बहू का आत्मसम्मान
"बहू! याद रखना... इस घर की इज़्ज़त सबसे पहले आती है। मायके का मोह जितनी जल्दी छोड़ दोगी, उतनी जल्दी इस घर में अपनी जगह बना लोगी।"
सास की यह बात सुनकर रिया कुछ पल के लिए चुप रह गई। उसने मुस्कुराकर सिर हिला दिया, लेकिन उसके मन में जैसे किसी ने एक सवाल छोड़ दिया था। अभी कुछ देर पहले तक यही सास उसे सबके सामने बेटी कह रही थीं, और अब मायके को भूल जाने की सीख दे रही थीं।
रिया की शादी विशाल से हुई थी। विशाल एक अच्छी कंपनी में नौकरी करता था। उसका परिवार संपन्न था। सास सुशीला देवी, ससुर हरिराम जी और छोटी ननद नेहा... घर में सभी लोग बाहर से बहुत अच्छे दिखाई देते थे।
शादी के शुरुआती दिनों में रिया को किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं हुई। सास उसके लिए अपने हाथों से खाना बनातीं, ससुर उसे बेटी कहकर बुलाते और विशाल हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखता।
रिया सोचती, "भगवान ने मुझे कितना अच्छा परिवार दिया है।"
धीरे-धीरे समय बीतने लगा।
रिया ने घर की सारी जिम्मेदारियाँ अपने ऊपर ले लीं। सुबह से रात तक वह पूरे परिवार का ध्यान रखती। सबके खाने-पीने से लेकर दवाइयों तक का ख्याल रखती। किसी को शिकायत का मौका नहीं देती।
एक दिन उसकी मां का फोन आया।
"बेटा, बहुत दिन हो गए। अगर हो सके तो दो दिन के लिए आ जा। तेरे पापा भी तुझे बहुत याद कर रहे हैं।"
रिया की आंखें भर आईं।
उसने धीरे से कहा, "मां, मैं विशाल से बात करके बताती हूं।"
रात को उसने पति से कहा, "अगर आपको ठीक लगे तो मैं दो दिन के लिए मम्मी-पापा से मिल आऊं।"
विशाल कुछ बोलता, उससे पहले उसकी मां बोलीं, "अभी घर में बहुत काम है। बाद में चली जाना।"
रिया चुप हो गई।
उसने सोचा, शायद सच में काम ज्यादा होगा।
कुछ महीने और बीत गए।
फिर उसके भाई का फोन आया।
"दीदी, पापा की तबीयत ठीक नहीं रहती। एक बार आ जाओ।"
रिया ने फिर वही बात घर में रखी।
इस बार भी कोई न कोई बहाना बना दिया गया।
रिया को अजीब लगने लगा।
जिस घर में उसे बेटी कहा जाता था, वहीं उसे अपने मां-बाप से मिलने की इजाजत क्यों नहीं मिल रही थी?
लेकिन वह किसी पर शक नहीं करना चाहती थी।
उसे विश्वास था कि शायद परिस्थितियां ऐसी होंगी।
कुछ समय बाद रिया मां बनने वाली थी।
पूरे घर में खुशियां थीं।
सास उसका खूब ध्यान रखतीं।
रिया का मन फिर भी अपने मायके के लिए तड़पता रहता।
बेटी के जन्म के बाद रिया के माता-पिता अपनी नातिन को देखने और बेटी से मिलने कई बार उसके ससुराल आए। वे चाहते थे कि कुछ दिन अपनी बेटी के साथ समय बिताएँ, लेकिन हर बार किसी न किसी बहाने उन्हें कुछ ही घंटों में वापस लौटना पड़ता। रिया चाहकर भी उन्हें रोक नहीं पाती थी। माता-पिता के जाते समय उसकी आँखें भर आतीं, मगर वह अपने मन का दर्द किसी से कह नहीं पाती।
रिया सब देखती रही।
एक दिन उसने अपनी सास और ससुर की बातचीत सुन ली।
ससुर जी धीमी आवाज़ में बोले, "देखो, अगर बहू बार-बार मायके जाने लगेगी, तो उसका मन वहीं ज़्यादा लगा रहेगा। फिर हर छोटी-बड़ी बात में मायके वालों की सलाह चलेगी। शादी के बाद लड़की का ध्यान अपने ससुराल पर होना चाहिए, इसलिए बेहतर है कि उसे बार-बार मायके जाने की आदत न पड़े।"
सास बोलीं, "मैं भी यही चाहती हूं। इसलिए हर बार कोई न कोई बहाना बना देती हूं।"
रिया के पैरों तले जमीन खिसक गई।
उसे पहली बार समझ आया कि उसे जानबूझकर रोका जा रहा था।
उस रात वह बिल्कुल नहीं सो पाई।
सुबह होने का इंतजार किए बिना उसने फैसला कर लिया कि अब बात साफ-साफ होगी।
रात के खाने के बाद उसने पूरे परिवार के सामने कहा,
"पापा जी, क्या मैं आपसे एक सवाल पूछ सकती हूं?"
हरिराम जी मुस्कुराए।
"पूछो बेटा।"
रिया ने शांत आवाज में कहा,
"अगर आपकी बेटी की शादी ऐसे घर में होती, जहां उसे आपसे मिलने नहीं दिया जाता, तो आपको कैसा लगता?"
पूरा कमरा शांत हो गया।
किसी के पास जवाब नहीं था।
हरिराम जी ने बात बदलनी चाही।
"बेटा, शादी के बाद लड़की का घर उसका ससुराल होता है।"
रिया ने कहा,
"बिल्कुल होता है। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि उसके मां-बाप उससे पराए हो जाएं?"
विशाल चुप बैठा था।
रिया ने उसकी तरफ देखा।
"आप बताइए विशाल... अगर कोई आपसे कहे कि आज के बाद अपने माता-पिता से रिश्ता खत्म कर दो, क्या आप मान लेंगे?"
विशाल तुरंत बोला,
"कभी नहीं।"
रिया मुस्कुरा दी।
"बस... मेरा जवाब भी यही है।"
उसकी आंखों से आंसू निकल आए।
"मैं इस घर से प्यार करती हूं। मैंने कभी किसी बात की शिकायत नहीं की। आपकी हर खुशी को अपनी खुशी समझा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं अपने मां-बाप को भूल जाऊं।"
सास कुछ बोलना चाहती थीं।
रिया ने हाथ जोड़ दिए।
"मम्मी जी, बेटी कहने से कोई बेटी नहीं बन जाती। बेटी का अधिकार भी देना पड़ता है।"
ये शब्द सीधे सुशीला देवी के दिल में उतर गए।
पहली बार उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ।
लेकिन हरिराम जी अभी भी अपने अहंकार में थे।
उन्होंने कहा,
"अगर इतनी ही परेशानी है तो चली जाओ अपने मायके।"
रिया ने बिना गुस्सा किए कहा,
"मैं जाऊंगी... क्योंकि मेरे पापा बीमार हैं। लेकिन मैं रिश्ता तोड़कर नहीं जाऊंगी। मैं इस घर की बहू हूं और हमेशा रहूंगी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करूंगी।"
यह कहकर वह अपने कमरे में चली गई।
विशाल सारी रात सो नहीं सका।
उसके कानों में बार-बार रिया की वही बात गूंज रही थी—
"अगर तुम अपने माता-पिता को नहीं छोड़ सकते, तो मैं अपने माता-पिता को क्यों छोड़ूं?"
उसे एहसास हुआ कि वह हमेशा अपने माता-पिता की बात मानता रहा, लेकिन कभी पत्नी की भावनाओं को समझने की कोशिश नहीं की।
अगली सुबह उसने अपने पिता से कहा,
"पापा, आपने मुझे हमेशा सही और गलत में फर्क करना सिखाया था। फिर आज मैं अपनी पत्नी के साथ गलत कैसे कर सकता हूं?"
हरिराम जी पहली बार निरुत्तर हो गए।
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
विशाल ने रिया से कहा,
"चलो... हम मम्मी-पापा से मिलने चलते हैं।"
रिया की आंखें भर आईं।
तभी पीछे से सुशीला देवी आ गईं।
उन्होंने रिया का हाथ पकड़ लिया।
"बेटा... हमें माफ कर दो। हम अपने अहंकार में भूल गए थे कि बेटी शादी के बाद पराई नहीं होती।"
हरिराम जी भी आगे आए।
उन्होंने सिर झुका लिया।
"मुझसे गलती हो गई। मैंने अपने पुराने विचारों को ही सच मान लिया।"
रिया ने तुरंत उनके पैर छू लिए।
"गलती सबसे होती है पापा जी। उसे स्वीकार करने वाले लोग बहुत कम होते हैं।"
हरिराम जी की आंखें नम हो गईं।
उन्होंने कहा,
"आज से जब भी तुम्हारा मन करे, तुम अपने मायके जाओगी। और अगर कोई तुम्हें रोकने की कोशिश करेगा, तो सबसे पहले मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूंगा।"
कुछ देर बाद पूरा परिवार एक साथ रिया के मायके पहुंचा।
रिया के पिता ने दरवाजा खोला तो सामने अपनी बेटी, दामाद और समधी-समधन को देखकर उनकी आंखें भर आईं।
हरिराम जी आगे बढ़े।
उन्होंने रिया के पिता का हाथ पकड़कर कहा,
"भाई साहब, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने रिश्तों से ज्यादा अपने अहंकार को महत्व दिया।"
रिया के पिता मुस्कुरा दिए।
"रिश्ते वहीं बड़े होते हैं जहां गलती मानने का साहस हो।"
दोनों परिवार गले मिल गए।
घर का माहौल फिर से खुशियों से भर गया।
रिया ने मन ही मन भगवान का धन्यवाद किया।
उसे समझ आ गया था कि रिश्ते टूटते नहीं, उन्हें तोड़ने वाला हमारा अहंकार होता है।
जिस घर में सम्मान, विश्वास और अपनापन बना रहे, वही घर सच में स्वर्ग बन जाता है।
सीख:
रिश्तों की मजबूती किसी एक के झुकने से नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के सम्मान, विश्वास और अपनी गलती स्वीकार करने की हिम्मत से बनती है। बेटी शादी के बाद अपने ससुराल की जिम्मेदारी जरूर बनती है, लेकिन वह अपने मायके का प्यार और अधिकार कभी नहीं खोती।

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