असली मालिक कौन?
"जिस घर को बनाने में मैंने पाँच साल की मेहनत और अपनी पूरी जमा-पूंजी लगा दी... उसी घर के गृह प्रवेश पर मेरी सास ने रिश्तेदारों के सामने कहा, 'तुम तो इस घर की मेहमान हो।' उन्हें लगा मैं रिश्तों की खातिर चुप रह जाऊँगी, लेकिन अगले ही पल मैंने ऐसा सच सबके सामने रखा कि पूरे परिवार की बोलती बंद हो गई।"
दिल्ली के एक शांत और पॉश इलाके में बना वह तीन मंजिला खूबसूरत घर दूर से ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेता था। सफेद संगमरमर का फर्श, बड़े कांच के दरवाजे, लकड़ी की शानदार सीढ़ियाँ और छत पर बना छोटा-सा गार्डन उस घर की खूबसूरती को और बढ़ा रहा था। यह कोई विरासत में मिला घर नहीं था। इसे 30 साल की प्रिया ने अपनी पाँच साल की मेहनत, दिन-रात की नौकरी और हर छोटी-बड़ी बचत से बनवाया था। उसके माता-पिता ने भी अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी का एक हिस्सा उसकी मदद के लिए दिया था।
प्रिया एक सॉफ्टवेयर कंपनी में ऊँचे पद पर काम करती थी। शादी के बाद भी उसने अपना करियर नहीं छोड़ा। उसके पति रोहन की नौकरी ठीक-ठाक थी, लेकिन इस घर के निर्माण में सबसे बड़ा योगदान प्रिया का ही था। रोहन भी यह बात जानता था और हमेशा अपनी पत्नी की मेहनत की तारीफ करता था।
गृह प्रवेश का दिन था। घर मेहमानों से भरा हुआ था। रिश्तेदार नई सजावट की तारीफ कर रहे थे। कोई ड्रॉइंग रूम की तस्वीरें ले रहा था तो कोई मॉड्यूलर किचन देखकर हैरान था।
लेकिन प्रिया की सास मीरा के चेहरे पर वह खुशी नहीं थी जो बाकी लोगों के चेहरे पर थी। उनकी नजरें बार-बार घर के हर कोने को ऐसे देख रही थीं जैसे वह पहले से ही अपना अधिकार समझ रही हों।
पूजा समाप्त होते ही सभी लोग हॉल में बैठ गए। तभी मीरा मुस्कुराते हुए उठीं और ऊँची आवाज में बोलीं,
"आज से इस घर की जिम्मेदारी मेरे हाथ में रहेगी। आखिर बड़े-बुजुर्ग घर संभालते हैं। और बहू..." उन्होंने प्रिया की तरफ देखकर कहा, "तुम तो इस घर की मेहमान हो। असली घर तो लड़की का उसके पति का होता है।"
पूरा हॉल एकदम शांत हो गया।
कुछ रिश्तेदार मुस्कुरा दिए। कुछ ने सिर झुका लिया। प्रिया के माता-पिता के चेहरे पर अपमान साफ दिखाई दे रहा था।
रोहन कुछ बोलना चाहता था, लेकिन अपनी मां के सामने चुप रह गया।
प्रिया ने एक पल के लिए आंखें बंद कीं। फिर मुस्कुराई और बोली,
"मम्मी जी, अगर मैं इस घर की मेहमान हूँ, तो एक मेहमान को भी अपनी बात रखने का अधिकार तो होना चाहिए।"
मीरा ने हंसते हुए कहा, "हाँ-हाँ, बोलो।"
प्रिया अंदर गई और एक फाइल लेकर वापस आई।
उसने सबके सामने कहा,
"इस घर की रजिस्ट्री सिर्फ मेरे नाम पर है। घर बनाने का हर भुगतान मेरे बैंक खाते से हुआ है। यह रहे बैंक स्टेटमेंट, यह बिल, और यह रजिस्ट्री की कॉपी।"
रिश्तेदार एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
प्रिया ने आगे कहा,
"रोहन ने हमेशा मेरा साथ दिया, लेकिन उन्होंने कभी इस घर पर अपना अधिकार नहीं जताया। क्योंकि वह जानते हैं कि यह मेरी मेहनत का फल है।"
रोहन ने पहली बार सबके सामने कहा,
"हाँ, यह सच है। इस घर की असली हकदार प्रिया ही है।"
मीरा का चेहरा उतर गया।
लेकिन प्रिया अभी रुकी नहीं।
उसने शांत स्वर में कहा,
"मम्मी जी, आपने मुझे मेहमान कहा। लेकिन मेहमान वह होता है जिसका इस घर पर कोई अधिकार न हो। मेरा नाम इस घर के हर कानूनी कागज पर है। अगर कोई मेहमान है, तो वह मैं नहीं हूँ।"
पूरा हॉल सन्न रह गया।
तभी परिवार के सबसे बुजुर्ग ताऊजी खड़े हुए।
उन्होंने मीरा से कहा,
"बहू का अपमान करके कोई बड़ा नहीं बन जाता। जिस लड़की ने अपनी मेहनत से इतना बड़ा घर बनाया है, उसका सम्मान होना चाहिए।"
अब तक मीरा के समर्थन में बैठे रिश्तेदार भी चुप थे।
प्रिया के पिता की आंखों में खुशी के आँसू आ गए।
उन्होंने कहा,
"बेटी, आज हमें तुम पर गर्व है।"
मीरा को अपनी गलती का एहसास होने लगा।
उन्होंने धीमी आवाज में कहा,
"प्रिया... मुझसे गलती हो गई।"
प्रिया ने सम्मान से जवाब दिया,
"गलती सबसे होती है, मम्मी जी। लेकिन रिश्ते तभी बचते हैं जब हम एक-दूसरे का सम्मान करना सीखें। मैं हमेशा आपको मां की तरह मानूँगी, लेकिन मेरी मेहनत और मेरे अधिकार का सम्मान भी उतना ही जरूरी है।"
मीरा ने सबके सामने प्रिया से माफी मांगी।
रिश्तेदारों ने तालियां बजाईं।
उस दिन गृह प्रवेश सिर्फ नए घर में प्रवेश का नहीं था, बल्कि एक नई सोच का भी था। पूरे परिवार ने समझ लिया कि बहू घर की मेहमान नहीं होती। अगर वह अपने सपनों, मेहनत और विश्वास से घर बनाती है, तो वह उस घर की बराबर नहीं, बल्कि सबसे बड़ी हकदार होती है। उस दिन के बाद मीरा ने कभी भी प्रिया को कम नहीं आंका, और परिवार में सम्मान का रिश्ता पहले से कहीं अधिक मजबूत हो गया।

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