नई दीदी

 

An emotional Indian family moment where a young man tearfully accepts his sister-in-law as his real sister while she lovingly gifts him a present inside a warm and beautifully decorated home.


"जिस औरत को मैं कभी अपनी बहन मान ही नहीं पाया... उसी ने एक दिन मुझे एहसास कराया कि रिश्ते सिर्फ़ खून से नहीं, दिल से भी बनते हैं।"


जब भी वह हमारे घर आती, मेरा मन जाने क्यों खिन्न हो जाता। मैं उसके सामने जितना कम बोल सकता था, उतना ही बोलता। वह मुस्कुराकर हाल-चाल पूछती और मैं बस "हाँ" या "ठीक है" कहकर अपने कमरे में चला जाता।


माँ और पिताजी उसकी राह देखा करते थे। उसके आते ही घर जैसे खिल उठता। माँ रसोई में उसकी पसंद की चाय बनातीं और पिताजी बार-बार पूछते, "बेटा, थक तो नहीं गई?"


मुझे यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था।


आख़िर वह थी कौन?


मेरी बड़ी बहन की जगह इस घर में आई हुई एक औरत।


मेरी असली बहन, जिसे मैं प्यार से "दीदी" कहता था, शादी के सिर्फ़ छह महीने बाद एक सड़क हादसे में हमें छोड़कर चली गई थी। उस दिन के बाद हमारे घर की हँसी जैसे हमेशा के लिए कहीं खो गई।


जीजाजी भी पूरी तरह टूट गए थे। दो साल तक उन्होंने दूसरी शादी का नाम तक नहीं लिया। लेकिन माँ-पिताजी ने बहुत समझाया कि पूरी ज़िंदगी अकेले काटना आसान नहीं होता।


आख़िरकार उन्होंने दूसरी शादी कर ली।


और उसी दिन से वह हमारे जीवन में आ गई।


उसने आते ही माँ-पिताजी को अपने माँ-बाप की तरह अपना लिया, लेकिन मैं उसे कभी अपना नहीं मान पाया।


वह हर पंद्रह-बीस दिन में हमारे घर आ जाती।


कभी माँ के लिए साड़ी, कभी पिताजी के लिए चश्मा, तो कभी घर के लिए कोई ज़रूरी सामान ले आती।


एक दिन तो बैठक के लिए भगवान राम दरबार की बहुत सुंदर तस्वीर ले आई।


माँ ने पैसे देने चाहे तो मुस्कुराकर बोली, "अगर बेटी अपने घर के लिए कुछ ले आए तो उसके पैसे थोड़े ही लिए जाते हैं।"


माँ की आँखें भर आईं...


लेकिन मेरे मन की दीवार ज़रा भी नहीं टूटी।



कुछ महीने बाद पता चला कि वह माँ बनने वाली है।


घर में खुशी की लहर दौड़ गई।


माँ-पिताजी तो जैसे खुशी से झूम उठे।


मैं भी मुस्कुरा दिया...


लेकिन वजह कुछ और थी।


मुझे लगा अब डॉक्टर उसे आराम करने की सलाह देंगे और उसके हमारे घर आने के चक्कर कुछ महीनों के लिए बंद हो जाएँगे।


समय बीतता गया।


एक दिन अचानक पिताजी को तेज़ सीने में दर्द उठा।


उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा।


मैं दफ़्तर से भागता हुआ पहुँचा।


लेकिन वहाँ पहुँचकर जो देखा, उससे मैं हैरान रह गया।


वह पहले से अस्पताल में मौजूद थी।


सारी औपचारिकताएँ पूरी कर चुकी थी।


दवाइयाँ खरीद चुकी थी।


डॉक्टर से बात भी कर चुकी थी।


मैंने पूछा, "तुम्हें किसने बताया?"


वह बोली, "माँ का रोता हुआ फोन आया था... बस चली आई।"


डॉक्टर ने उसे खुद ज़्यादा चलने-फिरने से मना किया था।


फिर भी वह पूरे अस्पताल में माँ-पिताजी के लिए भाग-दौड़ कर रही थी।


उस दिन पहली बार मेरे मन में उसके लिए सम्मान पैदा हुआ।


लेकिन मैंने उसे महसूस होने नहीं दिया।


कुछ दिन बाद माँ-पिताजी को गाँव जाना पड़ा।


घर में मैं बिल्कुल अकेला रह गया।


और उसी दिन...


मेरा जन्मदिन था।



शाम को दरवाज़े की घंटी बजी।


दरवाज़ा खोला तो वही सामने खड़ी थी।


एक हाथ में छोटा-सा डिब्बा था और दूसरे हाथ में टिफिन।


मैंने कहा, "अंदर आ जाओ।"


वह धीरे-धीरे सोफे पर बैठ गई और मुस्कुराकर बोली,


"जन्मदिन मुबारक हो।"


उसने डिब्बा खोला।


उसमें एक बहुत सुंदर पेन था।


मैंने हैरानी से पूछा, "इतना महँगा क्यों लिया?"


वह हँस दी।


"महँगा नहीं है... पिछले चार महीने से थोड़ा-थोड़ा बचा रही थी।"


मैं चुप रह गया।


फिर उसने टिफिन मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा,


"तेरी पसंद की कढ़ी-चावल बनाई है... समय पर खा लेना।"


मैंने धीरे से पूछा,


"तुम मेरे लिए इतना सब क्यों करती हो?"


वह कुछ पल चुप रही।


फिर बोली,


"जब इस घर में आई थी, तब जानती थी कि मैं किसी की जगह नहीं ले सकती। लेकिन अगर तेरी दीदी की थोड़ी-सी कमी भी पूरी कर सकूँ... तो शायद मेरी ज़िंदगी सफल हो जाए।"


बस...


मेरी आँखों से आँसू बह निकले।


मैंने पहली बार उसका हाथ थाम लिया।


उस स्पर्श में मुझे अपनी खोई हुई दीदी का वही अपनापन महसूस हुआ।


मैं भर्राई आवाज़ में बोला,


"आज तक मैं बहुत ग़लत था..."


वह मुस्कुराई।


"देर से सही... समझ तो गए।"


मैंने काँपती आवाज़ में कहा,


"दीदी..."


उसकी आँखें भी भर आईं।


"एक बार फिर बोल।"


मैं फूट-फूटकर रो पड़ा।


"दीदी... मेरी अपनी दीदी।"


उसने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,


"आज सच में लगा... मैं इस घर की बेटी बन गई हूँ।"


उस दिन मुझे समझ आया...


रिश्ते जन्म से नहीं, निभाने से अपने बनते हैं।



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