असली बड़ा कौन?
"जिस चौकीदार को लोग हर दिन 'अनपढ़' कहकर अपमानित करते थे... उसी चौकीदार ने एक दिन ऐसा सच सामने ला दिया कि बड़े-बड़े अफसरों की नज़रें झुक गईं।"
राघव मेहता दिल्ली की एक बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी में जनरल मैनेजर था। उम्र करीब चालीस साल। ऊँची सैलरी, आलीशान फ्लैट, महँगी गाड़ी और शहर के नामी लोगों में उठना-बैठना। उसे अपने पद पर बहुत गर्व था।
कंपनी का नया कॉर्पोरेट ऑफिस शहर की सबसे ऊँची इमारतों में से एक था। हर दिन सैकड़ों कर्मचारी वहाँ आते-जाते थे। मुख्य गेट पर एक बूढ़ा चौकीदार बैठता था, जिसका नाम रामदीन था।
सफेद होते बाल, झुर्रियों से भरा चेहरा और साधारण कपड़े। उम्र लगभग पैंसठ साल। वह हर आने-जाने वाले को मुस्कुराकर नमस्ते करता था।
लेकिन ज़्यादातर लोग उसकी तरफ देखते भी नहीं थे।
कुछ लोग उसे सिर्फ इसलिए डाँट देते क्योंकि गेट खोलने में दो सेकंड की देर हो जाती।
राघव भी उन्हीं लोगों में था।
हर दिन ऑफिस पहुँचते ही वह तेज़ आवाज़ में कहता,
"रामदीन, तुमसे एक गेट भी समय पर नहीं खुलता। पता नहीं कंपनी ने तुम्हें रखा ही क्यों है।"
रामदीन हमेशा मुस्कुरा देता।
"माफ़ कर दीजिए साहब... अगली बार ध्यान रखूँगा।"
उसने कभी पलटकर जवाब नहीं दिया।
ऑफिस में कई लोग रामदीन का मज़ाक उड़ाते थे।
"अरे, ये तो शायद अपना नाम भी ठीक से नहीं लिख सकता होगा।"
"इतनी उम्र में भी नौकरी कर रहा है... घर बैठना चाहिए।"
रामदीन सब सुन लेता, लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान कभी नहीं जाती।
एक दिन लंच टाइम में राघव अपने साथियों के साथ नीचे आया।
रामदीन पेड़ के नीचे बैठकर स्टील के डिब्बे में सूखी रोटी और आलू की सब्ज़ी खा रहा था।
उसी समय एक दुबला-पतला लड़का दौड़ता हुआ आया।
"दादाजी..."
रामदीन का चेहरा खिल उठा।
"आ गया बेटा?"
लड़के ने झुककर उनके पैर छुए।
रामदीन ने अपने डिब्बे की आधी रोटी उसके हाथ में रख दी।
"पहले तू खा ले।"
राघव ने यह सब देखा और अपने दोस्त से हँसते हुए बोला,
"खुद की हालत देखो और दूसरों को खिलाने चले हैं।"
रामदीन ने उनकी बात सुन ली, लेकिन कुछ नहीं कहा।
करीब एक हफ्ते बाद कंपनी में बहुत बड़ा विदेशी डेलिगेशन आने वाला था।
करोड़ों रुपये का समझौता होना था।
पूरे ऑफिस में तैयारियाँ चल रही थीं।
हर कर्मचारी को समय पर पहुँचने का आदेश दिया गया।
राघव खुद सारी व्यवस्था देख रहा था।
उसी दिन मौसम अचानक खराब हो गया।
तेज़ बारिश शुरू हो गई।
बिजली कई बार गई और पूरे परिसर में अफरा-तफरी मच गई।
इसी बीच एक काली एसयूवी तेज़ी से गेट पर आकर रुकी।
उसमें से लगभग सत्तर साल के एक बुज़ुर्ग उतरे।
उनके कपड़े भीग चुके थे।
उन्होंने रामदीन से पूछा,
"बेटा, क्या मैं अंदर जाकर राघव मेहता से मिल सकता हूँ?"
रामदीन ने विनम्रता से कहा,
"ज़रूर बाबूजी। आपका नाम क्या लिखूँ?"
"कह देना... शिवनाथ त्रिपाठी आए हैं।"
बुज़ुर्ग व्यक्ति ने रिसेप्शन पर बैठे चपरासी रामदीन से धीमी आवाज़ में कहा।
रामदीन ने इंटरकॉम पर फोन किया।
रिसेप्शन से जवाब आया,
"सर अभी बहुत व्यस्त हैं। किसी को अंदर मत भेजना।"
रामदीन ने फिर भी धीरे से कहा,
"मैडम, बुज़ुर्ग लग रहे हैं। शायद ज़रूरी काम हो।"
रिसेप्शनिस्ट ने सख़्त लहज़े में जवाब दिया, "जो कहा है, वही करो।"
फोन कट गया।
रामदीन बाहर आया।
"बाबूजी... अभी अंदर जाने की अनुमति नहीं मिली।"
बुज़ुर्ग मुस्कुरा दिए।
"कोई बात नहीं बेटा। मैं यहीं बैठ जाता हूँ।"
रामदीन तुरंत अपनी कुर्सी से उठा।
"आप मेरी कुर्सी पर बैठिए।"
उसने अपनी छतरी उनके ऊपर कर दी।
फिर कैंटीन से अपने पैसों की चाय और गरम समोसे लेकर आया।
"बारिश में ठंड लग जाएगी। पहले चाय पी लीजिए।"
बुज़ुर्ग ने उसकी तरफ देखा।
"तुम मुझे जानते भी नहीं... फिर भी इतना सम्मान?"
रामदीन हँस पड़ा।
"मेरे पिता कहते थे... घर आए मेहमान का नाम नहीं, उसकी उम्र देखनी चाहिए।"
बुज़ुर्ग कुछ देर उसे देखते रहे।
उनकी आँखों में नमी उतर आई।
बारिश लगातार तेज़ होती जा रही थी।
रामदीन ने अपनी पुरानी शॉल उतारकर शिवनाथ त्रिपाठी के कंधों पर रख दी।
"बाबूजी, कपड़े भीग गए हैं। ठंड लग जाएगी।"
शिवनाथ ने मुस्कुराकर पूछा,
"और तुम?"
"मैं तो रोज़ बारिश और धूप में रहता हूँ। मुझे आदत है।"
इतने में कंपनी के कुछ कर्मचारी बाहर निकले।
उन्होंने देखा कि चौकीदार अपनी कुर्सी पर किसी बुज़ुर्ग को बैठाकर खुद खड़ा है।
एक कर्मचारी हँसते हुए बोला,
"रामदीन, आज तो बड़े मेहमान बना रखे हैं!"
दूसरा बोला,
"लगता है कोई रिश्तेदार होगा।"
रामदीन ने बस मुस्कुराकर कहा,
"नहीं साहब, बस बड़े हैं... इसलिए सम्मान दे रहा हूँ।"
उसी समय ऊपर कॉन्फ्रेंस हॉल में राघव विदेशी मेहमानों का इंतज़ार कर रहा था।
लेकिन अचानक सूचना मिली कि विदेशी कंपनी के चेयरमैन की फ्लाइट खराब मौसम के कारण देर से पहुँचेगी।
मीटिंग एक घंटे के लिए टल गई।
राघव नीचे लॉबी में आया।
उसकी नज़र बाहर गेट पर पड़ी।
उसने देखा कि रामदीन किसी अनजान बुज़ुर्ग के साथ बैठा चाय पी रहा है।
राघव गुस्से में बाहर पहुँचा।
"रामदीन!"
रामदीन तुरंत खड़ा हो गया।
"जी साहब।"
राघव ने ऊँची आवाज़ में कहा,
"तुम्हें तनख्वाह लोगों को चाय पिलाने के लिए मिलती है?"
रामदीन ने झिझकते हुए कहा,
"न... नहीं साहब।"
राघव ने बुज़ुर्ग की तरफ इशारा करते हुए पूछा,
"और ये कौन हैं?"
शिवनाथ त्रिपाठी शांत स्वर में बोले,
"बेटा, मैं तुमसे मिलने आया था।"
राघव ने बिना ध्यान दिए कहा,
"अभी मेरे पास समय नहीं है। बाद में आइए।"
इतना कहकर वह अंदर चला गया।
रामदीन शर्मिंदा हो गया।
"बाबूजी, बुरा मत मानिए। साहब बहुत व्यस्त हैं।"
शिवनाथ मुस्कुराए।
"मुझे बुरा नहीं लगा बेटा। इंसान की पहचान उसके व्यस्त होने से नहीं, उसके व्यवहार से होती है।"
रामदीन चुप हो गया।
करीब आधे घंटे बाद कंपनी के मालिक विक्रम कपूर खुद ऑफिस पहुँचे।
उनके साथ विदेशी मेहमान भी थे।
जैसे ही विक्रम कपूर की नज़र गेट पर बैठे शिवनाथ त्रिपाठी पर पड़ी, उनके कदम रुक गए।
वह तेज़ी से उनकी ओर बढ़े।
"सर... आप यहाँ?"
पूरे ऑफिस के लोग हैरान रह गए।
विक्रम कपूर ने झुककर शिवनाथ त्रिपाठी के पैर छुए।
राघव की आँखें फटी रह गईं।
जिस बुज़ुर्ग को वह कुछ देर पहले टालकर चला गया था...
कंपनी का मालिक उनके चरण छू रहा था।
विक्रम कपूर ने कहा,
"सर, आपने बताया क्यों नहीं कि आप आ रहे हैं? मैं खुद लेने आता।"
शिवनाथ मुस्कुरा दिए।
"मैं देखना चाहता था कि तुम्हारी कंपनी में इंसानियत कितनी बची है।"
सन्नाटा छा गया।
राघव के चेहरे का रंग उड़ चुका था।
विक्रम कपूर ने सबके सामने कहा,
"आप लोग शायद इन्हें नहीं जानते। ये प्रोफेसर शिवनाथ त्रिपाठी हैं। आज मैं जिस मुकाम पर हूँ, वहाँ पहुँचने में इनका सबसे बड़ा हाथ है। जब मेरे पास कॉलेज की फीस देने तक के पैसे नहीं थे, तब इन्होंने मेरी पढ़ाई का पूरा खर्च उठाया था।"
विदेशी मेहमान भी ध्यान से सब सुन रहे थे।
विक्रम कपूर ने आगे कहा,
"आज अगर मेरी कंपनी हजारों लोगों को रोजगार दे रही है, तो उसकी शुरुआत इनके आशीर्वाद से हुई थी।"
राघव का सिर शर्म से झुक गया।
लेकिन तभी शिवनाथ त्रिपाठी ने धीरे से कहा,
"विक्रम... अगर आज मुझे किसी पर गर्व हुआ है, तो वह तुम नहीं..."
उन्होंने अपना हाथ रामदीन के कंधे पर रखा।
"...यह आदमी है।"
सभी लोग रामदीन की तरफ देखने लगे।
पूरा परिसर एकदम शांत हो गया।
सैकड़ों कर्मचारियों की निगाहें अब रामदीन पर थीं।
रामदीन घबरा गया।
"बाबूजी... मैंने ऐसा क्या कर दिया?"
शिवनाथ त्रिपाठी ने मुस्कुराकर कहा,
"बेटा, तुमने वही किया जो आजकल बहुत कम लोग करते हैं—एक अनजान इंसान को इंसान समझकर सम्मान दिया।"
उन्होंने विक्रम कपूर की ओर देखा।
"मैं पिछले कई वर्षों से अलग-अलग संस्थानों में बिना बताए जाता हूँ। मैं यह नहीं देखता कि वहाँ कितनी बड़ी इमारत है। मैं यह देखता हूँ कि वहाँ काम करने वाले लोग छोटे कर्मचारियों और बुज़ुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।"
राघव का सिर और झुक गया।
उसे अपनी हर बात याद आने लगी—
"गेट जल्दी खोलो..."
"तुमसे कुछ नहीं होता..."
"कंपनी ने तुम्हें रखा ही क्यों है..."
हर शब्द उसके कानों में हथौड़े की तरह गूँज रहा था।
विक्रम कपूर ने धीरे से पूछा,
"सर... क्या आज भी आपने वही परीक्षा ली?"
शिवनाथ ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
फिर उन्होंने रामदीन की ओर इशारा किया।
"बारिश में इसने मुझे अपनी कुर्सी दी, अपनी शॉल दी, अपने पैसों से चाय पिलाई। इसने एक बार भी यह नहीं पूछा कि मैं कौन हूँ या मेरे पास कितने पैसे हैं।"
उन्होंने राघव की तरफ देखा।
"और कुछ लोगों ने मेरा नाम जाने बिना ही मुझे बोझ समझ लिया।"
राघव अब अपने आँसू रोक नहीं पा रहा था।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और शिवनाथ त्रिपाठी के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
"सर... मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।"
शिवनाथ ने शांत स्वर में कहा,
"गलती हर इंसान से होती है बेटा। लेकिन उससे सीखना बहुत कम लोग जानते हैं।"
राघव ने तुरंत रामदीन की तरफ देखा।
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
"रामदीन... मैंने तुम्हारा बहुत अपमान किया है। अगर हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।"
रामदीन घबरा गया।
"अरे साहब... आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? आप बड़े आदमी हैं।"
राघव ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
"नहीं रामदीन... आज समझ आया कि बड़ा मैं नहीं, तुम हो।"
आस-पास खड़े कर्मचारियों की आँखें भी नम हो गईं।
उसी समय कंपनी के एचआर हेड भी वहाँ आ गए।
उन्होंने धीरे से विक्रम कपूर से कहा,
"सर, विदेशी मेहमान कॉन्फ्रेंस हॉल में इंतज़ार कर रहे हैं।"
विक्रम कपूर मुस्कुराए।
"आज की सबसे बड़ी मीटिंग यहीं हो रही है।"
विदेशी मेहमानों में से एक बुज़ुर्ग अधिकारी आगे आए।
उन्होंने टूटी-फूटी हिंदी में कहा,
"हम... बिज़नेस बाद में... पहले इंसानियत।"
सभी लोग मुस्कुरा दिए।
मीटिंग शुरू होने से पहले विक्रम कपूर ने सब कर्मचारियों को लॉबी में बुला लिया।
उन्होंने माइक हाथ में लिया और कहा,
"आज से हमारी कंपनी में एक नया नियम होगा। किसी भी कर्मचारी का सम्मान उसके पद से नहीं, उसके व्यवहार से तय होगा। चाहे वह चौकीदार हो, ड्राइवर हो या मैनेजर—सब बराबर हैं।"
ज़ोरदार तालियाँ गूँज उठीं।
लेकिन असली आश्चर्य अभी बाकी था।
विक्रम कपूर ने मुस्कुराकर कहा,
"और अब मैं आप सबको रामदीन जी के बारे में एक ऐसी बात बताने जा रहा हूँ, जिसे सुनकर शायद आप सभी की सोच बदल जाएगी..."
रामदीन घबरा गया।
"साहब... रहने दीजिए..."
विक्रम कपूर ने प्यार से कहा,
"नहीं रामदीन... अब सच सबको पता चलना चाहिए।"
सभी लोग उत्सुकता से उनकी ओर देखने लगे।
पूरा हॉल शांत था।
हर किसी की नज़र अब विक्रम कपूर पर टिकी हुई थी।
रामदीन बार-बार हाथ जोड़कर कह रहा था,
"साहब... रहने दीजिए। मुझे किसी तारीफ़ की ज़रूरत नहीं है।"
विक्रम कपूर मुस्कुराए।
"रामदीन, आज यह बात सिर्फ तुम्हारी नहीं, इस कंपनी में काम करने वाले हर इंसान के लिए ज़रूरी है।"
उन्होंने माइक उठाया।
"आप सब लोग रामदीन जी को सिर्फ एक चौकीदार समझते हैं। लेकिन शायद ही किसी को पता हो कि इन्होंने पिछले पंद्रह साल में अपनी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा गरीब बच्चों की पढ़ाई पर खर्च किया है।"
पूरा हॉल हैरानी से भर गया।
राघव ने अविश्वास से रामदीन की तरफ देखा।
विक्रम कपूर आगे बोले,
"हर महीने की पाँच तारीख को ये पास की झुग्गी बस्ती में जाते हैं। वहाँ दस बच्चों की स्कूल फीस भरते हैं। किसी के लिए किताबें खरीदते हैं, किसी के लिए यूनिफॉर्म।"
एक कर्मचारी धीरे से बोला,
"लेकिन... इनकी तो तनख्वाह ही कितनी होगी?"
विक्रम कपूर ने गहरी साँस ली।
"यही तो बात है। कम कमाने वाला भी बड़ा दिल रख सकता है।"
शिवनाथ त्रिपाठी मुस्कुराते हुए बोले,
"मैं पिछले आठ साल से इन्हें देख रहा हूँ। इन्होंने कभी किसी से अपनी अच्छाई का ज़िक्र नहीं किया।"
राघव की आँखें भर आईं।
उसे याद आया कि एक बार उसने गुस्से में रामदीन से कहा था—
"इतनी छोटी तनख्वाह में तुम्हारा घर कैसे चलता होगा?"
और रामदीन ने सिर्फ इतना कहा था—
"भगवान जितना देता है, उसमें बाँटने लायक भी बचा देता है साहब।"
तब उसे यह बात समझ नहीं आई थी।
आज हर शब्द का मतलब समझ आ रहा था।
उसी समय भीड़ में से एक युवक आगे आया।
उसने रामदीन के पैर छू लिए।
"दादाजी..."
रामदीन चौंक गए।
"अरे मोहित... तू यहाँ?"
युवक मुस्कुराया।
"आज मैं इसी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ। अगर आपने मेरी फीस न भरी होती तो मैं आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ देता।"
सब लोग चुप थे।
फिर एक युवती आगे आई।
"मेरी नर्सिंग की पढ़ाई भी इन्होंने करवाई थी।"
कुछ ही पलों में पाँच-छह लोग आगे आ गए।
हर किसी की कहानी अलग थी...
लेकिन एक बात सबमें समान थी—
उनकी ज़िंदगी बदलने वाला इंसान रामदीन था।
अब राघव अपने आँसू नहीं रोक पाया।
वह सबके सामने रामदीन के पैरों में झुक गया।
"मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने आपको कभी समझने की कोशिश ही नहीं की।"
रामदीन घबरा गए।
उन्होंने तुरंत उसे उठाया।
"साहब, बड़े लोग पैर नहीं पकड़ते।"
राघव की आवाज़ काँप रही थी।
"आज मैं बड़ा नहीं हूँ रामदीन... आज मैं आपका छात्र हूँ।"
शिवनाथ त्रिपाठी मुस्कुरा रहे थे।
उन्होंने कहा,
"यही तो असली शिक्षा है। किताबें इंसान को पढ़ा देती हैं, लेकिन अच्छे लोग इंसान बनना सिखाते हैं।"
विदेशी मेहमानों ने तालियाँ बजानी शुरू कर दीं।
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
उसी दिन विक्रम कपूर ने एक नई घोषणा की।
"आज से हमारी कंपनी में हर साल 'रामदीन सम्मान' दिया जाएगा। यह सम्मान उस कर्मचारी को मिलेगा जो सबसे ज़्यादा इंसानियत दिखाएगा, चाहे उसका पद कोई भी हो।"
तालियाँ पहले से भी ज़्यादा ज़ोर से बजने लगीं।
रामदीन की आँखों से आँसू बह निकले।
उन्होंने धीरे से कहा,
"साहब... मैंने तो कभी सम्मान के लिए कुछ नहीं किया।"
विक्रम कपूर मुस्कुराए।
"इसीलिए तो आप इसके सबसे बड़े हकदार हैं।"
उस घटना के बाद कंपनी बदल गई।
अब कोई भी कर्मचारी चौकीदार, सफाई कर्मचारी या ड्राइवर से ऊँची आवाज़ में बात नहीं करता था।
राघव हर दिन ऑफिस आते ही सबसे पहले रामदीन को नमस्ते करता।
कभी-कभी दोनों साथ बैठकर चाय भी पीते।
कुछ महीनों बाद रामदीन ने उम्र की वजह से नौकरी छोड़ दी।
उनके विदाई समारोह में पूरी कंपनी मौजूद थी।
राघव ने मंच से सिर्फ एक वाक्य कहा—
"मैंने मैनेजमेंट की पढ़ाई बड़ी यूनिवर्सिटी से की है, लेकिन इंसानियत की पढ़ाई मुझे इस चौकीदार ने सिखाई है।"
पूरा हॉल खड़े होकर तालियाँ बजाने लगा।
रामदीन की आँखें नम थीं, लेकिन चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान थी।
उन्हें किसी पद, पैसे या इनाम की ज़रूरत नहीं थी।
क्योंकि उन्होंने अपनी सबसे बड़ी कमाई पहले ही कर ली थी—
लोगों के दिलों में हमेशा के लिए जगह।

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