बहू की आवाज़
"बहू, तुम्हें हर बात में अपनी राय देने की ज़रूरत नहीं है... इस घर के फैसले बड़े लोग करते हैं..." यह कहते हुए सास ने सबके सामने आरती की बात बीच में ही रोक दी।
आरती ने कुछ नहीं कहा।
उसने बस हल्की-सी मुस्कान ओढ़ ली, लेकिन उसके दिल में एक बार फिर वही पुराना दर्द उतर गया।
घर में उसके जेठ के बेटे का जन्मदिन था। रिश्तेदारों से पूरा घर भरा हुआ था। बच्चे खेल रहे थे, रसोई में पकवान बन रहे थे और बैठक में हँसी-ठिठोली चल रही थी।
इन सबके बीच आरती एक जगह से दूसरी जगह दौड़ रही थी।
किसी के लिए चाय, किसी के लिए मिठाई, बच्चों के लिए खाना, बुज़ुर्गों के लिए दवा, मेहमानों के लिए पानी...
उसे खुद बैठकर दो मिनट साँस लेने का भी समय नहीं मिला।
जब सब लोग केक काटने के लिए इकट्ठा हुए, तब आरती ने धीरे से कहा,
"अगर बच्चों के लिए एक छोटा-सा खेल भी रख दें तो उन्हें और मज़ा आएगा।"
लेकिन उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि सास शारदा देवी बोल पड़ीं,
"तुम बस काम किया करो। सलाह देने की ज़रूरत नहीं है।"
कुछ रिश्तेदार हँस दिए।
आरती चुप हो गई।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ था।
शादी के बारह वर्षों में उसकी राय को शायद ही कभी महत्व मिला था।
जब घर बन रहा था, उसने बच्चों के पढ़ने के लिए अलग कमरा बनाने की सलाह दी थी।
किसी ने नहीं सुनी।
जब उसने खर्च बचाने का तरीका बताया, तब भी उसकी बात टाल दी गई।
जब उसने परिवार के साथ महीने में एक दिन बाहर घूमने की बात कही, तब भी सबने मज़ाक बना दिया।
धीरे-धीरे उसने बोलना ही कम कर दिया।
उसे लगता था कि शायद सचमुच उसकी बातों की कोई कीमत नहीं है।
आरती पहले बैंक में नौकरी करती थी।
उसे हिसाब-किताब संभालना बहुत अच्छी तरह आता था।
लेकिन शादी के बाद उसने नौकरी छोड़ दी, क्योंकि घर और बच्चों की जिम्मेदारी बढ़ गई थी।
उसने कभी किसी को दोष नहीं दिया।
उसे भरोसा था कि एक दिन सब समझेंगे।
घर में जब भी कोई परेशानी आती, सबसे पहले आरती ही खड़ी मिलती।
ससुर जी अस्पताल में भर्ती हुए तो उसने कई दिनों तक अस्पताल में रहकर सेवा की।
देवर की पढ़ाई के लिए उसने अपनी बचत दे दी।
ननद की शादी में उसने अपने हाथों से सैकड़ों मेहमानों की व्यवस्था संभाली।
लेकिन जब भी परिवार की किसी बड़ी बात पर चर्चा होती, उसे सिर्फ़ चाय परोसने के लिए बुलाया जाता।
उस दिन जन्मदिन का कार्यक्रम खत्म हुआ।
सब लोग अपने-अपने कमरों में चले गए।
आरती बालकनी में बैठी पौधों में पानी दे रही थी।
तभी उसका बेटा विवान उसके पास आया।
उसने पूछा,
"मम्मी, क्या आपकी बात अच्छी नहीं होती?"
आरती ने हैरानी से बेटे की ओर देखा।
"ऐसा क्यों पूछ रहे हो?"
विवान बोला,
"जब भी आप कुछ बोलती हो, दादी आपको रोक देती हैं।"
आरती के पास कोई जवाब नहीं था।
उसने बेटे के सिर पर हाथ फेर दिया।
लेकिन उस रात उसने एक फैसला कर लिया।
अगर वह हमेशा चुप रहेगी, तो उसकी पहचान भी हमेशा चुप ही रह जाएगी।
कुछ दिनों बाद मोहल्ले में महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूह बनने की सूचना आई।
वहाँ घर का बजट, बचत और छोटे व्यवसाय चलाने की ट्रेनिंग दी जाती थी।
आरती ने अपना नाम लिखवा दिया।
घर में जब सबको पता चला तो सास ने नाराज़ होकर पूछा,
"अब तुम्हें बाहर जाकर सीखने की क्या ज़रूरत है?"
आरती ने शांत स्वर में कहा,
"सीखने की उम्र कभी खत्म नहीं होती माँ जी।"
पति निखिल ने पहली बार पत्नी का साथ दिया।
उन्होंने कहा,
"अगर आरती कुछ नया सीखना चाहती है तो इसमें बुराई क्या है?"
धीरे-धीरे आरती प्रशिक्षण लेने लगी।
वहाँ उसने कई महिलाओं को अपने पैरों पर खड़े होते देखा।
उसका आत्मविश्वास लौटने लगा।
कुछ ही महीनों में उसने आसपास की महिलाओं को घर का बजट बनाने और छोटी बचत करने की सलाह देना शुरू कर दिया।
लोग उसकी बात ध्यान से सुनने लगे।
जिसकी कभी घर में राय नहीं मानी जाती थी, अब मोहल्ले के लोग उसी से सलाह लेने आने लगे।
एक दिन परिवार पर बड़ी मुसीबत आ गई।
जेठ का छोटा कारोबार अचानक घाटे में चला गया।
सब लोग परेशान थे।
कोई समझ नहीं पा रहा था कि खर्च कैसे संभाला जाए।
तभी आरती ने चुपचाप अपनी बनाई हुई पूरी योजना सबके सामने रखी।
उसने बताया कि कहाँ खर्च कम किया जा सकता है, कहाँ बचत होगी और कारोबार को दोबारा कैसे संभाला जा सकता है।
पहले तो सब चुप रहे।
फिर निखिल ने कहा,
"एक बार आरती की बात मानकर देखते हैं।"
सबने उसकी योजना के अनुसार काम शुरू किया।
कुछ महीनों बाद कारोबार फिर से चल पड़ा।
घर की आर्थिक स्थिति भी सुधरने लगी।
शारदा देवी सब देख रही थीं।
उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि जिस बहू को वे हमेशा चुप कराती थीं, वही सबसे समझदार निकली।
एक दिन पूरे परिवार के सामने उन्होंने आरती का हाथ पकड़कर कहा,
"बहू... मैंने हमेशा सोचा कि घर संभालना ही तुम्हारा काम है। लेकिन आज समझ आया कि तुम्हारे विचार भी इस घर की सबसे बड़ी ताकत हैं।"
आरती की आँखें भर आईं।
उसने मुस्कुराकर कहा,
"माँ जी, घर सिर्फ़ हाथों से नहीं, एक-दूसरे की बात सुनने से भी चलता है।"
उस दिन के बाद घर में एक नया नियम बना।
कोई भी बड़ा फैसला पूरे परिवार की राय लेकर ही होगा।
अब आरती सिर्फ़ काम करने वाली बहू नहीं थी।
वह उस घर की सम्मानित सदस्य थी, जिसकी बात को सब ध्यान से सुनते थे।
उसे समझ आ गया था कि इंसान की आवाज़ तभी दबती है, जब वह खुद बोलना छोड़ देता है।
लेकिन जब वह सम्मान के साथ अपनी बात रखना सीख जाता है, तब धीरे-धीरे दुनिया भी उसकी बात सुनना सीख जाती है।
क्योंकि परिवार वहीं खुश रहता है, जहाँ जिम्मेदारियाँ बाँटी जाती हैं और हर सदस्य की आवाज़ को बराबर सम्मान मिलता है।

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