंद था। वह चाहती थी कि हर कमरा साफ़-सुथरा और आधुनिक दिखाई दे।


एक दिन उसने पूरे घर की सफाई का जिम्मा अपने ऊपर ले लिया।


ड्रॉइंग रूम, रसोई और बेडरूम के बाद उसकी नज़र स्टोर रूम पर पड़ी।


स्टोर का दरवाज़ा खोलते ही उसे कई पुरानी चीज़ें दिखाई दीं—पीतल के बर्तन, लकड़ी का एक छोटा संदूक, कुछ पुराने फोटो फ्रेम और एक कोने में रखी काले रंग की पुरानी सिलाई मशीन।


मशीन पर हल्की धूल ज़रूर थी, लेकिन उसे देखकर लगता था कि कोई उसे समय-समय पर साफ़ करता है।


रचना ने धीरे से मशीन को हाथ लगाया और मुस्कुराकर बोली,


"इतनी पुरानी मशीन! आजकल तो कोई इसे संग्रहालय में रखे, घर में नहीं।"


उसी समय शारदा देवी अंदर आ गईं।


उन्होंने मुस्कुराकर पूछा,


"क्या देख रही हो बेटा?"


रचना ने सहजता से कहा,


"मम्मी जी, यह मशीन अब किस काम आती है? अगर इसे हटा दें तो यहाँ छोटी-सी अलमारी आ जाएगी। जगह भी बच जाएगी।"


शारदा देवी कुछ पल चुप रहीं।


उन्होंने मशीन के हैंडल पर हाथ फेरा और बहुत शांत आवाज़ में बोलीं,


"अभी इसे यहीं रहने दो।"


बस इतना ही।


न उन्होंने डाँटा, न समझाया।


रचना ने भी बात आगे नहीं बढ़ाई, लेकिन उसके मन में सवाल रह गया।


"इतनी पुरानी चीज़ से इतना लगाव क्यों?"


उस रात खाने की मेज़ पर भी उसने मज़ाक में कहा,


"पापा जी, आपकी वो पुरानी मशीन तो किसी एंटीक पीस जैसी लगती है।"


गोपाल जी मुस्कुरा दिए।


"बिल्कुल है। फर्क सिर्फ़ इतना है कि उसकी कीमत बाज़ार नहीं लगा सकता।"


रचना उनकी बात का मतलब नहीं समझी।


दो दिन बाद पड़ोस में रहने वाली सीमा अपने दस साल के बेटे रोहन को लेकर आई।


रोहन की स्कूल यूनिफॉर्म बुरी तरह फट गई थी।


सीमा बोली,


"भाभी जी, दर्जी ने कहा है कि कल शाम तक मिलेगा। लेकिन बच्चे का टेस्ट है। सोचा, अगर आपके पास कोई उपाय हो…"


शारदा देवी बिना कुछ कहे स्टोर में गईं।


उन्होंने वही पुरानी मशीन बाहर निकाली।


धागा डाला, पैर से पैडल चलाया और कुछ ही मिनटों में यूनिफॉर्म बिल्कुल नई जैसी सिल गई।


सीमा खुशी से बोली,


"आपने फिर मेरी परेशानी दूर कर दी।"


रचना हैरानी से सब देख रही थी।


उसने पहली बार अपनी सास को मशीन चलाते देखा था।


उनके हाथों में ऐसा आत्मविश्वास था, जैसे कोई कलाकार अपने सबसे प्रिय वाद्य को बजा रहा हो।


सीमा जाते-जाते बोली,


"भाभी जी, अगर आप न होतीं तो पता नहीं हमारे जैसे लोगों का कितनी बार काम रुक जाता।"


शारदा देवी मुस्कुरा दीं।


"पड़ोसी ही तो अपने काम आते हैं।"


उस शाम रचना ने पूछा,


"मम्मी जी, आपने सिलाई कहाँ सीखी?"


शारदा देवी मुस्कुराकर बोलीं, "ज़रूरत ने सिखा दी, बेटा।"


रचना हैरानी से बोली, "मतलब?"


शारदा देवी ने जवाब देने के बजाय मुस्कुराकर बात बदल दी।


"चलो, चाय पीते हैं।"


रचना को लगा कि शायद कोई पुरानी बात होगी, इसलिए उसने ज़्यादा पूछना ठीक नहीं समझा।


लेकिन अब उसकी उत्सुकता बढ़ चुकी थी।


वह रोज़ देखती कि कोई न कोई पड़ोसी किसी न किसी कपड़े के साथ आ ही जाता।


किसी का तकिया फट गया होता, किसी की साड़ी का फॉल निकल गया होता, किसी बच्चे का स्कूल बैग खुल गया होता।


शारदा देवी सबका काम कर देतीं।


सब धन्यवाद कहते, लेकिन वह कभी किसी से पैसे नहीं लेती थीं।


एक दिन रचना ने पूछा,


"मम्मी जी, कम से कम मेहनताना तो ले लिया कीजिए।"


शारदा देवी मुस्कुराईं।


"कुछ काम पैसे कमाने के लिए नहीं किए जाते बेटा।"


"लेकिन क्यों?"


"जब सही समय आएगा, तब बता दूँगी।"


रचना को लगा जैसे इस मशीन के पीछे कोई बहुत बड़ी कहानी छिपी है।


उधर अमन भी हर बार मशीन को बड़ी सावधानी से वापस स्टोर में रखता।


जाते-जाते वह मशीन को कपड़े से ढकना कभी नहीं भूलता।


रचना ने हँसकर पूछा,


"इतनी देखभाल तो तुम अपनी बाइक की भी नहीं करते।"


अमन हल्का-सा मुस्कुराया।


"क्योंकि इस मशीन ने मुझे वहाँ पहुँचाया है, जहाँ आज मैं हूँ।"


रचना चौंक गई।


"क्या मतलब?"


अमन ने उसकी ओर देखा, फिर धीरे से कहा,


"उसकी कहानी माँ ही बताएँगी... और जिस दिन बताएँगी, शायद उस दिन तुम इस मशीन को कभी पुरानी नहीं कहोगी।"


रचना की नज़र फिर उसी मशीन पर टिक गई।


अब उसे पहली बार महसूस हुआ कि हर पुरानी चीज़ बेकार नहीं होती।


कुछ चीज़ें समय के साथ और भी ज़्यादा कीमती हो जाती हैं...



रचना के मन में अब उस पुरानी सिलाई मशीन को लेकर उत्सुकता और बढ़ गई थी। वह कई बार सोचती कि आखिर इस मशीन में ऐसी क्या बात है, जिसके लिए पूरे घर के लोगों के मन में इतना सम्मान है।


लेकिन हर बार कोई न कोई बात अधूरी रह जाती।


एक दिन अमन दफ़्तर चला गया था। गोपाल जी अपने पुराने दोस्त से मिलने बाहर गए थे।


घर में सिर्फ़ रचना और शारदा देवी थीं।


रचना रसोई में चाय बना रही थी कि तभी दरवाज़े की घंटी बजी।


बाहर एक बुज़ुर्ग महिला खड़ी थीं।


"बहन जी हैं?"


रचना ने विनम्रता से जवाब दिया,

"जी हैं, आइए।"


शारदा देवी उन्हें देखते ही मुस्कुरा उठीं।


"अरे, कमला दीदी! कितने दिनों बाद आईं।"


दोनों बैठकर बातें करने लगीं।


रचना चाय लेकर आई तो कमला जी ने मुस्कुराते हुए कहा,


"बहू, तुम्हें पता है, तुम्हारी सास ने सिर्फ़ अपना घर ही नहीं संभाला था... हमारे जैसे कई घरों की उम्मीद भी बचाई है।"


रचना ने हैरानी से उनकी ओर देखा।


"कैसे?"


कमला जी कुछ कहतीं, उससे पहले शारदा देवी ने मुस्कुराकर बात बदल दी।


"अरे दीदी, पुरानी बातें छोड़ो।"


लेकिन कमला जी हँस पड़ीं।


"कुछ बातें छिपाने की नहीं, बताने की होती हैं।"


रचना अब पूरी तरह उत्सुक हो चुकी थी।


कमला जी धीरे-धीरे बोलने लगीं।


"आज से करीब पच्चीस साल पहले की बात है। तुम्हारे ससुर की फैक्ट्री अचानक बंद हो गई थी।"


"कई महीनों तक उन्हें कोई काम नहीं मिला।"


"घर में दो छोटे-छोटे बच्चे... ऊपर से बूढ़ी सास की दवाइयाँ..."


"हर महीने खर्च बढ़ता जा रहा था।"


रचना चुपचाप सुन रही थी।


कमला जी आगे बोलीं,


"हम सब पड़ोसी जानते थे कि उनके घर की हालत अच्छी नहीं है। लेकिन कभी किसी ने इन्हें किसी के आगे हाथ फैलाते नहीं देखा।"


शारदा देवी की आँखें झुक गईं।


कमला जी ने उनकी ओर देखकर कहा,


"क्योंकि उस समय इस मशीन ने इन्हें संभाल लिया था।"


रचना की नज़र अनायास स्टोर रूम की तरफ़ चली गई।


कमला जी बताने लगीं,


"दिन में घर का सारा काम करती थीं। रात को जब बच्चे सो जाते, तब इसी मशीन पर बैठ जाती थीं।"


"कभी स्कूल यूनिफॉर्म सिलतीं, कभी ब्लाउज़, कभी पर्दे, कभी तकिए के गिलाफ़।"


"रात के दो-दो बजे तक मशीन चलती रहती थी।"


"और सुबह चार बजे फिर उठकर घर का काम।"


रचना की आँखें फैल गईं।


"इतनी मेहनत?"


कमला जी मुस्कुरा दीं।


"मेहनत नहीं बेटा... माँ का प्यार था।"


"एक बार तो अमन की स्कूल फीस जमा करने के लिए घर में पूरे पैसे भी नहीं थे।"


"तब इन्होंने लगातार तीन रात जागकर पंद्रह स्कूल ड्रेस तैयार की थीं।"


"उन पैसों से फीस जमा हुई थी।"


रचना के गले में जैसे कुछ अटक गया।


उसी समय गोपाल जी भी घर लौट आए।


उन्होंने कमला जी की आख़िरी बात सुन ली थी।


मुस्कुराते हुए बोले,


"दीदी, आपने फिर सारी पोल खोल दी।"


कमला जी बोलीं,


"सच्चाई छिपाने से क्या फायदा?"


गोपाल जी कुर्सी पर बैठ गए।


कुछ पल चुप रहने के बाद बोले,


"रचना बेटा... उस समय मुझे सबसे ज़्यादा दुख इस बात का नहीं था कि नौकरी चली गई।"


"दुख इस बात का था कि मैं अपने परिवार के लिए कुछ नहीं कर पा रहा था।"


"लेकिन तुम्हारी माँ ने कभी मुझे यह महसूस नहीं होने दिया कि मैं असफल हूँ।"


शारदा देवी तुरंत बोलीं,


"ये कैसी बातें कर रहे हैं?"


गोपाल जी मुस्कुरा दिए।


"सच कह रहा हूँ।"


"मैं कई बार हिम्मत हार जाता था।"


"लेकिन ये कहती थीं—'घर एक की कमाई से नहीं, दोनों के हौसले से चलता है।'"


रचना अब अपनी सास को बिल्कुल अलग नज़र से देख रही थी।


उसे पहली बार एहसास हुआ कि सामने बैठी शांत महिला ने कितने बड़े संघर्ष चुपचाप झेले होंगे।


कमला जी उठने लगीं।


जाते-जाते उन्होंने रचना से कहा,


"बहू, इस मशीन को कभी पुरानी मत समझना।"


"इसकी हर खरोंच में एक कहानी है।"


उनके जाने के बाद घर में कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा।


रचना धीरे-धीरे स्टोर रूम में गई।


उसने पहली बार उस मशीन को ध्यान से देखा।


हैंडल थोड़ा घिस चुका था।


लकड़ी के तख्ते पर हल्के-हल्के निशान थे।


पैर चलाने वाले पैडल पर रंग उखड़ चुका था।


लेकिन अब उसे वे निशान पुराने नहीं लग रहे थे।


उसे ऐसा लग रहा था, जैसे हर निशान किसी त्याग की गवाही दे रहा हो।


वह मशीन के सामने कुछ पल खड़ी रही।


फिर उसने धीरे से कपड़ा उठाया और पूरी मशीन साफ़ करने लगी।


उसी समय शारदा देवी वहाँ आ गईं।


उन्होंने मुस्कुराकर पूछा,


"आज अचानक सफाई?"


रचना ने उनकी ओर देखा।


उसकी आँखें नम थीं।


वह बस इतना ही कह सकी,


"मम्मी जी... मुझे नहीं पता था कि इस घर की सबसे मज़बूत नींव लोहे की नहीं... आपके हौसले की बनी है।"


शारदा देवी ने उसके सिर पर हाथ रख दिया।


लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।


उनकी आँखों की नमी ही सब कुछ कह रही थी।



कमला जी के जाने के बाद रचना पहले जैसी नहीं रही।


अब वह जब भी स्टोर रूम से गुजरती, उस पुरानी सिलाई मशीन को देखकर अनायास ही उसके कदम रुक जाते।


उसे लगता, जैसे वह कोई सामान नहीं, इस घर के संघर्षों की गवाह हो।


कुछ दिन बाद रविवार था।


अमन छुट्टी पर था।


रचना ने नाश्ता करते-करते अचानक कहा,


"मम्मी जी, अगर आपको समय मिले... तो क्या आप मुझे सिलाई सिखाएँगी?"


शारदा देवी ने हैरानी से उसकी ओर देखा।


"तुम्हें?" शारदा देवी ने हैरानी से पूछा।


"हाँ, मुझे।" रचना मुस्कुराकर बोली।


शारदा देवी ने प्यार से कहा, "लेकिन तुम्हें इसकी क्या ज़रूरत है बेटा? आजकल तो सब रेडीमेड मिल जाता है।"


रचना मुस्कुरा दी।


"ज़रूरत कपड़े सिलने की नहीं है... आपकी सीखी हुई चीज़ सीखने की है।"


कुछ पल के लिए पूरा कमरा शांत हो गया।


गोपाल जी अख़बार से नज़र उठाकर मुस्कुराने लगे।


अमन भी समझ गया कि रचना अब दिल से यह बात कह रही है।


शारदा देवी ने धीरे से कहा,


"ठीक है... लेकिन सीखने के लिए धैर्य चाहिए।"


रचना हँस पड़ी।


"आप सिखाइए, धैर्य मैं ले आऊँगी।"


अगले दिन से सीखने का सिलसिला शुरू हो गया।


पहले मशीन में धागा डालना।


फिर बॉबिन भरना।


फिर बिना धागे के सिर्फ़ सीधी लाइन पर पैर चलाने की प्रैक्टिस।


पहले ही दिन रचना का पैर इतना तेज़ चला कि कपड़ा टेढ़ा हो गया।


वह खुद ही हँसने लगी।


"मम्मी जी, लगता है मशीन मुझसे नाराज़ है।"


शारदा देवी भी मुस्कुरा दीं।


"मशीन नहीं... उसे चलाने वाले का मन शांत होना चाहिए।"


धीरे-धीरे रचना सीखने लगी।


कभी धागा उलझ जाता।


कभी सुई टूट जाती।


कभी सिलाई टेढ़ी हो जाती।


लेकिन शारदा देवी कभी नाराज़ नहीं होतीं।


हर गलती के बाद बस इतना कहतीं,


"गलती वहीं करता है, जो सीख रहा होता है।"


एक दिन रचना ने पूछा,


"मम्मी जी, आपने मुझे एक बार भी डाँटा नहीं।"


शारदा देवी ने मुस्कुराकर जवाब दिया,


"जब मैं सीख रही थी, तब मेरी सास ने भी मुझे कभी नहीं डाँटा था। उन्होंने कहा था—'हुनर डर से नहीं, भरोसे से आता है।' बस वही बात मैं निभा रही हूँ।"


रचना की आँखें चमक उठीं।


अब उसे समझ आने लगा था कि इस घर में सिर्फ़ चीज़ें नहीं, संस्कार भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हैं।


इसी बीच मोहल्ले में रहने वाली सुनीता एक दिन रोती हुई घर आई।


उसकी बेटी पूजा बारहवीं पास कर चुकी थी।


वह फैशन डिज़ाइनिंग सीखना चाहती थी, लेकिन घर की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी।


सुनीता बोली,


"भाभी जी, सपना तो बड़ा है... लेकिन फीस भरने की ताकत नहीं है।"


शारदा देवी कुछ सोच ही रही थीं कि रचना बोल पड़ी,


"अगर पूजा चाहे तो रोज़ शाम को यहाँ आ सकती है।"


सबने उसकी तरफ देखा।


रचना ने मुस्कुराकर कहा,


"मैं जितना सीख रही हूँ, उतना उसके साथ भी सीखूँगी। और मम्मी जी हम दोनों को सिखाएँगी।"


शारदा देवी की आँखों में गर्व उतर आया।


उन्होंने बिना एक पल गँवाए कहा,


"बिलकुल आएगी।"


अगले ही दिन से पूजा भी आने लगी।


अब घर का एक कोना छोटे-से प्रशिक्षण केंद्र जैसा बन गया था।


शारदा देवी सिखातीं।


रचना और पूजा सीखतीं।


कभी तीनों हँसतीं, कभी किसी डिज़ाइन पर चर्चा करतीं।


धीरे-धीरे मोहल्ले की दो और लड़कियाँ भी जुड़ गईं।


फिर चार...


फिर छह...


गोपाल जी एक दिन हँसकर बोले,


"लगता है हमारे घर में सिलाई स्कूल खुल गया है।"


सब ज़ोर से हँस पड़े।


लेकिन शारदा देवी की आँखों में आँसू थे।


उन्होंने मन ही मन सोचा,


"जिस मशीन ने कभी मेरे बच्चों का भविष्य बचाया था... वही आज किसी और के सपनों को रास्ता दिखा रही है।"


उस दिन रचना ने पहली बार महसूस किया कि असली विरासत ज़मीन, मकान या गहने नहीं होते।


असली विरासत वह हुनर होता है, जो एक हाथ से दूसरे हाथ तक पहुँचकर कई ज़िंदगियाँ बदल देता है।



देखते ही देखते छह महीने बीत गए।


अब रचना के हाथों की सिलाई पहले जैसी नहीं रही थी। उसकी बनाई हुई कुशन कवर, बच्चों के कपड़े और सुंदर थैलियाँ देखकर हर कोई उसकी तारीफ़ करता।


लेकिन वह हर बार मुस्कुराकर एक ही बात कहती,


"ये मेरे हाथों का नहीं, मेरी मम्मी जी के धैर्य का कमाल है।"


उधर मोहल्ले की जिन लड़कियों को शारदा देवी और रचना सिलाई सिखा रही थीं, उनमें से दो ने घर से ही छोटे-छोटे ऑर्डर लेने शुरू कर दिए।


किसी के घर का खर्च चलने लगा, तो किसी की पढ़ाई का खर्च निकलने लगा।


एक दिन कॉलोनी की महिला समिति की अध्यक्ष, मधु जी, घर आईं।


उन्होंने कहा,


"अगले रविवार महिला सम्मान समारोह है। इस बार हम ऐसी महिला का सम्मान करना चाहते हैं, जिसने बिना किसी स्वार्थ के समाज के लिए काम किया हो।"


शारदा देवी तुरंत बोलीं,


"तो किसी अध्यापिका या डॉक्टर का सम्मान कीजिए। मैंने ऐसा क्या किया है?"


मधु जी मुस्कुरा दीं।


"आपने लोगों को सिर्फ़ सिलाई नहीं सिखाई, अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया है। इससे बड़ा काम क्या होगा?"


शारदा देवी ने विनम्रता से मना कर दिया।


"मुझे मंच पर जाना अच्छा नहीं लगता।"


बात वहीं खत्म हो गई।


लेकिन रचना चुप थी।


उसने मन ही मन कुछ तय कर लिया।


रविवार आ गया।


कॉलोनी का सामुदायिक भवन लोगों से भरा हुआ था।


मंच फूलों से सजा था।


कई महिलाओं को अलग-अलग क्षेत्रों में सम्मानित किया जा रहा था।


कार्यक्रम लगभग समाप्त होने वाला था कि अचानक संचालक ने कहा,


"अब हम एक विशेष सम्मान देना चाहते हैं।"


शारदा देवी हैरान होकर इधर-उधर देखने लगीं।


तभी रचना मंच पर पहुँची।


उसके हाथ में वही पुरानी सिलाई मशीन थी, जिसे अमन और गोपाल जी मिलकर बड़ी सावधानी से वहाँ तक लाए थे।


पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया।


रचना ने माइक संभाला।


उसकी आवाज़ हल्की काँप रही थी।


"कुछ महीने पहले मैंने इस मशीन को कबाड़ समझ लिया था। मुझे लगा था कि यह सिर्फ़ जगह घेर रही है।"


"लेकिन फिर मुझे पता चला कि इसने सिर्फ़ कपड़े नहीं सिले..."


"...इसने भूख के दिनों में उम्मीद सिली..."


"...मुश्किल समय में हिम्मत सिली..."


"...और इस परिवार के टूटते हुए विश्वास को भी सिला।"


पूरे हॉल में गहरी खामोशी थी।


रचना आगे बोली,


"आज लोग मेरी सिलाई की तारीफ़ करते हैं। लेकिन सच यह है कि मैंने सिर्फ़ कपड़े सिलना नहीं सीखा..."


"...मैंने रिश्ते जोड़ना सीखा है।"


"...मैंने धैर्य सीखा है।"


"...और सबसे बड़ी बात, मैंने यह सीखा है कि किसी भी घर की सबसे बड़ी दौलत उसकी अलमारी में रखे गहने नहीं, बल्कि बड़ों के अनुभव होते हैं।"


रचना की आँखों से आँसू बहने लगे।


वह मंच से नीचे उतरी, शारदा देवी के पास पहुँची और सबके सामने उनके चरण छू लिए।


"मम्मी जी... अगर उस दिन आपने मेरी बात का बुरा मानकर मुझे डाँट दिया होता, तो शायद मैं कभी यह सब नहीं सीख पाती।"


"आपने मुझे हुनर भी दिया और रिश्तों की असली कीमत भी सिखा दी।"


शारदा देवी जल्दी से उसे उठाने लगीं।


उन्होंने उसे गले से लगा लिया।


दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।


पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।


मधु जी ने मुस्कुराते हुए कहा,


"आज का सम्मान सिर्फ़ शारदा देवी का नहीं, हर उस माँ का है जो बिना शोर किए अपने परिवार की नींव मज़बूत करती है।"


कुछ दिनों बाद रचना ने घर के बाहर एक छोटा-सा बोर्ड लगवाया।


उस पर लिखा था—


"शारदा कौशल केंद्र"

यहाँ ज़रूरतमंद महिलाओं और बेटियों को निःशुल्क सिलाई सिखाई जाती है।


शारदा देवी ने बोर्ड देखा तो उनकी आँखें भर आईं।


उन्होंने रचना से कहा,


"बेटा, मेरे नाम की क्या ज़रूरत थी?"


रचना मुस्कुराई।


"नाम आपका नहीं मम्मी जी... यह उस सोच का है, जिसने सिखाया कि हुनर बाँटने से कम नहीं होता, बढ़ता है।"


उस दिन शारदा देवी ने वर्षों पुरानी उस सिलाई मशीन पर प्यार से हाथ फेरा।


उन्हें लगा, जैसे जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार उन्हें मिल गया हो।


रचना मन ही मन सोच रही थी—


"जिस विरासत को मैंने कभी पुरानी चीज़ समझ लिया था, वही आज मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बन गई। सच है... कुछ चीज़ें संभालकर रखने के लिए नहीं, आगे बढ़ाने के लिए होती हैं।"



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