सबसे बड़ा शगुन
"जिस दिन बहन ने भाई से महंगे शगुन की जगह सिर्फ उसका साथ माँगा... उसी दिन पूरे परिवार की सोच बदल गई।"
सुबह के सात बजे थे।
रसोई में चूल्हे पर चाय चढ़ी हुई थी। बाहर आँगन में तुलसी के पास बैठी सुमित्रा देवी माला जप रही थीं। तभी उनका मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर बेटी रेखा का नाम चमक रहा था।
"प्रणाम माँ!" उधर से रेखा की खुशियों से भरी आवाज़ आई।
"खुश रह बेटा। आज तो तेरी आवाज़ सुनकर ही लग रहा है कोई बड़ी खुशखबरी है।" सुमित्रा देवी मुस्कुराते हुए बोलीं।
"माँ, आर्या का रिश्ता पक्का हो गया। अगले महीने रोका है और तीन महीने बाद शादी।" रेखा ने उत्साहित होकर बताया।
सुमित्रा देवी की आँखें खुशी से भर आईं।
"भगवान मेरी नातिन को हमेशा खुश रखे।"
कुछ देर तक दोनों शादी की तैयारियों की बातें करती रहीं।
फिर अचानक रेखा बोली...
"माँ, एक बात और। भैया से कह देना कि इस बार भांजी की शादी है। मामेरा ऐसा होना चाहिए कि किसी को बोलने का मौका न मिले।"
सुमित्रा देवी कुछ पल चुप रहीं।
उन्होंने धीरे से कहा...
"बेटा, तुम्हारा भाई राजेश कोई बड़ा व्यापारी नहीं है।"
"माँ, मैं सब जानती हूँ। लेकिन मेरी ससुराल वाले बड़े लोग हैं। पिछली बार भी उन्होंने ताना मारा था कि मायके वालों ने कुछ खास नहीं दिया। इस बार ऐसा नहीं होना चाहिए।"
इतना कहकर रेखा ने फोन रख दिया।
सुमित्रा देवी की मुस्कान गायब हो चुकी थी।
उधर राजेश सरकारी स्कूल में क्लर्क था।
पत्नी कविता सिलाई करके घर का खर्च संभालने में उसकी मदद करती थी।
दो बच्चे थे।
बेटा बारहवीं में और बेटी कॉलेज के अंतिम वर्ष में पढ़ रही थी।
अभी पिछले साल ही उन्होंने पिता के इलाज के लिए बैंक से कर्ज लिया था।
हर महीने आधी तनख्वाह किस्त में चली जाती थी।
शाम को जब राजेश घर लौटा तो माँ ने सारी बात बता दी।
राजेश कुछ नहीं बोला।
बस चुपचाप कुर्सी पर बैठ गया।
कविता पानी लेकर आई।
"क्या हुआ?"
राजेश ने भारी आवाज़ में कहा...
"कविता... बहन की इज्जत भी बचानी है और घर भी चलाना है। समझ नहीं आ रहा क्या करूँ।"
उसकी आँखें भर आईं।
"अगर बड़ा मामेरा करूँगा तो बेटी की पढ़ाई रुक जाएगी।"
"अगर छोटा करूँगा तो बहन को ताने सुनने पड़ेंगे।"
कविता ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"हर रिश्ता पैसे से बड़ा नहीं होता।"
लेकिन राजेश की चिंता कम नहीं हुई।
अगले कई दिनों तक वह अतिरिक्त काम करता रहा।
स्कूल से लौटकर लोगों के दस्तावेज़ भरने का काम करता।
रात देर तक जागता।
खाना भी ठीक से नहीं खाता।
एक दिन स्कूल में ही उसे तेज़ चक्कर आया।
वह वहीं गिर पड़ा।
साथी कर्मचारी तुरंत अस्पताल लेकर गए।
डॉक्टर ने कहा...
"ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ गया था। तनाव कम कीजिए, नहीं तो आगे परेशानी हो सकती है।"
यह खबर सुनकर पूरा परिवार घबरा गया।
अस्पताल के कमरे में सुमित्रा देवी बेटे को देखते हुए रो रही थीं।
उन्होंने पहली बार महसूस किया कि समाज की रस्में कभी-कभी इंसान की जान पर भी भारी पड़ जाती हैं।
उसी रात उन्होंने फैसला कर लिया।
अगले दिन उन्होंने बेटी रेखा को फोन किया।
"बेटा, एक बात कहूँ?"
"हाँ माँ।"
"इस बार हम शादी में ज़रूर आएँगे। लेकिन अपनी हैसियत से ज़्यादा खर्च नहीं करेंगे।"
रेखा चुप रही।
सुमित्रा देवी आगे बोलीं...
"अगर दिखावे के लिए तुम्हारा भाई कर्ज में डूब गया तो क्या तुम्हें खुशी मिलेगी?"
"आज अस्पताल में उसे देखकर मुझे समझ आया कि रिश्तों से बड़ा कोई शगुन नहीं होता।"
"हम अपनी नातिन को आशीर्वाद देंगे। जितना बन पड़ेगा उतना देंगे। लेकिन किसी की खुशी के लिए अपने बेटे की जिंदगी दाँव पर नहीं लगा सकती।"
फोन के दूसरी तरफ़ सन्नाटा था।
कुछ देर बाद रेखा की धीमी आवाज़ आई...
"माँ... मैंने कभी इस तरह सोचा ही नहीं।"
उस शाम रेखा ने अपने पति से सारी बात बताई।
पति ने कहा...
"अगर तुम्हारे भाई ने कर्ज लेकर सामान दिया तो क्या हमें अच्छा लगेगा?"
"हम अपनी बेटी की शादी खुशी से कर रहे हैं, किसी पर बोझ डालकर नहीं।"
रेखा की आँखें भर आईं।
उसे अपनी गलती समझ आ गई।
दो दिन बाद वह खुद मायके पहुँच गई।
राजेश अभी आराम कर रहा था।
रेखा उसके पास बैठ गई।
"भैया..."
राजेश मुस्कुराने की कोशिश करने लगा।
लेकिन रेखा उसके पैरों में बैठ गई।
"मुझे माफ कर दो।"
राजेश घबरा गया।
"अरे यह क्या कर रही हो?"
रेखा रोते हुए बोली...
"मैं अपनी इज्जत बचाने के चक्कर में तुम्हारी तकलीफ भूल गई।"
"मुझे महंगे शगुन नहीं चाहिए। मुझे मेरा भाई चाहिए।"
कमरे में मौजूद हर व्यक्ति की आँखें नम हो गईं।
शादी का दिन आ गया।
रेखा के ससुराल वाले बड़े-बड़े गिफ्टों की चर्चा कर रहे थे।
तभी किसी ने पूछा...
"रेखा, तुम्हारे मायके से क्या आया?"
रेखा मुस्कुराई।
उसने सबके सामने कहा...
"मेरे मायके से मेरा सबसे बड़ा उपहार आया है..."
सब हैरान होकर उसकी तरफ देखने लगे।
वह अपने भाई राजेश का हाथ पकड़कर मंच तक ले गई।
फिर बोली...
"यह वही भाई है जिसने बचपन में मेरी हर खुशी पूरी की।"
"आज यह अपने परिवार के साथ मेरी बेटी को आशीर्वाद देने आया है।"
"इससे बड़ा कोई शगुन नहीं हो सकता।"
पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
रेखा की सास भी भावुक हो गईं।
उन्होंने आगे बढ़कर राजेश को गले लगा लिया।
"बेटा, आज तुमने हमें भी एक बड़ी सीख दी है।"
विदाई के समय आर्या अपनी नानी के गले लगकर बोली...
"नानी, मेरी शादी की सबसे सुंदर याद क्या रहेगी, पता है?"
सुमित्रा देवी (प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए): "क्या बेटा?"
आर्या (अपने मामा राजेश और मामी कविता की ओर देखते हुए): "कि मेरी शादी में किसी ने गहनों की नहीं, रिश्तों की कीमत समझी। मुझे नानी, मामा-मामी का प्यार और आशीर्वाद मिला... इससे बड़ा कोई शगुन नहीं हो सकता।"
सुमित्रा देवी की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।
उन्होंने आसमान की ओर देखकर मन ही मन कहा...
"हे भगवान, हर घर में ऐसी समझ दे, जहाँ रिश्ते बोझ नहीं, सबसे बड़ी दौलत बनें।"
सीख:
दिखावे के लिए किया गया शगुन कुछ समय की वाहवाही तो दिला सकता है, लेकिन सच्चा सम्मान वही है जहाँ रिश्तों को पैसों से नहीं, प्रेम, समझदारी और अपनापन से निभाया जाए।

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