कर्मों का आईना

 

Elderly Indian father sharing a heartfelt family moment with his caring daughter-in-law while the repentant mother-in-law watches in a warm modern home.


"अरे बुढ़ऊ! फिर से दूध गिरा दिया? आखिर कब तक तुम्हारी वजह से इस घर का नुकसान सहूँ मैं? अगर अपने हाथों से कुछ संभलता नहीं, तो बार-बार उठने की ज़रूरत ही क्या है?"


ममता देवी की तेज आवाज़ सुनकर पूरा घर सन्न रह गया।


सत्तर पार कर चुके उनके ससुर हरिराम जी काँपते हाथों से फर्श पर फैले दूध को देखने लगे। उनकी आँखों में शर्म थी, लेकिन जुबान पर कोई सफाई नहीं।


"बहू... मैं बस दवा खाने के लिए दूध गर्म कर रहा था... हाथ काँप गया..." उन्होंने धीमे स्वर में कहा।


"तो मुझे बुला लेते! हर चीज़ में हीरो बनने की क्या ज़रूरत है? अब ये दूध भी गया और बर्तन भी गंदे हो गए।"


इतना कहकर ममता देवी झुंझलाते हुए रसोई से बाहर निकल गईं।


हरिराम जी धीरे-धीरे झुककर फर्श साफ़ करने लगे। घुटनों में दर्द था, कमर सीधी नहीं होती थी, फिर भी किसी तरह कपड़ा उठाकर सफाई करने लगे।


तभी किसी ने उनके हाथ से कपड़ा ले लिया।


"दादाजी, आप रहने दीजिए।"


यह घर की नई बहू नैना थी।


नैना की शादी को अभी तीन महीने ही हुए थे। वह पढ़ी-लिखी, समझदार और बेहद शांत स्वभाव की लड़की थी। उसने धीरे से हरिराम जी को कुर्सी पर बैठाया और खुद फर्श साफ़ करने लगी।


"बेटा, रहने दे... अगर ममता ने देख लिया तो तुझे भी डाँटेगी।"


नैना मुस्कुरा दी।


"गलत बात देखकर चुप रहना मुझे नहीं आता दादाजी।"


हरिराम जी उसकी तरफ़ देखते रह गए।


बरसों बाद किसी ने उन्हें इंसान समझकर बात की थी।



धीरे-धीरे नैना को घर की असलियत समझ आने लगी।


घर बड़ा था।


घर में रोहित, उसकी माँ ममता देवी और पिता हरिराम जी रहते थे। जिस हरिराम जी के नाम से कभी पूरे घर में फैसले होते थे, आज वही घर के सबसे आख़िरी कोने में बने छोटे-से बरामदे में एक पुराने बिस्तर पर अकेले अपनी ज़िंदगी काट रहे थे।


घर में सब कुछ था।


एसी, बड़ा टीवी, महंगे सोफे, नई कार...


लेकिन हरिराम जी के कमरे में न ढंग का पंखा था, न साफ़ चादर।


उनकी दवाइयाँ भी अक्सर समय पर नहीं मिलती थीं।


रात का बचा खाना उनके हिस्से में आता था।


जब भी वे कुछ माँगते, ममता देवी का एक ही जवाब होता—


"इतनी उम्र में अब क्या-क्या चाहिए आपको? दो वक्त खाना मिल रहा है, वही बहुत है।"


नैना यह सब देखकर भीतर ही भीतर टूटने लगी।


एक रात वह चुपके से हरिराम जी के कमरे में गई।


अपने हाथों से गरम दलिया बनाकर लाई।


"दादाजी... थोड़ा खा लीजिए।"


हरिराम जी ने कटोरी की तरफ देखा।


"इतना अच्छा खाना... मेरे लिए लाई हो बेटा?" हरिराम जी ने काँपते हाथों से कटोरी को देखा। उनकी आँखों में अविश्वास और अपनापन एक साथ झलक रहा था।


"हाँ दादाजी," नैना मुस्कुराई, "ये मैंने आपके लिए ही बनाया है। पहले गरम-गरम खा लीजिए, फिर आराम से बातें करेंगे।"


उन्होंने पहला निवाला मुँह में रखा।


फिर अचानक उनकी आँखों से आँसू बह निकले।


"क्या हुआ दादाजी?" नैना ने घबराकर पूछा।


हरिराम जी ने अपनी भीगी आँखें पोंछीं और हल्की-सी मुस्कान लाने की कोशिश की।


"कुछ नहीं बेटा... बस ज़िंदगी का एक पुराना पन्ना आँखों के सामने खुल गया।"


"कैसा पन्ना, दादाजी?" नैना ने प्यार से उनका हाथ थाम लिया।


हरिराम जी ने गहरी साँस ली और बोले,

"जब ममता इस घर में नई-नई बहू बनकर आई थी, तब उसे बेटी से भी बढ़कर रखा था। रात को अगर उसे ज़रा-सी भी भूख लग जाती, तो मैं खुद उठकर उसके लिए दूध गर्म करता था। उसे कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी। तब कहाँ पता था कि एक दिन वही मुझे दो वक्त की रोटी के लिए भी तरसा देगी।"


नैना चुप हो गई।


हरिराम जी आगे बोले—


"लेकिन बेटा, मैं उसे पूरी तरह दोष भी नहीं देता। शायद गलती मेरी भी थी। मैंने उसे हमेशा बेटी समझकर हर ज़िद पूरी की, हर गलती को प्यार में अनदेखा कर दिया। तब लगा था कि मेरा स्नेह उसे अपना बना देगा, पर शायद उसी प्यार ने उसे यह एहसास ही नहीं होने दिया कि बड़ों का सम्मान और सेवा भी रिश्तों का सबसे बड़ा धर्म होता है।"


नैना ने उनका हाथ पकड़ लिया।


"दादाजी, अभी भी देर नहीं हुई है।"


हरिराम जी मुस्कुरा दिए।


"कुछ रिश्ते लौटकर नहीं आते बेटा।"


दिन बीतते गए।


नैना अब रोज़ चोरी-छिपे दादाजी की सेवा करती।


कभी फल देती।


कभी गरम खाना।


कभी दवा।


लेकिन ममता देवी को यह सब पसंद नहीं था।


एक दिन उन्होंने नैना को पकड़ लिया।


"वाह! बड़ी सेवा हो रही है बूढ़े की!"


नैना चुप रही।


"सुनो बहू, ये ज़्यादा हमदर्दी अपने मायके में जाकर दिखाना। इस घर में वही होगा जो मैं कहूँगी। मेरी बात के खिलाफ़ जाने की ज़रा भी कोशिश मत करना, वरना अच्छा नहीं होगा।"


"लेकिन मम्मी जी..."


"कोई लेकिन-वेकिन नहीं। जो मैं कहूँ वही होगा।"


उस दिन के बाद नैना खुलकर कुछ नहीं बोली।


लेकिन उसने मन ही मन एक निर्णय ले लिया।


कुछ ही दिनों बाद रोहित के ऑफिस की तरफ़ से परिवार सहित पहाड़ों की यात्रा का कार्यक्रम बना।


ममता देवी बहुत खुश थीं।


उन्होंने नए कपड़े खरीदे।


नई सैंडल खरीदी।


हर किसी से कहती फिर रही थीं—


"इस बार खूब घूमूँगी।"


नैना बस मुस्कुराती रही।


यात्रा का तीसरा दिन था।


सभी लोग एक सुंदर झरने के पास घूम रहे थे।


पत्थरों पर हल्की फिसलन थी।


ममता देवी जल्दी-जल्दी फोटो खिंचवाने के लिए आगे बढ़ीं।


तभी उनका पैर फिसला।


"बचाओ...!"


वे ज़ोर से गिरीं।


दर्द से चीख उठीं।


उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया।


जाँच के बाद डॉक्टर ने कहा—


"पैर की हड्डी बुरी तरह टूट गई है। कम से कम तीन महीने तक चलना बिल्कुल मना है।"


यह सुनते ही ममता देवी का चेहरा उतर गया।


जो महिला पूरे घर पर राज करती थी...


अब उसे हर छोटे काम के लिए किसी का सहारा चाहिए था।


नैना ने उसी समय डॉक्टर से सारी दवाइयों की सूची ली।


मुस्कुराकर बोली—


"मम्मी जी, अब आपकी पूरी ज़िम्मेदारी मेरी है।"


ममता देवी ने राहत की साँस ली।


उन्हें लगा—


"मेरी बहू मेरा बहुत ध्यान रखेगी..."


लेकिन उन्हें यह नहीं पता था...


कि आने वाले दिनों में उन्हें अपने ही किए हुए कर्मों का ऐसा आईना देखने को मिलेगा, जिसे देखकर उनकी पूरी ज़िंदगी बदल जाएगी...


                                भाग–2


"मम्मी जी... दवा का समय हो गया है।"


नैना कमरे में आई। उसके हाथ में दवा की ट्रे थी।


ममता देवी मुस्कुराईं।


"पहले चाय दे दो बहू... फिर दवा खा लूँगी।"


"चाय अभी नहीं बन पाई। रसोई में बहुत काम था। थोड़ी देर इंतज़ार कर लीजिए।"


ममता देवी ने घड़ी देखी। उन्हें रोज़ छह बजे चाय पीने की आदत थी।


आधा घंटा बीत गया।


फिर एक घंटा।


जब नैना लौटी तो उसके हाथ में एक स्टील का पुराना गिलास था।


उसमें हल्की ठंडी चाय थी।


ममता देवी ने हैरानी से पूछा,


"ये क्या है? मेरे कप कहाँ हैं?"


नैना ने बिल्कुल शांत स्वर में कहा,


"काँच के कप बहुत महंगे हैं मम्मी जी। अभी आपका हाथ ठीक नहीं है। अगर गिर गया तो टूट जाएगा। इसलिए यही ठीक है।"


ममता देवी चुप रह गईं।


यही बात...


यही शब्द...


वह कितनी बार हरिराम जी से कह चुकी थीं।


उन्होंने बिना कुछ बोले चाय पी ली।



दोपहर में खाना आया।


थाली में दो सूखी रोटियाँ थीं।


साथ में पतली दाल।


"सब्ज़ी नहीं बनाई क्या?" ममता देवी ने थाली की ओर देखते हुए पूछा।


"बनाई है, मम्मी जी।" नैना ने शांत स्वर में जवाब दिया।


"तो फिर मेरी थाली में क्यों नहीं रखी?" ममता देवी की आवाज़ में नाराज़गी थी।


नैना ने बिना किसी भाव के कहा, "डॉक्टर ने कहा है कि अभी आपको हल्का खाना खाना चाहिए। ज़्यादा मसालेदार या तला-भुना खाना ठीक नहीं रहेगा। इसलिए आपके लिए सिर्फ़ दाल और रोटी लाई हूँ।"


ममता देवी ने थाली की ओर देखा। उन्हें अच्छी तरह याद था कि यही बात कहकर उन्होंने न जाने कितनी बार हरिराम जी की थाली से सब्ज़ी हटाई थी। आज वही शब्द उनके अपने सामने लौटकर खड़े थे।


ममता देवी समझ रही थीं।


डॉक्टर ने ऐसा कुछ नहीं कहा था।


लेकिन आज उनके पास कुछ कहने का अधिकार भी नहीं था।



तीसरे दिन उन्होंने पानी माँगा।


"बहू... थोड़ा पानी पिला दो।"


नैना ने दूर से कहा,


"अभी हाथ आटे में हैं मम्मी जी। पाँच मिनट रुक जाइए।"


पाँच मिनट...


बीस मिनट बन गए।


फिर चालीस मिनट।


ममता देवी का गला सूखने लगा।


उन्हें याद आया—


हरिराम जी भी इसी तरह आवाज़ लगाते थे।


और वह कहती थीं—


"इतनी भी क्या प्यास लगी रहती है? थोड़ा सब्र नहीं होता?"


आज वही शब्द उनके कानों में हथौड़े की तरह बज रहे थे।


उनकी आँखें भर आईं।



शाम को रोहित ऑफिस से लौटा।


"माँ, सब ठीक है?"


ममता देवी कुछ कहना चाहती थीं।


लेकिन तभी नैना बोली,


"इनकी खूब सेवा हो रही है। समय पर दवा, समय पर खाना... बस थोड़ा दर्द है।"


रोहित निश्चिंत हो गया।


वह माँ का माथा सहलाकर चला गया।


ममता देवी बस उसे जाते हुए देखती रह गईं।



रात को कमरे का पंखा बंद था।


गर्मी बहुत थी।


उन्होंने आवाज़ लगाई।


"बहू... बहुत गर्मी लग रही है।"


नैना आई।


बोली,


"गर्मी सह लीजिए मम्मी जी। पंखा तेज़ चलेगा तो आपको ठंड लग जाएगी।"


यही बात...


उन्होंने हरिराम जी से कितनी बार कही थी।


उस रात ममता देवी सो नहीं सकीं।


उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि बेबस होना कितना कठिन होता है।



अगली रात दरवाज़ा धीरे से खुला।


नैना अंदर आई।


इस बार उसके हाथ में गरम सूप, ताज़ी रोटियाँ, फल और दूध था।


कमरे में आते ही उसने पंखा तेज़ कर दिया।


तकिए ठीक किए।


फिर प्यार से बोली,


"मम्मी जी... खाना खा लीजिए।"


ममता देवी हैरान थीं।


"आज ये सब?"


नैना उनके पास बैठ गई।


उसकी आँखें नम थीं।


"मम्मी जी... पिछले तीन दिनों से मैंने जो कुछ किया... उसके लिए मुझे माफ़ कर दीजिए।"


ममता देवी चौंक गईं।


"मतलब?"


"मैंने आपके साथ वही किया... जो आप बरसों से दादाजी के साथ करती आई हैं।"


कमरे में सन्नाटा छा गया।


नैना आगे बोली,


"जब आपको देर से पानी मिला... कैसा लगा?"


ममता देवी की आँखें झुक गईं।


"जब आपको बासी खाना मिला... कैसा लगा?"


कोई जवाब नहीं था।


"जब आपकी आवाज़ सुनकर भी कोई नहीं आया... तब आपके दिल पर क्या बीती?"


अब ममता देवी रो पड़ीं।


नैना की आवाज़ भर्रा गई।


"मम्मी जी... मैंने सिर्फ़ तीन दिन आपको एहसास कराया है। दादाजी तो बरसों से यही सब सह रहे हैं।"


ममता देवी फूट-फूटकर रोने लगीं।


"बहू... मैं बहुत बड़ी अपराधी हूँ। मुझे कभी समझ ही नहीं आया कि मैं कितना बड़ा पाप कर रही हूँ।"


उन्होंने दोनों हाथ जोड़ दिए।


"क्या भगवान मुझे माफ़ करेंगे?"


नैना ने उनके हाथ पकड़ लिए।


"भगवान से पहले दादाजी से माफ़ी माँग लीजिए। उनका दिल बहुत बड़ा है।"


कुछ दिनों बाद डॉक्टर ने व्हीलचेयर पर बैठने की अनुमति दे दी।


ममता देवी ने सबसे पहला काम किया।


उन्होंने नैना से कहा,


"मुझे बाबूजी के पास ले चलो।"


नैना उन्हें हरिराम जी के कमरे में ले गई।


हरिराम जी अख़बार पढ़ रहे थे।


व्हीलचेयर देखकर घबरा गए।


"अरे बहू... कैसी हो?"


ममता देवी रो पड़ीं।


व्हीलचेयर से उतरना संभव नहीं था।


उन्होंने वहीं बैठे-बैठे दोनों हाथ जोड़ दिए।


"बाबूजी... मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने आपका बहुत अपमान किया है।"


हरिराम जी कुछ क्षण उन्हें देखते रहे।


फिर धीरे से उठे।


उनके सिर पर हाथ रख दिया।


"बेटी... गलती इंसान से होती है। उसे मान लेना सबसे बड़ा पुण्य होता है।"


ममता देवी उनके घुटनों से लिपटकर रोती रहीं।


घर के बाकी लोग भी भावुक हो गए।



उस दिन के बाद सब कुछ बदल गया।


हरिराम जी का छोटा कमरा खाली कर दिया गया।


उन्हें घर के सबसे अच्छे कमरे में रखा गया।


उनके लिए नई आरामदायक खाट आई।


कमरे में पंखा, रोशनी और टीवी लगाया गया।


ममता देवी हर सुबह अपने हाथों से उनके लिए नाश्ता बनातीं।


समय पर दवा देतीं।


घंटों उनके पास बैठकर बातें करतीं।


हरिराम जी के चेहरे पर जो मुस्कान लौट आई थी, वह बरसों से गायब थी।


कुछ महीनों बाद ममता देवी भी पूरी तरह ठीक हो गईं।


एक दिन पड़ोस की महिलाओं ने पूछा,


"अरे ममता, तुम्हारी बहू तो सच में लक्ष्मी है। घर का माहौल ही बदल गया।"


ममता देवी मुस्कुराईं।


फिर बोलीं,


"मेरी बहू ने सिर्फ़ मेरी सेवा नहीं की... उसने मुझे मेरे कर्मों का आईना दिखाया। अगर उस दिन उसने मुझे नहीं रोका होता, तो शायद मैं सारी उम्र अपने ही पिता समान इंसान का दिल दुखाती रहती।"


पास ही बैठे हरिराम जी मुस्कुरा रहे थे।


नैना रसोई से चाय लेकर आई।


तीनों ने साथ बैठकर चाय पी।


उस घर में अब आदेश नहीं गूँजते थे...


वहाँ अब केवल अपनापन बोलता था।


कहते हैं, बुढ़ापा किसी पर बोझ नहीं होता। बोझ बन जाती है हमारी सोच। जिस घर में बुज़ुर्गों को सम्मान मिलता है, वहाँ बरकत अपने आप चली आती है। और जो अपने बुज़ुर्गों की आँखों में आँसू भरते हैं, समय एक दिन उन्हें वही दर्द महसूस कराकर ही रहता है।



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