माँ का अंतिम फैसला | असली वारिस कौन?
"जिस बहू को पूरे परिवार ने हमेशा स्वार्थी समझा, उसी ने एक दिन ऐसा निर्णय लिया कि सबको समझ आ गया—रिश्तों की असली पहचान शब्दों से नहीं, मुश्किल समय में निभाए गए साथ से होती है।"
शारदा देवी इस परिवार की सबसे बड़ी थीं। उम्र ढल चुकी थी, मगर आदतें अब भी वही थीं। घर का हर छोटा-बड़ा काम उनकी निगरानी में होता था। कौन कब खाएगा, कौन खेत जाएगा, कौन बाज़ार से सामान लाएगा—सब कुछ उन्हें याद रहता था।
उनके तीन बेटे थे—अमित, सुनील और दीपक। तीनों की शादी हो चुकी थी। बड़ा और मँझला बेटा शहर में रहते थे। छोटा बेटा दीपक अपने माता-पिता के साथ गाँव वाले पुश्तैनी घर में रहता था। उसकी पत्नी राधिका शांत स्वभाव की लड़की थी। वह ज़्यादा बोलती नहीं थी, इसलिए अक्सर लोग उसे घमंडी समझ लेते थे।
घर में जब भी कोई पारिवारिक कार्यक्रम होता, अमित और सुनील अपने परिवार के साथ आ जाते। आते ही दोनों बहुएँ—पूजा और मीना—कहतीं, "माँ जी, हम तो मेहमान बनकर आए हैं। यहाँ आकर भी अगर काम ही करना है, तो फिर आराम कब मिलेगा?"
शारदा देवी मुस्कुरा देतीं। उन्हें किसी से बहस करना पसंद नहीं था। वह खुद ही काम संभाल लेतीं। राधिका बिना कुछ कहे उनके साथ लगी रहती। कभी रसोई में, कभी आँगन में, कभी मेहमानों की सेवा में।
एक बार घर में कुलदेवी की बड़ी पूजा रखी गई। दूर-दूर से रिश्तेदार आने वाले थे। पूजा की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो गई।
पूजा और मीना ने पहले ही कह दिया, "हम बच्चों को संभालेंगे। बाकी काम किसी और से करवा लीजिए।"
शारदा देवी ने इस बार किसी से कुछ नहीं कहा। उन्होंने दो मजदूर और एक रसोइया बुला लिया। कार्यक्रम अच्छे से संपन्न हो गया।
रात को सब लोग आराम कर रहे थे। तभी शारदा देवी ने देखा कि राधिका अकेले बैठकर अगले दिन के लिए बचे हुए बर्तन साफ कर रही है।
उन्होंने पूछा, "बहू, सब काम तो हो गया। अब रहने भी दे।"
राधिका मुस्कुराकर बोली, "माँ जी, सुबह आपको फिर यही काम करना पड़ेगा। अगर अभी कर दूँगी तो आपको आराम मिल जाएगा।"
शारदा देवी ने पहली बार महसूस किया कि यह लड़की काम नहीं कर रही, अपनेपन से घर निभा रही है।
दिन बीतते गए।
कुछ महीनों बाद शारदा देवी के पति हरिनारायण जी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। डॉक्टर ने साफ कहा कि अब उन्हें लगातार देखभाल की ज़रूरत होगी।
अमित और सुनील ने फोन पर कहा, "माँ, पैसे की चिंता मत कीजिए। जो भी खर्च होगा हम भेज देंगे।"
शारदा देवी ने सिर्फ इतना कहा, "बेटा, दवा के साथ किसी अपने का हाथ भी चाहिए होता है।"
फोन के बाद फिर कई दिनों तक कोई नहीं आया।
दीपक नौकरी से लौटकर पिता के पास बैठ जाता। राधिका समय पर दवा देती, खाना खिलाती, रात में कई बार उठकर उनकी चादर ठीक करती।
हरिनारायण जी जब भी आँख खोलते, राधिका को अपने पास पाते।
एक रात उन्होंने धीरे से कहा, "बहू, तूने बेटी से बढ़कर सेवा की है।"
राधिका ने तुरंत उनके पैर छू लिए। "बाबूजी, आपने मुझे इस घर की बहू नहीं, बेटी माना है। सेवा तो मेरा फर्ज़ है।"
कुछ ही दिनों बाद हरिनारायण जी इस दुनिया से चले गए।
पूरा परिवार अंतिम संस्कार में शामिल हुआ। तेरहवीं तक घर लोगों से भरा रहा।
सबके जाने के बाद घर फिर शांत हो गया।
दो दिन बाद शारदा देवी ने तीनों बेटों और बहुओं को आँगन में बुलाया।
उन्होंने कहा, "आज मैं एक जरूरी फैसला सुनाना चाहती हूँ।"
सब चुप हो गए।
उन्होंने अलमारी से एक फाइल निकाली और सबके सामने रख दी।
अमित ने उत्सुक होकर पूछा, "क्या बात है माँ?"
शारदा देवी बोलीं, "मैं अपनी संपत्ति का बँटवारा अपने जीते जी तय कर रही हूँ।"
यह सुनते ही सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
कागज़ खोले गए।
अमित ने पढ़ते ही हैरानी से कहा, "माँ! यह कैसे हो सकता है? सबसे बड़ा हिस्सा राधिका के नाम?"
मीना भी बोल पड़ी, "हमने ऐसा क्या गलत किया?"
सुनील ने नाराज़ होकर कहा, "अगर बाँटना ही था तो बराबर बाँटतीं।"
शारदा देवी ने शांत स्वर में कहा, "बराबरी सिर्फ हिस्सों में नहीं होती। जिम्मेदारियों में भी होती है।"
अमित बोला, "हमने हर महीने पैसे भेजे।"
शारदा देवी ने उसकी तरफ देखकर कहा, "पैसे भेजना आसान होता है। किसी बीमार के सिरहाने पूरी रात बैठना कठिन होता है।"
उन्होंने आगे कहा, "तुम्हारे पिता आखिरी दिनों में हर बार राधिका का नाम लेते थे। उसने कभी यह नहीं सोचा कि उसे क्या मिलेगा। उसने सिर्फ इतना सोचा कि परिवार को उसकी जरूरत है।"
पूरा आँगन शांत हो गया।
राधिका घबराकर बोली, "माँ जी, मुझे इतना सब नहीं चाहिए।"
शारदा देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"यह इनाम नहीं है बहू। यह उस भरोसे की जिम्मेदारी है जिसे तूने अपने व्यवहार से कमाया है।"
दीपक भी भावुक हो गया।
उसने कहा, "माँ, अगर भाई चाहें तो मेरा हिस्सा भी बाँट दीजिए।"
शारदा देवी मुस्कुराईं।
"बेटा, मैं किसी से कुछ छीन नहीं रही। सबको उनका हिस्सा मिलेगा। लेकिन घर की देखभाल और यह पुश्तैनी मकान उस इंसान के नाम रहेगा जिसने इसे अपना समझकर संभाला है।"
अमित और सुनील दोनों चुप थे।
उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि उन्होंने माँ-बाप की जरूरत को सिर्फ पैसों से तौल लिया था।
कुछ देर बाद अमित उठकर राधिका के पास आया।
उसने धीमे से कहा, "राधिका... हमें माफ कर दो। हम समझ ही नहीं पाए कि माँ-बाप को सबसे ज़्यादा किस चीज़ की जरूरत होती है। तुमने छोटी बहू होकर भी इस घर का सबसे बड़ा फर्ज़ निभाया।"
सुनील की आँखें भी भर आईं।
उसने माँ के पैर पकड़ लिए।
"माँ, अब हम बदलेंगे। सिर्फ त्योहारों पर नहीं, आपकी जरूरत के समय भी साथ रहेंगे।"
शारदा देवी ने दोनों बेटों के सिर पर हाथ रखा।
"गलती हर इंसान से होती है। लेकिन जो अपनी गलती समझ ले, वही परिवार को फिर से जोड़ सकता है।"
राधिका ने तुरंत कहा, "माँ जी, यह घर हम सबका है। कोई किसी से अलग नहीं होगा।"
उसकी बात सुनकर सबके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
कई महीनों बाद पहली बार उस आँगन में सच्ची शांति थी।
शारदा देवी ने आसमान की तरफ देखा। उन्हें लगा जैसे हरिनारायण जी भी कहीं से यह दृश्य देखकर मुस्कुरा रहे हों।
उस दिन परिवार ने सिर्फ जायदाद का फैसला नहीं देखा था। उन्होंने यह भी समझ लिया था कि घर की असली विरासत खेत, मकान और पैसे नहीं होते। असली विरासत वह विश्वास होता है, जिसे कोई अपने व्यवहार, सेवा और जिम्मेदारी से कमाता है।
और उस घर में उस दिन से एक बात हमेशा के लिए याद रखी गई—रिश्तों में सबसे बड़ा हक उसी का होता है, जो सबसे पहले अपना फर्ज़ निभाता है।

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